UPSC Current Affairs May 25, 2026: मरुस्थलीकरण को रोकने वाली 'सॉयलिफिकेशन' तकनीक | Daily GK Update | Atharva Examwise Current News

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भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग $29.77\%$ हिस्सा वर्तमान में भूमि क्षरण (Land Degradation) और मरुस्थलीकरण (Desertification) की गंभीर समस्या से जूझ रहा है । यह पारिस्थितिक संकट विशेष रूप से पश्चिमी राजस्थान में अरावली पर्वतमाला के निरंतर हो रहे क्षरण, अनियंत्रित खनन और रेत के टीलों के तीव्र प्रसार के कारण और अधिक विकराल हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप थार मरुस्थल का विस्तार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की ओर हो रहा है । इस गंभीर संकट के समाधान के रूप में, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय (CURAJ), अजमेर के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित 'डेजर्ट सॉयलिफिकेशन' (Desert Soilification) तकनीक ने सतत कृषि और मरुस्थलीय भूमि सुधार के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी मार्ग प्रशस्त किया है ।

विश्वविद्यालय के सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग (Department of Microbiology) के एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. अखिल अग्रवाल और उनकी टीम द्वारा विकसित यह तकनीक न केवल मरुस्थलीय रेत को उपजाऊ मिट्टी में परिवर्तित करती है, बल्कि देश के खाद्य सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है । प्रतियोगी परीक्षाओं और विशेष रूप से संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए पर्यावरण, जैव प्रौद्योगिकी और कृषि के दृष्टिकोण से यह खोज अत्यधिक महत्वपूर्ण है । इस विषय से संबंधित सभी आवश्यक वैज्ञानिक, भौगोलिक और नीतिगत पहलुओं का विस्तृत विश्लेषण नीचे प्रस्तुत है।

सॉयलिफिकेशन तकनीक: रेत को उपजाऊ मिट्टी में बदलने का विज्ञान

पारंपरिक रूप से, मरुस्थलीय रेत में संसंजकता (cohesion) की कमी, उच्च पारगम्यता (permeability) और कार्बनिक पदार्थों की अनुपस्थिति पाई जाती है, जिसके कारण यह जल और आवश्यक पोषक तत्वों को संचित करने में पूरी तरह असमर्थ होती है । 'डेजर्ट सॉयलिफिकेशन' तकनीक इस भौतिक और जैविक बाधा को दूर करने के लिए विकसित की गई एक उन्नत बायो-इंजीनियरिंग विधि है ।

पॉलीमर-आधारित कण समूहन और यांत्रिक परिवर्तन

इस तकनीक के तहत शोधकर्ताओं ने एक स्वदेशी 'बायोफॉर्मुलेशन' (जैव-उत्पाद) विकसित किया है जो मुख्य रूप से प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल पॉलिमर पर आधारित है । इस बायोफॉर्मुलेशन को जब रेगिस्तानी रेत में मिलाया जाता है, तो यह रेत के एकल कणों को आपस में जोड़कर उन्हें मिट्टी जैसी स्थिर और छिद्रयुक्त संरचना (porous structure) प्रदान करता है ।

वैज्ञानिकों ने रेत के सुदृढ़ीकरण के लिए ज़ैंथन गम (xanthan gum), ग्वार गम (guar gum), गम ट्रैगाकैंथ (gum tragacanth), कार्बोक्सीमिथाइल सेलुलोज (CMC) और हाइड्रोक्सीएथिल सेलुलोज (HEC) जैसे विभिन्न पॉलिमर का गहन मूल्यांकन किया । इसके तहत ग्वार गम के उपयोग से रेत के यांत्रिक गुणों में हुए गुणात्मक सुधारों को नीचे दी गई तालिका में स्पष्ट किया गया है:

