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UPSC Current Affairs May 22, 2026: पश्चिम बंगाल का पारंपरिक राइबेंशे नृत्य और उसका ऐतिहासिक महत्व | Daily GK Update UPSC Current Affairs May 22, 2026: पश्चिम बंगाल का पारंपरिक राइबेंशे नृत्य और उसका ऐतिहासिक महत्व | Daily GK Update

22 May 2026 22 May 2026

UPSC Current Affairs May 22, 2026: पश्चिम बंगाल का पारंपरिक राइबेंशे नृत्य और उसका ऐतिहासिक महत्व | Daily GK Update
Art & Culture Hindi 22 May 2026

UPSC Current Affairs May 22, 2026: पश्चिम बंगाल का पारंपरिक राइबेंशे नृत्य और उसका ऐतिहासिक महत्व | Daily GK Update

प्रस्तावना

पश्चिम बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में लोक कलाओं और पारंपरिक युद्ध कलाओं (martial arts) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है । इसी विरासत का एक जीवंत प्रतीक "राइबेंशे नृत्य" (Raibenshe Dance) है, जो राज्य के पश्चिमी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित एक प्राचीन, ऊर्जावान और वीरता से परिपूर्ण लोकनृत्य है । ऐतिहासिक रूप से यह प्रदर्शन केवल मनोरंजन का साधन नहीं था, बल्कि यह बंगाल की सैन्य परंपराओं और योद्धाओं की शारीरिक क्षमता का एक प्रदर्शन था । वर्तमान में यह नृत्य बीरभूम, बर्धमान और मुर्शिदाबाद जिलों के ग्रामीण अंचलों में जीवित है और विभिन्न सांस्कृतिक मंचों पर प्रदर्शित किया जाता है । प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे गंभीर अभ्यर्थियों के लिए कला और संस्कृति (Art and Culture) खंड के तहत इस लोक नृत्य का ऐतिहासिक, सामाजिक और कलात्मक अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है । नवीनतम समसामयिक विषयों के नियमित विश्लेषण के लिए उम्मीदवार Atharva Examwise current news का संदर्भ ले सकते हैं ।   

राइबेंशे नृत्य का ऐतिहासिक उद्भव और सामाजिक पृष्ठभूमि

"राइबेंशे" शब्द की व्युत्पत्ति और इसका इतिहास बंगाल के मध्यकालीन सैन्य इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है । "राइ" शब्द का अर्थ "राजा" या "सैनिक" से माना जाता है, जबकि "बेंशे" का संबंध बाँस (विशेष रूप से "रायबाँस" नामक लंबे बाँस की लाठी) या वेश से है । मध्यकाल में, आग्नेयास्त्रों (firearms) के आविष्कार से पहले, ये मजबूत बाँस ही आत्मरक्षा और युद्ध के प्रमुख हथियार हुआ करते थे ।   

ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार, राइबेंशे नृत्य का उद्भव मध्यकालीन बंगाल के राजाओं और जमींदारों के अंगरक्षकों और सैनिकों द्वारा किए जाने वाले युद्धाभ्यासों से हुआ । इस नृत्य को मुख्य रूप से समाज के उपेक्षित और योद्धा वर्गों, विशेष रूप से बागड़ी (Bagdi), बाउरी (Bauri), और डोम (Dom) समुदायों द्वारा प्रदर्शित किया जाता था । ये समुदाय मध्यकालीन बंगाल के स्थानीय जमींदारों के यहाँ लाठियाल (bodyguards) और सैनिक के रूप में अपनी सेवाएं देते थे ।   

वर्ष 1757 में प्लासी के युद्ध (Battle of Plassey) के पश्चात बंगाल की सैन्य संरचना में एक बड़ा बदलाव आया । ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद स्थानीय बंगाली सैनिकों की भर्ती को प्रतिबंधित कर दिया । इसके परिणामस्वरूप, इन सैन्य समुदायों को अपनी आजीविका के लिए स्थानीय राजाओं और जमींदारों के यहाँ सुरक्षा गार्डों के रूप में शरण लेनी पड़ी । अठारहवीं सदी के अंत तक जमींदारी सेनाओं के पूरी तरह समाप्त होने के बाद, इन योद्धाओं ने अपनी युद्ध कलाओं को एक लोक नृत्य के रूप में ढाल लिया, जिसे शादियों और अन्य सामाजिक उत्सवों में प्रदर्शित किया जाने लगा । इस ऐतिहासिक संक्रमण ने एक शुद्ध युद्ध कला (martial art) को एक प्रदर्शनकारी लोक कला (performing folk art) में परिवर्तित कर दिया ।   

