परिचय: पृथ्वी की संवेदनशीलता की एक खगोलीय चेतावनी
18–20 जनवरी 2026 के बीच पृथ्वी ने एक असाधारण खगोलीय घटना का अनुभव किया—पिछले दो दशकों में सबसे शक्तिशाली सौर विकिरण तूफान।
नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने पुष्टि की कि एक शक्तिशाली X1.9 श्रेणी के सौर ज्वालामुखीय विस्फोट (Solar Flare) और उससे जुड़े कोरोनल मास इजेक्शन (CME) के बाद S4-स्तरीय (Severe) सौर विकिरण तूफान उत्पन्न हुआ।
इसके बाद उत्पन्न जियोमैग्नेटिक विक्षोभ के कारण असामान्य अक्षांशों पर भी भव्य ऑरोरा (Northern Lights) दिखाई दिए—अमेरिका के मिडवेस्ट से लेकर यूनाइटेड किंगडम तक।
इस घटना ने सूर्य की अपार शक्ति और आधुनिक सभ्यता की स्पेस वेदर पूर्वानुमान पर निर्भरता को रेखांकित किया।
UPSC अभ्यर्थियों के लिए, यह घटना GS Paper III (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी) के अंतर्गत अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेषकर स्पेस वेदर, सौर भौतिकी, और भारत की आदित्य-L1 सौर मिशन क्षमता के संदर्भ में।
सौर तूफानों को समझना: इस घटना के पीछे का भौतिक विज्ञान
सौर फ्लेयर और कोरोनल मास इजेक्शन क्या हैं?
सौर फ्लेयर (Solar Flare) सूर्य की सतह से होने वाला एक अचानक और विस्फोटक विद्युत-चुंबकीय विकिरण का उत्सर्जन होता है। यह आमतौर पर सनस्पॉट्स के ऊपर घटित होता है—जहाँ अत्यधिक मुड़ी हुई चुंबकीय रेखाएँ अस्थिर हो जाती हैं।
इसमें मुक्त होने वाली ऊर्जा लाखों परमाणु बमों के बराबर होती है और यह उच्च-ऊर्जा कणों तथा विकिरण को लगभग प्रकाश की गति से अंतरिक्ष में भेज देती है।
कोरोनल मास इजेक्शन (CME) इससे अलग लेकिन अक्सर जुड़ी हुई घटना है।
यह सूर्य के बाहरी वायुमंडल (कोरोना) से चुंबकीय प्लाज़्मा का विशाल विस्फोट होता है, जिसमें अरबों टन पदार्थ 1,700 किमी/सेकंड से अधिक की गति से अंतरिक्ष में फेंका जा सकता है।
जनवरी 2026 की घटना के दौरान, SOHO उपग्रहों ने CME को लगभग 1,700 किमी/सेकंड की गति से यात्रा करते हुए देखा, जो 25 घंटे के भीतर पृथ्वी के मैग्नेटोस्फियर तक पहुँच गया।
मुख्य अंतर:
सभी सौर फ्लेयर CME उत्पन्न नहीं करते, और सभी CME फ्लेयर से उत्पन्न नहीं होते। हालांकि, दोनों अक्सर मैग्नेटिक रिकनेक्शन प्रक्रिया से जुड़े होते हैं—जहाँ चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं का अचानक पुनर्संयोजन संचित ऊर्जा को मुक्त करता है।
सौर विकिरण तूफान: जनवरी 2026 की घटना
18–20 जनवरी 2026 का सौर विकिरण तूफान NOAA की पाँच-स्तरीय S-स्केल (S1–S5) पर S4 (Severe) स्तर तक पहुँचा।
यह अक्टूबर 2003 के बाद दर्ज किया गया सबसे शक्तिशाली सौर विकिरण तूफान था।
मुख्य तथ्य
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| वर्गीकरण | S4 Severe (5-स्तरीय स्केल में दूसरा सबसे उच्च) |
| ट्रिगर घटना | X1.9 श्रेणी का सौर फ्लेयर |
| संबंधित CME | हाँ, 18 जनवरी को SOHO द्वारा देखा गया |
| यात्रा गति | ~1,700 किमी/सेकंड |
| पृथ्वी पर आगमन | 19–20 जनवरी 2026 (25 घंटे के भीतर) |
| जियोमैग्नेटिक तूफान स्तर | G4 (Severe) दो बार |
| पिछली तुलनीय घटना | अक्टूबर 2003 |
| अवधि | कई घंटों तक तीव्र गतिविधि |
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
इन तूफानों में मौजूद उच्च-ऊर्जा कण—प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन और अल्फा कण—
• उपग्रह इलेक्ट्रॉनिक्स को नुकसान पहुँचा सकते हैं
• वायुमंडल में द्वितीयक कण उत्पन्न कर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में त्रुटियाँ ला सकते हैं
• अंतरिक्ष यात्रियों के लिए स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकते हैं