रेत पर पॉलिमर (ग्वार गम) संशोधन के यांत्रिक प्रभाव

भौतिक-यांत्रिक गुणअनुपचारित रेगिस्तानी रेतग्वार गम संशोधित रेत (1.5% सांद्रता पर)प्रतिशत सुधार / प्रभाव
क्योरिंग (उपचार) अवधिलागू नहीं$21\text{ days}$ (इष्टतम अवधि)कणों के मध्य सुदृढ़ बॉन्डिंग का निर्माण
संपीड़न शक्ति (Compressive Strength)नगण्यअत्यधिक उच्च स्तर$364.59\%$ की भारी वृद्धि
तन्य शक्ति (Tensile Strength)शून्यउच्च लचीलापन और बॉन्डिंग$765.10\%$ की वृद्धि
संसंजक बल (Cohesive Force)$0\text{ kPa}$ (शून्य सामर्थ्य)$487.65\text{ kPa}$ की वृद्धिरेत के कणों का आपस में सघन जुड़ाव
आंतरिक घर्षण कोण (Inner Friction Angle)निम्नउच्च स्थिरता$63.72\%$ की वृद्धि
पारगम्यता गुणांक (Permeability Coefficient)अत्यधिक उच्च (तीव्र जल रिसाव)अत्यधिक निम्न (जल संचयन क्षमता)$97.5\%$ की कमी (जल रिसाव पर प्रभावी रोक)

इस भौतिक संशोधन के अलावा, सूक्ष्म परीक्षणों (Scanning Electron Microscope - SEM) से स्पष्ट हुआ है कि ग्वार गम रेत के भीतर एक स्थिर हाइड्रोजेल परत का निर्माण करता है, जो पौधों की जड़ों के आसपास नमी और पोषक तत्वों को बांधकर रखता है ।

सायनोबैक्टीरिया जैव-द्रव्यमान का एकीकरण

इस तकनीक की जैव-रासायनिक प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के 'स्टेट साइंस एंड टेक्नोलॉजी प्रोग्राम' (SSTP) के तहत वर्ष 2019 से 2022 के बीच एक महत्वपूर्ण परियोजना संचालित की गई, जिसका कुल बजट $₹33,70,240$ था । इस परियोजना के अंतर्गत पॉलिमर के साथ-साथ सायनोबैक्टीरिया जैव-द्रव्यमान (Cyanobacterial Biomass) का उपयोग किया गया ।

सायनोबैक्टीरिया न केवल रेत के कणों को बांधने में मदद करते हैं, बल्कि मिट्टी में प्राकृतिक नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम (NPK) जैसे आवश्यक पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं । यह प्रक्रिया जड़ों के आसपास के सूक्ष्मजीव पर्यावरण (rhizospheric soil) को समृद्ध करती है और फसलों की अजैविक तनाव (Abiotic Stress) जैसे सूखा और उच्च तापमान को सहने की क्षमता को बढ़ाती है 。

मैदानी परीक्षण और कृषि उत्पादकता में क्रांतिकारी परिणाम

इस तकनीक की वास्तविक प्रभावशीलता को परखने के लिए प्रयोगशाला के प्रयोगों को राजस्थान के वास्तविक मरुस्थलीय खेतों में स्थानांतरित किया गया । इस प्रक्रिया में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और राजस्थान राज्य के बागवानी विभाग (Horticulture Department) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

बसेली गांव में गेहूं-4079 का ऐतिहासिक परीक्षण

नवंबर 2024 में, अजमेर के पुष्कर के निकट बसेली गांव में थार रेगिस्तान के मुहाने पर स्थित $1,000\text{ वर्ग मीटर}$ ($1,000\text{ m}^2$) के रेतीले भूखंड पर इस तकनीक का पहला मैदानी परीक्षण शुरू किया गया ।

फसल की किस्म: वैज्ञानिकों ने बुवाई के लिए स्वदेशी और जलवायु-अनुकूल 'गेहूं-4079' (Wheat-4079) किस्म का चयन किया ।

बीज और उपज का अनुपात: मात्र $13\text{ kg}$ बीज की बुवाई से अप्रैल 2025 में $260\text{ kg}$ गेहूं की ऐतिहासिक फसल प्राप्त हुई । यह बीज से उपज का $1:20$ का अनुपात दर्शाता है, जो बिना तकनीक वाले शुष्क क्षेत्रों की तुलना में दोगुना उत्पादकता स्तर है ।

सिंचाई जल की बचत: इस तकनीक के उपयोग से गेहूं की फसल को सामान्य $5\text{--}6$ सिंचाई चक्रों के स्थान पर केवल $3\text{--}4$ सिंचाई चक्रों की आवश्यकता पड़ी । यह जल-बचत प्रभाव शुष्क क्षेत्रों में भूजल संरक्षण के दृष्टिकोण से अत्यंत क्रांतिकारी है ।