कलात्मक विशेषताएँ, प्रदर्शन शैली और पारंपरिक वाद्ययंत्र

राइबेंशे नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अन्य पारंपरिक लोक नृत्यों की तरह किसी विशिष्ट कहानी या कथानक (narrative) पर आधारित नहीं होता है । इसका मुख्य ध्यान शारीरिक सौष्ठव, चपलता, संतुलन और वीरता के प्रदर्शन पर केंद्रित रहता है ।   

इस नृत्य की प्रदर्शन शैली में मुख्य रूप से निम्नलिखित तत्व शामिल हैं:

युद्ध कौशल का अनुकरण: प्रदर्शन के दौरान कलाकार धनुष से तीर चलाने, भाला फेंकने, तलवार लहराने और ढाल से बचाव करने जैसी युद्धकालीन मुद्राओं का अत्यंत जीवंत अभिनय करते हैं ।   

जटिल कलाबाजी और संतुलन: कलाकार बांस के लंबे डंडों (रायबाँस) के साथ संतुलन के विभिन्न करतब दिखाते हैं । नृत्य के दौरान मानव पिरामिड बनाना और कंधों पर चढ़कर संतुलन बनाना आम है । प्रदर्शन में एक कलाकार दूसरे कलाकार के कंधे पर खड़ा होता है, जहाँ ऊपर वाला कलाकार सिर और हाथों का संचालन करता है और नीचे वाला कलाकार पैरों की गतियों को नियंत्रित करता है, जिसके लिए अत्यंत उच्च स्तर के समन्वय की आवश्यकता होती है ।   

ध्वनि और शारीरिक मुद्राएं: नृत्य में कोई गीत या छंद नहीं गाए जाते हैं । इसके बजाय, कलाकारों की ऊर्जावान चीखें और युद्ध घोष पूरे वातावरण को रोमांचित कर देते हैं । कलाकार अक्सर घोड़ों पर सवार शिकारियों की तरह अर्ध-बैठने की मुद्रा (squat position) में आगे बढ़ते हैं ।   

पारंपरिक वाद्ययंत्रों की बात करें तो इस नृत्य की तीव्र गति को बनाए रखने के लिए भारी आवाज़ वाले वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है । इनमें मुख्य रूप से 'ढोल' (Dhol/Dhaki) और 'काँशी' (Kanshi - झांझ) शामिल हैं । ढोल की थाप और काँशी की खनक के साथ संगीत की लय जैसे-जैसे तेज होती जाती है, वैसे-वैसे नृत्य की गति और कलाकारों का उत्साह भी बढ़ता जाता है ।   

वेशभूषा के स्तर पर, कलाकार शरीर के निचले हिस्से में कसकर बांधी गई छोटी धोती (मल्कोचा शैली में) और कमर पर लाल रंग का कपड़ा (जो वीरता का प्रतीक है) पहनते हैं । इसके अतिरिक्त, वे अपने दाहिने पैर में पीतल के घुंघरू (brass anklets या nupurs) पहनते हैं, जो पैरों के थिरकने के साथ एक अनोखा सैन्य नाद उत्पन्न करते हैं ।   

गुरुसदय दत्त, ब्रतचारी आंदोलन और राइबेंशे का पुनरुद्धार

बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों द्वारा बंगालियों को "गैर-लड़ाकू" या "दुर्बल" (effeminate) साबित करने के लिए एक नकारात्मक रूढ़िवादिता (colonial stereotype) फैलाई गई थी । इस औपनिवेशिक विमर्श को चुनौती देने और बंगालियों में उनकी खोई हुई वीरता और आत्मसम्मान को जगाने के लिए एक ब्रिटिश कालीन बंगाली सिविल सेवक और लोकशास्त्री गुरुसदय दत्त (Gurusaday Dutt) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ।   

गुरुसदय दत्त ने वर्ष 1928 में इंग्लैंड की यात्रा के दौरान वहाँ के लोक नृत्य संगठन के कार्यों को देखा और भारत लौटकर लोक कलाओं के संरक्षण का संकल्प लिया । वर्ष 1929 में बीरभूम के जिला अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने पहली बार एक मेले (बाराबागान मेला) में राइबेंशे नृत्य को देखा । उस समय यह नृत्य अपने मूल रूप से भटक कर सस्ते थियेटर और भड़कीले परिधानों के कारण पतनोन्मुख स्थिति में था । इस पतन को देखकर दत्त अत्यंत निराश हुए, क्योंकि वे एक ऐसे "पुरुषोचित" (manly) नृत्य की खोज में थे जो औपनिवेशिक रूढ़ियों को ध्वस्त कर सके ।   

