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UPSC Current Affairs June 05, 2026: तमिलनाडु का जलकंठेश्वर मंदिर और विजयनगर वास्तुकला | Atharva Examwise Daily GK Update UPSC Current Affairs June 05, 2026: तमिलनाडु का जलकंठेश्वर मंदिर और विजयनगर वास्तुकला | Atharva Examwise Daily GK Update

05 Jun 2026 05 Jun 2026

UPSC Current Affairs June 05, 2026: तमिलनाडु का जलकंठेश्वर मंदिर और विजयनगर वास्तुकला | Atharva Examwise Daily GK Update
Art & Culture Hindi 05 Jun 2026

UPSC Current Affairs June 05, 2026: तमिलनाडु का जलकंठेश्वर मंदिर और विजयनगर वास्तुकला | Atharva Examwise Daily GK Update

वेल्लोर किले के जलकंठेश्वर मंदिर का परिचय

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य राज्य स्तरीय प्रशासनिक सेवाओं की परीक्षाओं में दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला, कला एवं संस्कृति (GS पेपर-I) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। इस संदर्भ में, तमिलनाडु के वेल्लोर जिले में स्थित जलकंठेश्वर शिव मंदिर ऐतिहासिक संक्रमण, वास्तुकला की विविधता और सांस्कृतिक संघर्ष का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है । वेल्लोर के प्राचीन और अभेद्य किले के भीतर स्थित यह मंदिर मुख्य रूप से भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें यहाँ 'जलकंठेश्वर' के रूप में पूजा जाता है । विजयनगर साम्राज्य के चरमोत्कर्ष के दौरान निर्मित यह स्थापत्य कला न केवल दक्षिण भारतीय शिल्प कौशल की पराकाष्ठा को दर्शाती है, बल्कि भारत के औपनिवेशिक और प्रशासनिक इतिहास में 'जीवंत विरासत' (Living Heritage) के संरक्षण से संबंधित समकालीन बहसों को भी उजागर करती है । इतिहास और कला के गहन विश्लेषण के लिए उम्मीदवार Atharva Examwise Current News के अन्य राष्ट्रीय महत्व के विश्लेषणों का भी संदर्भ ले सकते हैं।   

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पौराणिक मान्यताएँ

जलकंठेश्वर मंदिर के निर्माण और इसकी धार्मिक उत्पत्ति की कथाएँ विजयनगर काल की स्थानीय राजनीति और क्षेत्रीय लोककथाओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वर्तमान गर्भगृह के स्थान पर पहले एक विशाल दीमक की बांबी (Anthill) हुआ करती थी, जो चारों ओर वर्षा के जल से घिरी हुई थी । इस बांबी के भीतर एक स्वयंभू शिवलिंग स्थापित था ।   

विजयनगर साम्राज्य के सम्राट सदाशिवदेव महाराया के अधीनस्थ नायक शासक चिन्ना बोम्मी रेड्डी नायक को स्वप्न में भगवान शिव ने इस स्थान पर मंदिर निर्माण का निर्देश दिया था । तदुपरान्त, नायक शासक ने उस बांबी को हटवाकर वहाँ शिवलिंग की पुनर्स्थापना की और एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया । चूंकि यह शिवलिंग प्राचीन काल से ही जल से घिरे क्षेत्र में स्थापित था, इसलिए इस मंदिर का नाम 'जलकंठेश्वर' पड़ा, जिसका शाब्दिक अर्थ है "जल में निवास करने वाले भगवान शिव" । स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, मूल शिवलिंग की स्थापना सर्वप्रथम सप्तऋषियों में से एक, महर्षि अत्रि द्वारा की गई थी । मंदिर निर्माण के दौरान, आस-पास उगे सफेद बबूल के जंगलों (तमिल में 'वेल मरम') को काटा गया था, जिसके कारण इस विकसित शहर का नाम 'वेल्लोर' पड़ा ।   

मंदिर की स्थापत्य कला और संरचनात्मक विशेषताएँ

जलकंठेश्वर मंदिर को दक्षिण भारतीय द्रविड़ वास्तुकला और विशेष रूप से विजयनगर स्थापत्य शैली का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है । विजयनगर शैली की विशेषता इसकी जटिल नक्काशी, ऊंचे गोपुरम, और भव्य स्तंभों वाले मंडपों में निहित है, जो पूर्ववर्ती चोल, पांड्य और चालुक्य शैलियों के तत्वों को समाहित करती है । मंदिर की संरचनात्मक योजना को समझने के लिए निम्नलिखित खंडों और उनके कार्यों का अवलोकन आवश्यक है:   

