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Daily GK Update: डॉ. मनोज कुमार शर्मा बने नेपाल के 33वें चीफ जस्टिस | UPSC Current Affairs May 20, 2026 Daily GK Update: डॉ. मनोज कुमार शर्मा बने नेपाल के 33वें चीफ जस्टिस | UPSC Current Affairs May 20, 2026

20 May 2026 20 May 2026

Daily GK Update: डॉ. मनोज कुमार शर्मा बने नेपाल के 33वें चीफ जस्टिस | UPSC Current Affairs May 20, 2026
GK (General Knowledge) Hindi 20 May 2026

Daily GK Update: डॉ. मनोज कुमार शर्मा बने नेपाल के 33वें चीफ जस्टिस | UPSC Current Affairs May 20, 2026

दक्षिण एशियाई भू-राजनीति और तुलनात्मक संवैधानिक कानून के दृष्टिकोण से एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, डॉ. मनोज कुमार शर्मा ने 19 मई 2026 को नेपाल के 33वें मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) के रूप में औपचारिक रूप से पदभार ग्रहण कर लिया है । राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने उन्हें राष्ट्रपति भवन, शीतल निवास में पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई । डॉ. शर्मा का कार्यकाल कुल छह वर्ष का होगा, जिसे पिछले तीन दशकों में नेपाल के किसी मुख्य न्यायाधीश का सबसे लंबा कार्यकाल माना जा रहा है ।   

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले गंभीर अभ्यर्थियों के लिए Atharva Examwise current news के इस विशेष संस्करण में इस नियुक्ति की संवैधानिक बारीकियों, वरिष्ठता को दरकिनार किए जाने से उपजे विवाद और भारत-नेपाल न्यायिक संबंधों के रणनीतिक निहितार्थों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।

हालिया घटनाक्रम और पृष्ठभूमि

नेपाल के पूर्व मुख्य न्यायाधीश प्रकाश मान सिंह राउत के सेवानिवृत्त होने के बाद से यह शीर्ष न्यायिक पद खाली चल रहा था, और वरिष्ठतम न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ला कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाल रही थीं । 7 मई 2026 को नेपाल की संवैधानिक परिषद ने डॉ. मनोज कुमार शर्मा के नाम की सिफारिश की थी । इसके बाद संसदीय सुनवाई समिति (Parliamentary Hearing Committee) द्वारा उनके नाम को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई, जिसके बाद राष्ट्रपति पौडेल ने उन्हें आधिकारिक रूप से इस पद पर नियुक्त किया ।   

डॉ. शर्मा का कार्यकाल जून 2032 तक रहेगा, जिससे उन्हें नेपाल के हालिया न्यायिक इतिहास में सबसे लंबी अवधि तक संस्थागत सुधारों को लागू करने का अवसर मिलेगा ।   

डॉ. मनोज कुमार शर्मा: शैक्षणिक एवं पेशेवर यात्रा

18 जून 1970 को नेपाल के वीरगंज (पर्सा जिला) में जन्मे डॉ. मनोज कुमार शर्मा की शैक्षणिक और पेशेवर यात्रा भारत और नेपाल दोनों देशों के कानूनी पारिस्थितिकी तंत्र से गहराई से जुड़ी हुई है । उनके जीवन और करियर से जुड़े प्रमुख शैक्षणिक और न्यायिक तथ्य इस प्रकार हैं:   

कानूनी शिक्षा: उन्होंने नेपाल लॉ कैंपस, काठमांडू से कानून में स्नातक (LLB) की डिग्री प्राप्त की । इसके बाद, उन्होंने भारत की प्रतिष्ठित(https://www.unipune.ac.in) (सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय) से वाणिज्यिक और संवैधानिक कानून में स्नातकोत्तर (LLM) की उपाधि अर्जित की । उन्होंने त्रिभुवन विश्वविद्यालय से श्रम कानून (Labour Law) में पीएचडी (PhD) भी की है ।   

पेशेवर शुरुआत: वर्ष 1995 में उन्होंने एक अधिवक्ता के रूप में अपने कानूनी करियर की शुरुआत की । उन्होंने विभिन्न निजी कानूनी फर्मों में कॉर्पोरेट और संवैधानिक मामलों के सलाहकार के रूप में लंबे समय तक कार्य किया ।   

न्यायिक सेवा का सफर: जून 2013 में उन्हें बुटवल और बाद में पाटन के अपीलीय न्यायालयों में अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था । 19 अप्रैल 2019 को वे नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश बने और फरवरी 2024 से वे सर्वोच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण संवैधानिक पीठ (Constitutional Bench) के सदस्य के रूप में कार्यरत रहे हैं ।   

