वैश्विक जल संकट: “जल दिवालियापन” की शुरुआत
जनवरी 2026 में, संयुक्त राष्ट्र ने पर्यावरणीय नीति के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक रिपोर्ट जारी की, जिसमें घोषणा की गई कि दुनिया “वैश्विक जल दिवालियापन (Global Water Bankruptcy)” के दौर में प्रवेश कर चुकी है। यह शब्दावली किसी अस्थायी संकट को नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थिति को दर्शाती है जहाँ दुनिया की कई प्रमुख जल प्रणालियाँ अपरिवर्तनीय सीमाएँ पार कर चुकी हैं और मौजूदा उपभोग पैटर्न को अब सहन नहीं कर सकतीं।
इस रिपोर्ट का केंद्रीय निष्कर्ष बेहद गंभीर है: दुनिया के 100 सबसे बड़े शहरों में से आधे अब गंभीर जल तनाव का सामना कर रहे हैं। इनमें से 39 शहर “अत्यधिक उच्च जल तनाव” की श्रेणी में आते हैं, जहाँ जल की माँग उपलब्ध आपूर्ति के बेहद करीब या उससे भी अधिक हो चुकी है। यह कोई अनुमान नहीं, बल्कि एक वैश्विक वास्तविकता है, जो तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप और व्यवहारिक बदलाव की माँग करती है।
मुख्य तथ्य: संकट का पैमाना
| वैश्विक जल संकेतक | वर्तमान स्थिति | महत्व |
|---|---|---|
| जल अभाव झेलने वाले लोग | हर वर्ष 4 अरब | वैश्विक जनसंख्या का लगभग 50% |
| जल-असुरक्षित देशों में आबादी | वैश्विक स्तर पर 75% | अधिकांश लोग संवेदनशील क्षेत्रों में |
| बड़े झीलों का संकुचन (1990 के बाद) | 50% से अधिक | पारिस्थितिकी तंत्र का तीव्र पतन |
| भूजल भंडारण में गिरावट | 70% प्रमुख प्रणालियाँ | एक्विफ़र अस्थिर |
| आर्द्रभूमि का नुकसान (50 वर्ष) | यूरोपीय संघ के आकार के बराबर क्षेत्र | जैव विविधता विलुप्ति तेज |
| हिमनदों में गिरावट (1970 के बाद) | 30% | प्राकृतिक जल भंडारण समाप्त |
सबसे अधिक प्रभावित शहर: बीजिंग, दिल्ली, लॉस एंजेलिस, न्यूयॉर्क और रियो डी जेनेरो।
ये शहरी केंद्र 1.5 अरब लोगों और खरबों डॉलर की आर्थिक गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं—जिससे जल तनाव एक भू-राजनीतिक, आर्थिक और मानवीय संकट बन जाता है।
भारत का जल आपातकाल: उत्तर भारत संकट के केंद्र में
भारत एशिया में सबसे तीव्र जल तनाव झेल रहा है, विशेषकर उत्तरी क्षेत्रों में। विश्लेषण दर्शाता है कि एशिया में सूखने की प्रवृत्ति सबसे अधिक है, जिसमें उत्तर भारत और पाकिस्तान इस संकट के प्रमुख केंद्र हैं।
भारत के सबसे अधिक जल-संकटग्रस्त शहर
| शहर | वैश्विक रैंक | जल तनाव स्तर | प्रमुख चुनौती |
|---|---|---|---|
| दिल्ली | विश्व में 4वाँ | अत्यधिक उच्च | प्रतिदिन 190 मिलियन लीटर की कमी |
| कोलकाता | 9वाँ | उच्च | बार-बार जल संकट |
| मुंबई | 12वाँ | उच्च | मानसून-आधारित आपूर्ति |
| बेंगलुरु | 24वाँ | उच्च | कावेरी विवाद, हीट स्ट्रेस |
| चेन्नई | 29वाँ | अत्यधिक उच्च | “डे ज़ीरो” के करीब (2019 संकट) |
महानगरों से आगे, हैदराबाद, अहमदाबाद, सूरत और पुणे भी दीर्घकालिक जल अभाव का सामना कर रहे हैं। नीति आयोग ने चेतावनी दी है कि 2030 तक भारत के 21 प्रमुख शहरों में भूजल भंडार समाप्त हो सकते हैं।
भूजल के अत्यधिक दोहन का संकट