दत्त की निराशा को देखते हुए, दल के एक प्रमुख नर्तक रामपद प्रामाणिक ने अपने थियेटर के भड़कीले वस्त्रों को उतारकर जमीन पर 'पालोट' (Palot - धूल उड़ाने वाली एक तीव्र चक्राकार नृत्य मुद्रा) का प्रदर्शन किया । गुरुसदय दत्त इस प्रदर्शन से मंत्रमुग्ध हो गए और उन्होंने इसे ही राइबेंशे का वास्तविक और शुद्ध रूप घोषित किया । उन्होंने नर्तकों को भविष्य में किसी भी प्रकार के भड़कीले आधुनिक वस्त्रों को त्यागकर केवल पारंपरिक छोटी धोती, लाल कमरबंद और नग्न बदन (bare-bodied) प्रदर्शन करने का निर्देश दिया, ताकि इसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता बनी रहे ।   

बाद में, गुरुसदय दत्त ने राइबेंशे नृत्य की शारीरिक मुद्राओं और इसके अनुशासन को अपने द्वारा शुरू किए गए "ब्रतचारी आंदोलन" (Bratachari Movement) के पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया । यह आंदोलन युवाओं के शारीरिक, मानसिक और नैतिक विकास के लिए चलाया गया एक सामाजिक कार्यक्रम था, जो स्काउट आंदोलन से मिलता-जुलता था । राइबेंशे के माध्यम से बंगाल के मध्यमवर्गीय युवाओं को शारीरिक रूप से सुदृढ़ और अनुशासित बनाने का प्रयास किया गया, जिसने तत्कालीन राष्ट्रीय आंदोलन में भी ऊर्जा भरने का कार्य किया ।   

पश्चिम बंगाल की लोक नृत्य परंपराओं का तुलनात्मक विश्लेषण

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से पश्चिम बंगाल के प्रमुख लोक नृत्यों की विशेषताओं और उनके अंतर्संबंधों को समझना आवश्यक है । नीचे दी गई तालिका में राइबेंशे की तुलना राज्य के अन्य महत्वपूर्ण सांस्कृतिक रूपों से की गई है:   

लोक कला / नृत्य का नामभौगोलिक क्षेत्रमुख्य विषयवस्तु और प्रकृतिमुखौटे का प्रयोगप्रमुख वाद्ययंत्र और विशेषताएँ
राइबेंशे (Raibenshe)बीरभूम, बर्धमान और मुर्शिदाबादसैन्य कौशल, वीरता, चपलता और युद्ध की नकल (कथानक रहित)मुखौटे का प्रयोग नहीं होताढोल, काँशी और बांस की लाठी (रायबाँस)
पुरुलिया छऊ (Purulia Chhau)पुरुलिया और सीमावर्ती क्षेत्ररामायण, महाभारत और पौराणिक युद्ध गाथाएंभारी और रंगीन मिट्टी के मुखौटे अनिवार्य हैंढांसा (बड़ा नगाड़ा), शहनाई और ढोल
गंभीरा (Gambhira)मालदा जिला (गाजन उत्सव के दौरान)सामाजिक बुराइयों पर व्यंग्य और समसामयिक मुद्दों पर कटाक्षकाष्ठ (लकड़ी) या मिट्टी के मुखौटे का आंशिक प्रयोगढोल और मृदंग; यह एक नाट्य-नृत्य शैली है
बाउल परंपरा (Baul Tradition)संपूर्ण बंगाल (ग्रामीण क्षेत्र)सूफी और वैष्णव दर्शन, आध्यात्मिक प्रेम और भक्तिमुखौटे का प्रयोग नहीं होताएकतारा, दोतारा, डबकी और आनंद लहरी (UNESCO द्वारा मान्यता प्राप्त)

  

आधुनिक संदर्भ, संरक्षण के प्रयास और चुनौतियाँ

स्वतंत्रता के पश्चात और वर्तमान समय में राइबेंशे नृत्य परंपरा कई प्रकार के बदलावों और संरक्षण के दौर से गुजर रही है :   

संरक्षण और सरकारी प्रोत्साहन: पश्चिम बंगाल सरकार की 'ग्रामीण शिल्प और सांस्कृतिक हब' (RCCH - Rural Craft and Cultural Hubs) परियोजना के तहत वर्तमान में लगभग 288 राइबेंशे कलाकारों को वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और मंच प्रदान किए जा रहे हैं । इससे कलाकारों की आजीविका सुरक्षित करने में मदद मिली है ।   