नेपाल की संवैधानिक नियुक्ति प्रक्रिया और वरिष्ठता बाईपास विवाद

डॉ. शर्मा की नियुक्ति ने नेपाल के कानूनी और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है, जिसे competitive exam news today के अंतर्गत समझना आवश्यक है । नेपाल का संविधान, 2072 इस नियुक्ति के लिए एक संरचित तंत्र प्रदान करता है ।   

संवैधानिक नियुक्ति का ढांचा (अनुच्छेद 129)

नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 129(2) के तहत मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक परिषद की सिफारिश पर की जाती है । अनुच्छेद 129(3) के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जिसने नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में कम से कम तीन वर्ष की सेवा पूरी कर ली है, वह मुख्य न्यायाधीश बनने के लिए योग्य माना जाता है ।   

वरिष्ठता बाईपास (Supersession) का विवाद

नेपाल की न्यायपालिका में यह स्थापित परंपरा रही है कि सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को ही मुख्य न्यायाधीश के पद पर पदोन्नत किया जाता है ताकि न्यायपालिका में निष्पक्षता और स्वतंत्रता बनी रहे । हालाँकि, इस बार संवैधानिक परिषद ने वरिष्ठता क्रम में चौथे स्थान पर मौजूद डॉ. मनोज कुमार शर्मा की सिफारिश की । इस प्रक्रिया में उन्होंने तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों—कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ला, न्यायाधीश कुमार रेग्मी और न्यायाधीश हरि प्रसाद फुयाल—को दरकिनार कर दिया ।   

इस निर्णय को लेकर नेपाल के भीतर गहरे मतभेद सामने आए हैं:

विरोधियों का तर्क: संवैधानिक परिषद की बैठक में राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष नारायण दहाल और विपक्षी प्रतिनिधि भीष्मराज आंगदेम्बे ने लिखित असहमति (Note of Dissent) दर्ज कराई । नेपाल बार एसोसिएशन और कई कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बिना किसी स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ कारण के वरिष्ठ न्यायाधीशों को बाईपास करने से न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप और "राजनीतिक वफादारी" की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सकता है । नेपाल के ऐतिहासिक ऐतिहासिक मामले 'अधिवक्ता अच्युत प्रसाद खरेल बनाम संवैधानिक परिषद' में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं यह व्यवस्था दी थी कि यदि वरिष्ठता की उपेक्षा की जाती है, तो उसके पीछे स्पष्ट और वस्तुनिष्ठ कारण होने चाहिए ।   

समर्थकों का रुख: दूसरी ओर, नियुक्ति के समर्थकों और संवैधानिक परिषद का तर्क है कि मुख्य न्यायाधीश के चयन में केवल वरिष्ठता को आधार बनाने के बजाय योग्यता (Merit), पेशेवर सक्षमता और कार्यकुशलता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए । डॉ. शर्मा के पक्ष में उनके उत्कृष्ट "केस निस्तारण दर" (Case Disposal Rate) और त्वरित निर्णय देने की उनकी कार्यप्रणाली को मुख्य आधार बनाया गया 。   

डॉ. शर्मा के समक्ष प्रमुख न्यायिक और प्रशासनिक चुनौतियाँ

छह वर्ष के इस लंबे कार्यकाल में डॉ. शर्मा को नेपाल की न्यायपालिका में व्याप्त कई पुरानी और गहरी विसंगतियों को दूर करना होगा । मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनके सामने मौजूद प्राथमिक प्रशासनिक और न्यायिक चुनौतियों को निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझा जा सकता है:   

प्रमुख चुनौतियाँविवरण और प्रभावआवश्यक प्रशासनिक सुधारसंदर्भ
लंबित मुकदमों का अंबारनेपाल के सर्वोच्च न्यायालय में वर्तमान में 22,000 से अधिक मामले लंबित हैं। कुल राष्ट्रीय लंबित मामले 3,75,000 से अधिक हैं।अभियान इकाइयों (Campaign Units) को सक्रिय करना और त्वरित सुनवाई तंत्र को प्रभावी बनाना। 
सहयोगियों के साथ तालमेलवरिष्ठता को दरकिनार किए जाने के कारण बाईपास किए गए वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाना।पीठों के आवंटन (Bench Allocation) में पारदर्शिता और सर्वसम्मति आधारित निर्णय लेना। 
नेपाल बार एसोसिएशन से संबंधबार और बेंच के बीच वर्तमान में समन्वय तंत्र निष्क्रिय है। बार इस नियुक्ति को लेकर विभाजित है।नियमित समन्वय बैठकों की बहाली और न्यायिक सुधारों में बार को शामिल करना। 
भ्रष्टाचार और बिचौलियों पर लगामअदालत परिसरों में छोटे स्तर की रिश्वतखोरी और बड़े बिचौलियों के प्रभाव को समाप्त करना।डिजिटल प्रणालियों को अपनाना और निगरानी समितियों को जवाबदेह बनाना। 
फैसलों का कमजोर प्रवर्तनअदालतों द्वारा दिए गए फैसलों का जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन बेहद कमजोर है; अरबों रुपये का जुर्माना और सजाएं लंबित हैं।फैसला कार्यान्वयन निदेशालय (Judgment Implementation Directorate) को सक्रिय करना। 