| राज्य/शहर | दोहन दर | स्थिति |
|---|---|---|
| पंजाब | वार्षिक पुनर्भरण का 156% | गंभीर अतिदोहन |
| राजस्थान | वार्षिक पुनर्भरण का 147% | अस्थिर क्षरण |
| दिल्ली | सतत सीमा का 90% | खतरे के करीब |
| भारत (प्रति व्यक्ति उपलब्धता) | 1,100 घन मीटर | जल तनाव सीमा से नीचे |
“डे ज़ीरो” की ओर बढ़ते वैश्विक शहर
“डे ज़ीरो” उस भयावह क्षण को दर्शाता है जब किसी शहर की नगरपालिका जल आपूर्ति पूरी तरह समाप्त हो जाती है और लोगों को आपातकालीन जल आपूर्ति पर निर्भर होना पड़ता है।
चेन्नई (भारत): 2019 में जलाशय सूख गए, 90 लाख लोग प्रभावित हुए, होटल, रेस्तराँ और व्यवसाय बंद हुए। शहर आज भी बार-बार सूखे से जूझ रहा है।
तेहरान (ईरान): लगातार छह वर्षों के सूखे के बाद “डे ज़ीरो” के करीब। ईरान के राष्ट्रपति ने चेतावनी दी कि यदि सूखने की प्रवृत्ति जारी रही तो शहर को खाली कराना पड़ सकता है।
केप टाउन (दक्षिण अफ्रीका): 2018 में “डे ज़ीरो” के करीब पहुँचा, कठोर राशनिंग लागू की और आपात उपायों से प्रणाली के पतन को टाला।
काबुल (अफगानिस्तान): आधुनिक इतिहास का पहला शहर बन सकता है जहाँ जल आपूर्ति पूरी तरह समाप्त हो जाए।
भूमि धँसाव: शहर सचमुच धँस रहे हैं
अत्यधिक भूजल दोहन से गंभीर भूमि धँसाव होता है—यह जल दिवालियापन का भौतिक रूप है।
| शहर | वार्षिक धँसाव दर | प्रभाव |
|---|---|---|
| मेक्सिको सिटी | 20 इंच (50 सेमी) प्रति वर्ष | दशकों का धँसाव कुछ वर्षों में |
| रफ़सांजान (ईरान) | 30 सेमी प्रति वर्ष | अवसंरचना क्षति तेज |
| ट्यूलारे (कैलिफ़ोर्निया) | 28 सेमी प्रति वर्ष | कृषि भूमि अनुपयोगी |
| जकार्ता, मनीला, लागोस, काबुल | गंभीर धँसाव | क्षेत्रीय अस्थिरता |
मेक्सिको सिटी इसका स्पष्ट उदाहरण है—जहाँ कभी समतल रहे इलाके अब स्पष्ट ऊँचाई अंतर दिखाते हैं। इससे अवसंरचना को नुकसान, बाढ़ का जोखिम और जल आपूर्ति समस्याएँ बढ़ती हैं।
मूल कारण: कुप्रबंधन और जलवायु संकट
1. अस्थिर जल दोहन
मानव उपयोग प्रकृति की पुनर्भरण क्षमता से कहीं तेज है। नदियाँ और एक्विफ़र जो सहस्राब्दियों तक सभ्यताओं को पोषित करते रहे, अब दशकों में खाली हो रहे हैं। भारत में 80% जल कृषि में खर्च होता है, फिर भी सिंचाई प्रणाली अक्षम है। बड़े निर्माण और औद्योगिक माँग दबाव बढ़ाते हैं।
2. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
हिमनदों का तेज़ पिघलना—प्राकृतिक भंडारण समाप्त
वर्षा पैटर्न में व्यवधान—मानसून अनिश्चित
झीलों/जलाशयों से अधिक वाष्पीकरण
लंबी शुष्क ऋतुएँ
45°C+ हीटवेव—माँग में तीव्र वृद्धि
यूएन विशेषज्ञ कावेह मदानी के अनुसार, “अस्थायी संकट” से “जल दिवालियापन” की भाषा में बदलाव इस सच्चाई को दर्शाता है कि “खोए हुए हिमनदों या खाली हुए एक्विफ़रों को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता—हम केवल आगे की हानि रोक सकते हैं और नई जल सीमाओं के अनुरूप संस्थानों को पुनर्रचित कर सकते हैं।”
बढ़ते जल संघर्ष: एक भू-राजनीतिक टाइम बम
जल अभाव संघर्ष को जन्म देता है।
जल विवाद समयरेखा:
2010: 20 दर्ज विवाद
2024: 400+ जल-संबंधित संघर्ष