जैसलमेर की रेत पर मोटे अनाजों और दलहन का परीक्षण

विश्वविद्यालय परिसर में $100\text{ tonnes}$ जैसलमेर की मूल रेगिस्तानी रेत लाकर $400\text{ वर्ग फीट}$ के क्षेत्र में एक अन्य परीक्षण किया गया । इसके अंतर्गत बाजरा, ग्वार और चना जैसी शुष्क क्षेत्र की पारंपरिक फसलों पर बायोफॉर्मुलेशन का अनुप्रयोग किया गया, जिसके परिणामस्वरूप सामान्य अनुपचारित मरुस्थलीय मिट्टी की तुलना में उत्पादकता में $54\%$ की भारी वृद्धि दर्ज की गई ।

सॉयलिफिकेशन तकनीक के मैदानी परीक्षणों का समेकित विवरण

लक्षित फसलपरीक्षण का स्थान व स्केलप्रमुख कृषि इनपुटप्राप्त परिणाम और उत्पादकतासिंचाई एवं जल दक्षता
गेहूं-4079 (स्वदेशी किस्म)बसेली गांव, अजमेर (रेतीली भूमि)$13\text{ kg}$ बीज; $1,000\text{ m}^2$ क्षेत्र$260\text{ kg}$ कुल उपज ($1:20$ का उत्कृष्ट अनुपात)सिंचाई चक्रों में $40\%$ की कमी (केवल $3\text{--}4$ चक्र आवश्यक)
बाजरा, ग्वार और चनाCURAJ परिसर (जैसलमेर से लाई गई रेत)$100\text{ tonnes}$ मरुस्थलीय रेत का बेडउत्पादकता में $54\%$ की शुद्ध वृद्धिरेत की जल धारण क्षमता में अभूतपूर्व सुधार

पारिस्थितिकी और समाज पर बहु-स्तरीय प्रभाव

इस तकनीक के व्यावहारिक अनुप्रयोग से पर्यावरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर व्यापक सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है, जिन्हें तीन प्रमुख स्तरों पर समझा जा सकता है:

प्रथम-स्तरीय प्रभाव: रेत का स्थिरीकरण और मृदा स्वास्थ्य में सुधार

पॉलिमर और सायनोबैक्टीरिया का मिश्रण रेत के कणों को आपस में बांधकर हवा के द्वारा होने वाले मृदा क्षरण (Wind Erosion) को रोकता है । यह मरुस्थलीय क्षेत्रों में धूल भरी आंधियों की तीव्रता को कम करता है और बंजर भूमि में कार्बनिक कार्बन (Organic Carbon) के स्तर को बढ़ाता है, जिससे जैव-विविधता की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त होता है ।

द्वितीय-स्तरीय प्रभाव: जल संसाधनों का संरक्षण और जलवायु-अनुकूल कृषि

सिंचाई की आवश्यकता को आधा करके यह तकनीक भूजल के अति-दोहन को रोकती है । थार जैसे मरुस्थलीय क्षेत्रों में जहां जल की कमी एक स्थायी संकट है, यह प्रणाली किसानों को जल-तनाव की स्थिति में भी टिकाऊ कृषि जारी रखने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने में सक्षम बनाती है ।

तृतीय-स्तरीय प्रभाव: ग्रामीण रोजगार का सृजन और मरुस्थलीकरण पर रोक

बंजर मरुस्थलीय भूमि को कृषि योग्य बनाकर यह तकनीक सीमांत किसानों की आय को दोगुना करने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने में सक्षम है । यह तकनीक थार मरुस्थल के दिल्ली-एनसीआर की ओर बढ़ते कदमों को रोककर एक विशाल 'हरित पट्टी' (Green Shield) के निर्माण में भी सहायक हो सकती है ।

भारत की वैश्विक प्रतिबद्धताओं और सतत विकास लक्ष्यों के साथ संरेखण

यह स्वदेशी नवोन्मेष केवल एक क्षेत्रीय तकनीकी विकास नहीं है, बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारत के पर्यावरणीय प्रतिज्ञाओं को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपकरण है ।

यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (UNCCD): भारत UNCCD का एक प्रतिबद्ध हस्ताक्षरकर्ता देश है । वर्ष 2019 में नई दिल्ली में आयोजित COP14 शिखर सम्मेलन के दौरान, भारत ने अपने भूमि बहाली के लक्ष्य को $21\text{ million hectares}$ से बढ़ाकर $26\text{ million hectares}$ कर दिया था, जिसे 2030 तक पूरा किया जाना है । सॉयलिफिकेशन जैसी स्वदेशी तकनीकें इस राष्ट्रीय लक्ष्य को समय पर प्राप्त करने में केंद्रीय भूमिका निभा सकती हैं 。

बॉन चुनौती (Bonn Challenge): भारत ने बॉन चुनौती के तहत वर्ष 2020 तक $13\text{ million hectares}$ और 2030 तक अतिरिक्त $8\text{ million hectares}$ (कुल $21\text{ million hectares}$) निम्नीकृत और वनोन्मूलित भूमि को पुनर्जीवित करने का स्वैच्छिक संकल्प लिया था, जिसे बाद में बढ़ाकर $26\text{ million hectares}$ किया गया ।

अतिरिक्त कार्बन सिंक का निर्माण: पेरिस समझौते के तहत भारत ने अपनी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित प्रतिबद्धताओं (NDCs) में वर्ष 2030 तक वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से $2.5\text{--}3\text{ billion tonnes}$ $CO_2$ के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाने का संकल्प लिया है । रेगिस्तानी क्षेत्रों को हरित कृषि क्षेत्रों में बदलना मिट्टी में कार्बन के दीर्घकालिक संचयन (Carbon Sequestration) को बढ़ावा देता है ।

सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति: यह तकनीक विशेष रूप से SDG 15.3 (जिसका लक्ष्य भूमि क्षरण तटस्थता - Land Degradation Neutrality को प्राप्त करना है) और SDG 2.4 (जो टिकाऊ और लचीली खाद्य उत्पादन प्रणालियों को बढ़ावा देता है) के लक्ष्यों के साथ पूर्णतः संरेखित है ।

Why this matters for your exam preparation

यह विषय संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य राज्य लोक सेवा आयोगों (जैसे RPSC) की परीक्षाओं के लिए बहु-आयामी महत्व रखता है। परीक्षा के विभिन्न प्रश्नपत्रों में इसका उपयोग निम्नानुसार किया जा सकता है:

मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-I (भारत का भूगोल)

पाठ्यक्रम लिंक: भारत के भौतिक भूगोल की मुख्य विशेषताएं; कृषि का भौगोलिक प्रतिरूप; मरुस्थलीकरण की समस्या और उसके भौगोलिक कारक।

उपयोग: अभ्यर्थी मरुस्थलीकरण को रोकने और थार रेगिस्तान के पूर्वी विस्तार को नियंत्रित करने के उपायों के अंतर्गत 'सॉयलिफिकेशन तकनीक' को एक अत्यंत प्रभावी और व्यावहारिक केस स्टडी के रूप में लिख सकते हैं ।

मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)

पाठ्यक्रम लिंक: स्वदेशी रूप से विकसित तकनीक; जैव प्रौद्योगिकी का कृषि में अनुप्रयोग।

उपयोग: जैव-पॉलिमर (ग्वार गम और सायनोबैक्टीरिया जैव-उत्पाद) के उपयोग द्वारा मिट्टी की संरचना में किए जाने वाले यांत्रिक सुधारों को समझाकर अभ्यर्थी उत्तरों में तकनीकी गहराई प्रदर्शित कर सकते हैं । इसे 'अनुप्रयुक्त विज्ञान का सामाजिक प्रभाव' (Applied Science with Societal Impact) के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है ।

मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III (पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी)

पाठ्यक्रम लिंक: पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण; संरक्षण के राष्ट्रीय और वैश्विक प्रयास (UNCCD, बॉन चुनौती, SDG 15.3) ।

उपयोग: भारत द्वारा वर्ष 2030 तक $26\text{ million hectares}$ बंजर भूमि को बहाल करने के लक्ष्य और अतिरिक्त कार्बन सिंक के निर्माण से जोड़ते हुए इस जैव-तकनीक के पारिस्थितिक लाभों को रेखांकित किया जा सकता है ।

अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1. 'डेजर्ट सॉयलिफिकेशन' (Desert Soilification) तकनीक के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