सौर चक्र की भूमिका: 2026 उच्च गतिविधि वाला वर्ष क्यों है
सौर गतिविधि लगभग 11-वर्षीय चक्र में होती है, जिसे सनस्पॉट्स की गिनती से मापा जाता है।
वर्तमान सोलर साइकिल-25 दिसंबर 2019 में शुरू हुई और प्रारंभिक अनुमानों से कहीं अधिक शक्तिशाली सिद्ध हुई।
सोलर साइकिल-25 टाइमलाइन
प्रारंभ: दिसंबर 2019
चरम: अक्टूबर 2024 (स्मूद सनस्पॉट संख्या: 161)
अनुमानित अंत: ~2030
2024: 50 से अधिक X-क्लास फ्लेयर
2025: नवंबर तक 19 X-क्लास फ्लेयर
जनवरी 2026: चरम के बाद भी उच्च गतिविधि
सूर्य का “चरम” पृथ्वी के मौसमी चरम जैसा नहीं होता—सौर गतिविधि लंबे समय तक ऊँची बनी रह सकती है।
इसी कारण 2026 में भी शक्तिशाली तूफान संभव हैं।
ऑरोरा निर्माण: जब सौर पवन पृथ्वी के मैग्नेटोस्फियर से टकराती है
जनवरी 2026 के सौर तूफान से असामान्य रूप से निम्न अक्षांशों पर भी ऑरोरा दिखाई दिए—अमेरिका, कैलिफ़ोर्निया और उत्तरी यूरोप में।
ऑरोरा बनने की प्रक्रिया
सौर पवन का प्रभाव
सूर्य से निकलने वाले आवेशित कणों की धारा तूफान के समय अत्यधिक तीव्र हो जाती है।
मैग्नेटोस्फियर से जुड़ाव
जब इंटरप्लानेटरी मैग्नेटिक फील्ड (IMF) दक्षिणमुखी हो जाती है, तो मैग्नेटिक रिकनेक्शन होता है।
कणों का त्वरण
पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में फँसे इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा प्राप्त करते हैं।
वायुमंडलीय टकराव
ये इलेक्ट्रॉन 100–300 किमी ऊँचाई पर ऑक्सीजन और नाइट्रोजन से टकराते हैं।
प्रकाश उत्सर्जन
हरा/लाल: ऑक्सीजन
नीला/बैंगनी: नाइट्रोजन
कम अक्षांशों पर क्यों दिखे?
G4–G5 तूफानों में ऑरोरल ओवल भूमध्य रेखा की ओर फैल जाता है।
स्पेस वेदर के प्रभाव: सुंदरता से आगे
उपग्रह और GPS
उपग्रहों की कक्षा में बदलाव
GPS सिग्नल में अस्थायी त्रुटियाँ
विद्युत ग्रिड
लंबी ट्रांसमिशन लाइनों में प्रेरित करंट
ट्रांसफॉर्मर फेल होने का जोखिम
विमानन
ध्रुवीय मार्गों पर उड़ानों का पुनर्निर्धारण
विकिरण जोखिम में वृद्धि
संचार
शॉर्टवेव रेडियो और सैटेलाइट संचार बाधित
महत्वपूर्ण तथ्य (परीक्षा के लिए):
❌ सौर तूफान से सुनामी, भूकंप या जंगल की आग नहीं होती
✅ प्रभाव केवल ऊपरी वायुमंडल और अंतरिक्ष तक सीमित रहता है
भारत की प्रतिक्रिया: आदित्य-L1 मिशन
जनवरी 2026 के तूफान के दौरान, भारत का पहला समर्पित सौर मिशन आदित्य-L1, सूर्य-पृथ्वी लैग्रेंज पॉइंट-1 (L1) पर स्थित होकर अभूतपूर्व अवलोकन कर रहा था।
मिशन विवरण
प्रक्षेपण: 2 सितंबर 2023
दूरी: 15 लाख किमी
कक्षा: हेलो ऑर्बिट
लाभ:
निरंतर सूर्य अवलोकन
30–60 मिनट की अग्रिम चेतावनी
CME की शक्ति का पूर्व-मूल्यांकन
आदित्य-L1 पेलोड्स
| पेलोड | कार्य |
|---|---|
| VELC | सौर कोरोना और CME अध्ययन |
| SUIT | फोटोस्फियर व क्रोमोस्फियर इमेजिंग |
| ASPEX | सौर पवन कण विश्लेषण |
| PAPA | प्लाज़्मा गुण मापन |
विशेष क्षमता:
VELC दृश्य प्रकाश में CME का तापमान और ऊर्जा माप सकता है—यह एक अनूठी विशेषता है।
UPSC परीक्षा के लिए महत्व
GS Paper III
स्पेस टेक्नोलॉजी
इंफ्रास्ट्रक्चर सुरक्षा
आपदा प्रबंधन
संभावित प्रश्न
सौर तूफानों के प्रभाव
आदित्य-L1 की भूमिका
L1 लैग्रेंज पॉइंट
भ्रांतियाँ जिनसे बचें
❌ सौर तूफान सतही मौसम बदलते हैं
✅ प्रभाव केवल अंतरिक्ष तक सीमित
निष्कर्ष: अवलोकन से नीति तक
जनवरी 2026 का सौर तूफान आधुनिक तकनीकी सभ्यता की संवेदनशीलता को दर्शाता है।
आदित्य-L1 भारत की वैज्ञानिक और रणनीतिक क्षमता का प्रतीक है।
UPSC अभ्यर्थियों के लिए, यह विषय विज्ञान, नीति, अवसंरचना और राष्ट्रीय सुरक्षा का संगम है—उच्च प्राथमिकता वाला।