प्रमुख नदी बेसिन अब समुद्र तक पहुँचने से पहले ही सूख जाते हैं:
कोलोराडो नदी (USA): एरिज़ोना, नेवादा, कैलिफ़ोर्निया में विवाद
सिंधु नदी: अफगानिस्तान–पाकिस्तान तनाव
टिगरिस–यूफ्रेटीस: इराक, सीरिया, तुर्की में प्रतिस्पर्धा
येलो नदी (चीन): प्रांतीय संघर्ष
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
GDP और आर्थिक प्रभाव
विश्व बैंक के अनुसार, असंयमित जल तनाव 2050 तक क्षेत्रीय GDP को 6% तक घटा सकता है।
शहरी असमानता
बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों में गरीब इलाकों के लोग महंगे निजी टैंकरों पर निर्भर हैं—असमानता बढ़ती है।
कृषि संकट
3.5 करोड़ भारतीयों को सुरक्षित जल उपलब्ध नहीं। सिंचाई न होने से फसल विफलता, ग्रामीण-शहरी पलायन और खाद्य मुद्रास्फीति।
प्रवासन और विस्थापन
यूएन के अनुसार, “जल दिवालियापन अस्थिरता, विस्थापन और संघर्ष को बढ़ा रहा है।”
नीतिगत समाधान: क्या बदलना होगा
अपरिवर्तनीय हानि को स्वीकारें
संकट प्रबंधन से दिवालियापन प्रबंधन की ओर बदलाव।
कृषि और उद्योग का पुनर्रचना
ड्रिप सिंचाई, प्रिसिजन एग्रीकल्चर
जल-गहन उद्योगों में सर्कुलर इकॉनॉमी
कृषि जल दोहन को टिकाऊ स्तर तक लाना
शहरी अवसंरचना मज़बूत करें
पाइपलाइन सुधार (नॉन-रेवेन्यू वॉटर कम)
भूजल दोहन पर नियंत्रण
वर्षा जल संचयन, पुनर्चक्रण
न्यायसंगत आवंटन ढाँचा
पेयजल व स्वच्छता को प्राथमिकता
नदियों में पर्यावरणीय प्रवाह
कमजोर वर्गों की सुरक्षा
आगामी यूएन अवसरों का उपयोग
2026 और 2028 यूएन जल सम्मेलन, 2030 SDG समयसीमा।
UPSC परीक्षा के लिए महत्त्व
GS Paper I: भूगोल एवं पर्यावरण
जैव विविधता और संरक्षण
पर्यावरणीय क्षरण
जलवायु परिवर्तन और जल प्रणालियाँ
GS Paper III: पर्यावरण एवं सतत विकास
SDG 6, 13, 2
भारत-विशेष चुनौतियाँ
सरकारी योजनाएँ
संभावित प्रश्न
“जल नया तेल है—एशिया में जल संकट के भू-राजनीतिक प्रभाव।”
“भारत कृषि उत्पादन और भूजल स्थिरता में संतुलन कैसे बनाए?”
त्वरित पुनरावृत्ति बिंदु
| अवधारणा | प्रमुख डेटा | परीक्षा उपयोगिता |
|---|---|---|
| जल तनावग्रस्त शहर | 100 में से 50 | वैश्विक प्रभाव |
| प्रभावित आबादी | 4 अरब | मानवीय संकट |
| भारत के शहर | दिल्ली, चेन्नई | केस स्टडी |
| भूजल दोहन (पंजाब) | 156% | अस्थिरता |
| भूमि धँसाव | 20 इंच/वर्ष | अवसंरचना जोखिम |
| जल संघर्ष | 20 → 400+ | भू-राजनीति |
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित “वैश्विक जल दिवालियापन” एक निर्णायक मोड़ है। यह अब क्षेत्रीय या अस्थायी संकट नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक वैश्विक वास्तविकता है, जो 4 अरब लोगों और दुनिया के आधे बड़े शहरों को प्रभावित कर रही है। भारत—जहाँ कई शहर अत्यधिक तनाव में हैं और कुछ राज्यों में दोहन 150% से अधिक है—इस संकट के केंद्र में है।
UPSC अभ्यर्थियों के लिए, यह विषय भूगोल, जलवायु विज्ञान, पर्यावरण नीति, भू-राजनीति और शासन को एकीकृत विश्लेषण में समझने की माँग करता है। यह लेख उच्च अंक प्राप्त करने हेतु आवश्यक तथ्य, संरचना और विश्लेषण प्रदान करता है।