प्रमुख संरचनात्मक घटक और उनकी विशेषताएं

संरचनात्मक घटकस्थापत्य और कलात्मक विशेषताएंपरीक्षा-उपयोगी तकनीकी विवरण
गर्भगृह (Garbhagriha)मंदिर का अंतरतम कक्ष जहाँ मुख्य स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है ।पूर्व दिशा की ओर उन्मुख, अत्यधिक शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र ।
राजगोपुरम (Rajagopuram)मुख्य प्रवेश द्वार पर स्थित 100 फीट से अधिक ऊँचा विशाल बहुमंजिला शिखर ।पौराणिक कथाओं, देवी-देवताओं और पुष्प आकृतियों की सघन और उत्कृष्ट नक्काशी से सुसज्जित ।
प्रकारम (Prakaras)मंदिर को घेरने वाले दो विस्तृत प्रांगण या गलियारे ।सैन्य सुरक्षात्मक दुर्ग की तरह दोहरी दीवारों से आच्छादित संरचना ।
कल्याण मंडपम (Kalyana Mandapam)विवाह उत्सवों के लिए उपयोग होने वाला मंदिर का सबसे प्रसिद्ध अलंकृत मंडप ।इसमें जटिल नक्काशीदार स्तंभ हैं, जिन पर याली, योद्धा और देवी-देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई हैं ।
अगाझी (Moat/Water Tank)मंदिर के चारों ओर स्थित जल की एक विशाल खाई या तालाब, जो एक सुरक्षात्मक घेरे की तरह है ।इस जल-बाउंड्री की कुल परिधि लगभग 8,000 फीट आँकी गई है ।

  

कल्याण मंडपम की अद्वितीय नक्काशी

मंदिर का कल्याण मंडपम (विवाह मंडप) अपनी बेजोड़ मूर्तिकला और स्थापत्य विशिष्टता के लिए दुनिया भर के इतिहासकारों और कला-प्रेमियों के बीच अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है । इस मंडप के स्तंभों पर पत्थर को काटकर बनाए गए घुड़सवार योद्धाओं, सिंह जैसी पौराणिक आकृतियों (याली) और हिंदू महाकाव्यों के दृश्यों का अद्भुत चित्रण है ।   

इस मंडप की सबसे उल्लेखनीय कलाकृति एक ही पत्थर पर तराशी गई 'दो-मुखी' (Bull-Elephant) मूर्ति है । एक विशेष कोण से देखने पर यह आकृति एक बैल (शिव का वाहन नंदी) जैसी दिखाई देती है, जबकि दूसरे कोण से देखने पर यह एक हाथी के रूप में प्रतीत होती है । यह विजयनगर काल के कलाकारों की असाधारण प्रतिभा और ज्यामितीय परिशुद्धता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। मंदिर के विषय में अधिक जानकारी के लिए परीक्षार्थी(https://www.atharvaexamwise.com) अनुभाग में भारतीय मंदिरों के विकास क्रम का अध्ययन कर सकते हैं।   

गंगा गौरी तीर्थम और जल प्रबंधन

प्राचीन काल की उत्कृष्ट जल-इंजीनियरिंग का प्रदर्शन करते हुए, मंदिर के परिसर के भीतर 'गंगा गौरी तीर्थम' नामक एक प्राचीन कुआं स्थित है । यह एक प्राकृतिक जल स्रोत है जिसे खोदा नहीं गया था, बल्कि यह स्वतः प्रस्फुटित हुआ था । भगवान शिव के दैनिक अभिषेक (Abhishekam) के लिए केवल इसी कुएं के पवित्र जल का उपयोग किया जाता है, जो हिंदू अनुष्ठानों में जल की शुद्धि और संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है ।   

वेल्लोर किले के संरक्षण में राजनीतिक संक्रमण का इतिहास

वेल्लोर का किला और उसके भीतर स्थित जलकंठेश्वर मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं रहे हैं, बल्कि वे शताब्दियों तक दक्षिण भारत के राजनीतिक संघर्षों के मूक गवाह भी रहे हैं । किले के नियंत्रण में आए परिवर्तनों ने मंदिर की पूजा-पद्धति और उसकी भौतिक संरचना को गहरे रूप से प्रभावित किया:   