यह तकनीक मरुस्थलीय रेत के कणों को आपस में जोड़ने के लिए कृत्रिम सिंथेटिक रसायनों के स्थान पर प्राकृतिक जैव-पॉलिमर और सायनोबैक्टीरिया का उपयोग करती है।

ग्वार गम जैसी प्राकृतिक बाइंडिंग सामग्रियों का उपयोग करने पर रेत का पारगम्यता गुणांक (Permeability Coefficient) बढ़ जाता है, जिससे जल का तीव्र रिसाव सुनिश्चित होता है।

यह तकनीक संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) के तहत भारत के 'भूमि क्षरण तटस्थता' (LDN) लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 and 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c) केवल 1 और 3

स्पष्टीकरण: कथन 1 सही है क्योंकि सॉयलिफिकेशन तकनीक प्राकृतिक पॉलिमर (जैसे ग्वार गम) और सायनोबैक्टीरिया जैव-द्रव्यमान का उपयोग करती है । कथन 2 गलत है क्योंकि ग्वार गम संशोधित रेत का पारगम्यता गुणांक $97.5\%$ तक घट जाता है, जिससे जल का रिसाव रुकता है और जल संचयन क्षमता बढ़ती है (न कि घटती है) । कथन 3 सही है क्योंकि बंजर भूमि को पुनर्स्थापित करने से भारत को 2030 तक $26\text{ million hectares}$ बंजर भूमि को बहाल करने के UNCCD लक्ष्यों को पूरा करने में सहायता मिलेगी ।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 2. "मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए केवल पारंपरिक वृक्षारोपण पर्याप्त नहीं है; इसके लिए अभिनव जैव-वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सतत मृदा प्रबंधन की आवश्यकता है।" राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा विकसित 'डेजर्ट सॉयलिफिकेशन' तकनीक के विशेष संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

उत्तर लेखन हेतु मुख्य रूपरेखा:

भूमिका: भारत में भूमि क्षरण की वर्तमान स्थिति (लगभग $29.77\%$ भौगोलिक क्षेत्र प्रभावित) और थार रेगिस्तान के निरंतर प्रसार से उत्पन्न संकट का उल्लेख करते हुए उत्तर की शुरुआत करें ।

मुख्य भाग (भाग 1): 'डेजर्ट सॉयलिफिकेशन' तकनीक के वैज्ञानिक आधार को समझाएं । इसमें प्राकृतिक जैव-पॉलिमर (जैसे ग्वार गम) द्वारा रेत की संपीड़न व तन्य शक्ति में वृद्धि करने तथा सायनोबैक्टीरिया द्वारा NPK पोषक तत्वों की आपूर्ति के तंत्र को स्पष्ट करें । बसेली गांव के गेहूं कृषि परीक्षण ($1:20$ उपज अनुपात और $40\%$ पानी की बचत) के ठोस डेटा को प्रस्तुत करें ।

मुख्य भाग (भाग 2): इस तकनीक के नीतिगत और वैश्विक पारिस्थितिक महत्व का विश्लेषण करें । यह भारत के UNCCD के तहत $26\text{ million hectares}$ भूमि बहाली लक्ष्य, बॉन चुनौती, पेरिस समझौते के तहत अतिरिक्त कार्बन सिंक के निर्माण तथा सतत विकास लक्ष्य (SDG 15.3 - भूमि क्षरण तटस्थता) को प्राप्त करने में कैसे योगदान देती है, इसे रेखांकित करें ।

चुनौतियां: इस तकनीक के बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग (Commercial Scale-up) में आने वाली चुनौतियां, जैसे उच्च प्रारंभिक लागत, बड़े क्षेत्रों में अनुप्रयोग की व्यावहारिक कठिनाइयां और जैव-सुरक्षा आकलन की आवश्यकता पर प्रकाश डालें ।

निष्कर्ष: एक सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ निष्कर्ष प्रस्तुत करें कि सॉयलिफिकेशन जैसी स्वदेशी तकनीकें वैज्ञानिक अनुसंधान को जमीनी स्तर पर लाकर न केवल मरुस्थलीकरण को रोक सकती हैं, बल्कि ग्रामीण भारत में पारिस्थितिक और आर्थिक समृद्धि का नया मार्ग भी प्रशस्त कर सकती हैं ।

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