सामाजिक समावेश: ऐतिहासिक रूप से यह नृत्य डोम, बाउरी और बागड़ी जैसी विशिष्ट उपेक्षित जातियों तक ही सीमित था । परंतु आधुनिक समय में यह जातिगत सीमाओं को पार कर चुका है । अब विभिन्न समुदायों के युवा और व्यावसायिक कलाकार भी इसे अपना रहे हैं । इसके अलावा, पहले केवल पुरुषों द्वारा किए जाने वाले इस नृत्य में अब महिला कलाकारों की भागीदारी भी शुरू हो गई है ।   

परंपरा बनाम आधुनिकता का द्वंद्व: वर्तमान में राइबेंशे के दो मुख्य रूप दिखाई देते हैं । पहला रूप 'पारंपरिक गुट' का है (जैसे रामपद प्रामाणिक के पोते माधव प्रामाणिक का दल), जो गुरुसदय दत्त द्वारा निर्धारित नियमों और बिना शर्ट के पारंपरिक वेशभूषा का कड़ाई से पालन करते हैं । दूसरा रूप 'आधुनिकतावादी गुट' का है (जैसे सहोरा का बासुदेव भल्ला का दल), जो दर्शकों को आकर्षित करने के लिए जिम्नास्टिक, आग के गोले के साथ करतब और रंगीन आधुनिक परिधानों का समावेश कर रहे हैं ।   

नवीनतम समसामयिक मुद्दों और प्रतियोगी परीक्षा अपडेट्स के लिए उम्मीदवार competitive exam news today के माध्यम से अपनी तैयारी को नया आयाम दे सकते हैं ।   

मुख्य तथ्य और परीक्षा-उपयोगी डेटा

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से राइबेंशे नृत्य से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों की त्वरित सूची निम्नलिखित है:

राज्य और क्षेत्र: यह पश्चिम बंगाल के पश्चिमी जिलों (बीरभूम, बर्धमान, और मुर्शिदाबाद) का एक प्रमुख सैन्य लोक नृत्य (martial folk dance) है ।   

व्युत्पत्ति: "रायबाँस" नामक बाँस की लाठियों के प्रयोग के कारण इसका नाम राइबेंशे पड़ा ।   

समुदाय: यह ऐतिहासिक रूप से बागड़ी, बाउरी और डोम जातियों से संबद्ध रहा है ।   

पुनरुद्धारकर्ता: गुरुसदय दत्त (Gurusaday Dutt) ने 1930 के दशक में इसे 'ब्रतचारी आंदोलन' का हिस्सा बनाकर नया जीवन दिया ।   

प्रकृति: इसमें कोई गीत या कथानक नहीं होता; यह पूरी तरह शारीरिक कलाबाजी, संतुलन और युद्ध कौशलों के मूक अभिनय पर आधारित है ।   

वाद्ययंत्र: मुख्य रूप से ढोल और काँशी (Kanshi) का प्रयोग किया जाता है ।   

संरक्षण योजना: पश्चिम बंगाल सरकार की RCCH II पहल के तहत वर्तमान में 288 से अधिक कलाकारों को इसके तहत संरक्षित किया जा रहा है ।   

Why this matters for your exam preparation

UPSC (सिविल सेवा परीक्षा) और विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोगों (जैसे MPPSC, WBPSC, BPSC) की परीक्षाओं के लिए यह टॉपिक अत्यंत प्रासंगिक है :   

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims - Art and Culture): प्रारंभिक परीक्षा में अक्सर विभिन्न राज्यों के पारंपरिक लोक नृत्यों, युद्ध कलाओं (martial arts) और उनसे संबंधित समुदायों से जुड़े मिलान वाले (match the following) प्रश्न पूछे जाते हैं । उदाहरण के लिए, केरल के कलारीपयट्टू और पंजाब के गतका के साथ बंगाल के राइबेंशे की तुलनात्मक समझ सीधे अंक दिला सकती है ।   

मुख्य परीक्षा (Mains - GS Paper I - भारतीय विरासत और संस्कृति): मुख्य परीक्षा में अक्सर औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय पारंपरिक कलाओं के पतन और उनके पुनरुद्धार के संबंध में विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं । गुरुसदय दत्त का ब्रतचारी आंदोलन और राइबेंशे का राष्ट्रवादी पुनरुद्धार इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे लोक कलाओं का उपयोग औपनिवेशिक सांस्कृतिक आधिपत्य (cultural hegemony) का मुकाबला करने के लिए किया गया ।   

निबंध और साक्षात्कार (Essay & Interview): भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) के संरक्षण और स्थानीय स्तर पर कलाकारों के सशक्तिकरण के मुद्दों को स्पष्ट करने के लिए राइबेंशे और सरकार की RCCH योजना के उदाहरणों को कोट किया जा सकता है ।   

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