वेल्लोर किले और मंदिर का ऐतिहासिक शासक-क्रम

कालक्रमशासक राजवंश / शक्तिमंदिर और किले पर प्रभाव
16वीं शताब्दी (1550–1566 ई.)विजयनगर साम्राज्य (नायक शासक)किले और जलकंठेश्वर मंदिर की स्थापना; सांस्कृतिक स्वर्णकाल ।
1650 ई. के आसपासबीजापुर सल्तनतकिले पर कब्जा; मंदिर का आंशिक विध्वंस, पूजा बाधित हुई और परिसर को सैन्य शस्त्रागार में बदला गया ।
1678 ई.मराठा साम्राज्य (छत्रपति शिवाजी महाराज)एक साहसिक रात्रिकालीन हमले में किले पर नियंत्रण; हिंदू प्रभुत्व की आंशिक वापसी ।
1692 ई. के बादमुगल साम्राज्य (औरंगजेब / दाउद खान)किले पर नियंत्रण; बाद में अर्काट के नवाबों के अधिकार में स्थानांतरण ।
1760 ई.ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनीकिले को छावनी और जेल में बदला गया; टीपू सुल्तान के परिवार और श्रीलंका के अंतिम राजा को यहाँ बंदी बनाया गया था ।
1921 ई.भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)किले और मंदिर को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया गया; पूजा पर पूर्ण प्रतिबंध लागू ।
16 मार्च 1981स्थानीय हिंदू समुदायऐतिहासिक जन-आंदोलन के माध्यम से शिवलिंग की पुनः स्थापना और पूजा की बहाली ।

  

1981 का ऐतिहासिक पुन: प्रतिष्ठापन आंदोलन

जलकंठेश्वर मंदिर का आधुनिक इतिहास भारतीय पुरातत्व और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता के बीच के द्वंद्व का एक अत्यंत दिलचस्प कानूनी अध्याय है । 17वीं शताब्दी में बीजापुर सल्तनत के आक्रमण के समय, मंदिर को अपवित्र होने से बचाने के लिए स्थानीय लोगों ने मुख्य शिवलिंग को चुपके से निकालकर पास के साथुवाचेरी स्थित जलकंठ विनायक मंदिर में सुरक्षित रख दिया था । इसके बाद लगभग 400 वर्षों तक मुख्य मंदिर खाली रहा और इसका उपयोग सेना के घोड़ों के अस्तबल और गोला-बारूद डिपो के रूप में किया जाता रहा 。   

वर्ष 1921 में जब वेल्लोर किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधीन आया, तो एएसआई ने प्राचीन स्मारक कानून के तहत वहाँ यथास्थिति बनाए रखने का निर्णय लिया और किसी भी नई धार्मिक मूर्ति की स्थापना या पूजा की अनुमति देने से इनकार कर दिया । स्वतंत्रता के बाद, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात के बावजूद इस प्रतिबंध को नहीं हटाया जा सका ।   

अंततः, 16 मार्च 1981 को, हिंदू मुन्नानी और स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में एक विशाल जन-अभियान चलाया गया । वेल्लोर के तत्कालीन जिला कलेक्टर, श्री गंगप्पा के मौन समर्थन से, भक्तों ने प्रशासनिक बाधाओं को पार करते हुए साथुवाचेरी से मूल शिवलिंग को लाकर मंदिर के गर्भगृह में पुनः स्थापित कर दिया । हालांकि इस कदम का एएसआई और तत्कालीन सरकार द्वारा कड़ा विरोध किया गया, लेकिन जनभावनाओं और न्यायालय में दायर याचिकाओं (जैसे वर्ष 1981 का दीवानी मुकदमा) के बाद प्रशासन को झुकना पड़ा । वर्तमान में, मंदिर का भौतिक ढांचा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है, जबकि दैनिक धार्मिक अनुष्ठान स्थानीय ट्रस्ट और राज्य सरकार के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग की देखरेख में आयोजित किए जाते हैं ।   

वेल्लोर किले में धार्मिक सह-अस्तित्व और 1806 का विद्रोह

वेल्लोर किला न केवल अपनी सैन्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह भारत के बहु-सांस्कृतिक और बहु-धार्मिक ताने-बाने का भी अनूठा प्रतीक है । 133-136 एकड़ में फैले इस किले के भीतर तीन अलग-अलग धर्मों के ऐतिहासिक पूजा स्थल स्थित हैं :   