  

भारत-नेपाल संबंध: न्यायिक और शैक्षणिक सहयोग की भूमिका

डॉ. मनोज कुमार शर्मा का पुणे विश्वविद्यालय से LLM करना केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत और नेपाल के बीच साझा "सॉफ्ट पावर" और शैक्षणिक संबंधों को भी दर्शाता है । दोनों देशों की न्यायपालिकाएं अक्सर एक-दूसरे के ऐतिहासिक संवैधानिक निर्णयों से प्रेरणा लेती रही हैं; उदाहरण के लिए, नेपाल ने भारतीय संविधान के "मूल संरचना सिद्धांत" (Basic Structure Doctrine) को अपनाया है, जबकि भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निर्णयों में नेपाल के प्रगतिशील फैसलों का उल्लेख किया है ।   

इस रणनीतिक और संस्थागत संबंध को और मजबूत करने के लिए, भारत और नेपाल के सर्वोच्च न्यायालयों ने 7 अप्रैल 2025 को न्यायिक सहयोग के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे । यह समझौता तत्कालीन नेपाली मुख्य न्यायाधीश प्रकाश मान सिंह राउत और भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की उपस्थिति में हुआ था ।   

इस समझौते के मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:

न्यायिक आदान-प्रदान और प्रशिक्षण: दोनों देशों के न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों के लिए संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम, शैक्षणिक संगोष्ठियां और यात्राएं आयोजित करना ।   

तकनीकी सहयोग: अदालती मामलों के लंबित बोझ को कम करने और दक्षता बढ़ाने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और डिजिटलीकरण प्रणालियों का आदान-प्रदान करना ।   

संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group): दोनों देशों के न्यायिक अधिकारियों को मिलाकर एक कार्य समूह का गठन किया गया है जो इस सहयोग की रूपरेखा और प्रगति की निगरानी करता है ।   

नेपाल में हाल ही में हुए राजनीतिक बदलावों और नए राष्ट्रभक्त नेतृत्व के उद्भव के बीच, भारत की 'पड़ोसी पहले' (Neighbourhood First) नीति के तहत ऐसा न्यायिक सहयोग द्विपक्षीय संबंधों में स्थिरता और विश्वास का एक महत्वपूर्ण माध्यम साबित हो सकता है ।   

Why this matters for your exam preparation

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सेवा मुख्य परीक्षा और विभिन्न राज्य स्तरीय सिविल सेवा परीक्षाओं (State PCS) के दृष्टिकोण से यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। अभ्यर्थी इसे अपने पाठ्यक्रम के निम्नलिखित हिस्सों से जोड़कर देख सकते हैं:

सामान्य अध्ययन (GS) पेपर-II (तुलनात्मक संविधान और राजव्यवस्था):

न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया: नेपाल की 'संवैधानिक परिषद' आधारित नियुक्ति प्रणाली बनाम भारत की 'कॉलेजियम प्रणाली' की तुलनात्मक समीक्षा पूछी जा सकती है ।   

न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाम वरिष्ठता सिद्धांत: वरिष्ठता को दरकिनार करने (Supersession) के संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रभावों पर विश्लेषण। भारत में 1973 और 1977 में हुए वरिष्ठता उल्लंघन के मामलों के साथ नेपाल के इस हालिया घटनाक्रम की तुलना उत्तर लेखन को समृद्ध बना सकती है ।   

सामान्य अध्ययन (GS) पेपर-II (अंतर्राष्ट्रीय संबंध):

भारत-नेपाल द्विपक्षीय संबंध: भारत-नेपाल के बीच बुनियादी ढांचे और जलविद्युत के अलावा "न्यायिक कूटनीति" (Judicial Diplomacy) और साझा शैक्षणिक धरोहर की भूमिका पर चर्चा । अप्रैल 2025 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय न्यायिक MoU को मुख्य परीक्षा के उत्तरों में केस स्टडी के रूप में उपयोग किया जा सकता है ।   

प्रारंभिक परीक्षा और अन्य वन-डे एग्जाम्स के लिए daily GK update:

सीधे तौर पर पूछा जा सकता है कि नेपाल के 33वें मुख्य न्यायाधीश कौन बने हैं (डॉ. मनोज कुमार शर्मा) ।   

डॉ. शर्मा ने भारत के किस विश्वविद्यालय से कानून में स्नातकोत्तर (LLM) किया है (सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय) ।   

नेपाल के संविधान के किस अनुच्छेद के तहत मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल 6 वर्ष निर्धारित है (अनुच्छेद 129) ।   

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