हिंदू धर्म: जलकंठेश्वर शिव मंदिर (16वीं सदी) ।   

इस्लाम धर्म: ऐतिहासिक पुरानी मस्जिद (बीजापुर और मुगल काल) ।   

ईसाई धर्म: ब्रिटिश काल में वर्ष 1846 में निर्मित सेंट जॉन्स चर्च ।   

यह किला 10 जुलाई 1806 को भड़के 'वेल्लोर विद्रोह' (Vellore Mutiny) का गवाह भी रहा है, जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय सैनिकों का पहला बड़ा सशस्त्र विद्रोह था । इस विद्रोह का मुख्य कारण ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लागू किए गए नए सैन्य नियम थे, जिन्होंने हिंदू सैनिकों को माथे पर तिलक लगाने और मुस्लिम सैनिकों को दाढ़ी रखने से प्रतिबंधित कर दिया था । इस ऐतिहासिक घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में धार्मिक पहचान और राजनीतिक संप्रभुता के बीच का संबंध हमेशा से अत्यंत संवेदनशील रहा है 。   

competitive exam news today: परीक्षा-उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

त्वरित पुनरीक्षण के लिए, जलकंठेश्वर मंदिर और वेल्लोर किले से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को नीचे दी गई तालिका में संकलित किया गया है:

तथ्य का प्रकारविवरण और मुख्य डेटापरीक्षा हेतु प्रासंगिकता
स्थानवेल्लोर दुर्ग, तमिलनाडु, भारत ।कला एवं संस्कृति - भौगोलिक वितरण।
निर्माण काललगभग 1550-1566 ईस्वी (16वीं शताब्दी) ।विजयनगर और नायक राजवंश का इतिहास।
वास्तुकला शैलीद्रविड़ वास्तुकला (विजयनगर उप-शैली) ।स्थापत्य कला के वर्गीकरण का अध्ययन।
प्रमुख विशेषताएंकल्याण मंडपम, सिंह-आकृति (याली) वाले स्तंभ, बैल-हाथी की एकीकृत मूर्ति ।दक्षिण भारतीय मूर्तिकला के उदाहरण।
जल निकायगंगा गौरी तीर्थम (प्राकृतिक कुआँ) और अगाझी (खाई) ।मध्यकालीन जल संचयन प्रणालियाँ।
ऐतिहासिक घटनावेल्लोर सिपाही विद्रोह (10 जुलाई 1806) ।आधुनिक भारत का इतिहास (1857 के पूर्व के विद्रोह)।
संरक्षणभारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ।ऐतिहासिक स्मारकों का रखरखाव और राष्ट्रीय महत्व।

  

Why this matters for your exam preparation

जलकंठेश्वर मंदिर और वेल्लोर किले का यह ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विश्लेषण सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे गंभीर अभ्यर्थियों के लिए निम्नलिखित कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है:

कला एवं संस्कृति (GS पेपर-I): परीक्षा में अक्सर द्रविड़ वास्तुकला की क्षेत्रीय शैलियों, विशेष रूप से विजयनगर साम्राज्य के योगदान पर प्रश्न पूछे जाते हैं । कल्याण मंडपम की नक्काशी, गोपुरमों की संरचना, और मूर्तिकला के नवीन प्रयोगों (जैसे दो-मुखी बैल-हाथी मूर्ति) को मुख्य परीक्षा के उत्तरों में उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जा सकता है ।   

आधुनिक भारत का इतिहास (GS पेपर-I): वेल्लोर किला 1806 के सिपाही विद्रोह का मुख्य केंद्र था । 1857 के महान विद्रोह की पृष्ठभूमि के रूप में इस विद्रोह के कारणों, इसके धार्मिक-सांस्कृतिक पहलुओं और इसके परिणामों को समझना मुख्य परीक्षा के इतिहास खंड के लिए आवश्यक है ।   

भारतीय राजव्यवस्था और शासन (GS पेपर-II): एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारकों में पूजा की बहाली का मुद्दा 'जीवंत विरासत' (Living Heritage) के संरक्षण और नागरिकों के धार्मिक अधिकारों (संविधान के अनुच्छेद 25 से 28) के बीच संतुलन की व्याख्या करता है । यह प्रशासनिक नीतियों और जनभावनाओं के बीच के अंतर्संबंधों को समझने के लिए एक बेहतरीन केस स्टडी है ।   

धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक समन्वय: एक ही किले के भीतर मंदिर, मस्जिद और चर्च का सह-अस्तित्व भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत और धर्मनिरपेक्ष लोकाचार को प्रदर्शित करता है, जिसे निबंध और एथिक्स (GS पेपर-IV) के उत्तरों में समावेशन और सहिष्णुता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है ।   

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