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UPSC Current Affairs May 20, 2026: Netherlands Returns 1,000-Year-Old Chola 'Leiden Plates' to India | Daily GK Update UPSC Current Affairs May 20, 2026: Netherlands Returns 1,000-Year-Old Chola 'Leiden Plates' to India | Daily GK Update

20 May 2026 20 May 2026

UPSC Current Affairs May 20, 2026: Netherlands Returns 1,000-Year-Old Chola 'Leiden Plates' to India | Daily GK Update
Art & Culture Hindi 20 May 2026

UPSC Current Affairs May 20, 2026: Netherlands Returns 1,000-Year-Old Chola 'Leiden Plates' to India | Daily GK Update

नीदरलैंड्स ने लगभग 1000 साल पुराने चोलकालीन ‘अनैमंगलम कॉपर प्लेट्स’ (Leiden Plates) को मई 2026 में भारत को औपचारिक रूप से लौटा दिया। ये तमिल‑चोल इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखों में माने जाते हैं और अब दोबारा भारत की क़ब्ज़े में हैं।

ये ताम्रपत्र क्या हैं?

इन ताम्रपत्रों को भारत में “अनैमंगलम कॉपर प्लेट्स” और यूरोप में “Leiden Plates” के नाम से जाना जाता है।

ये 11वीं शताब्दी के हैं और चोल सम्राट राजराजा चोल‑I (985–1014 ई.) के शासनकाल से जुड़े माने जाते हैं।

पूरा सेट 21 बड़े और 3 छोटे तांबे के पट्टों से बना है, जिनका कुल वज़न लगभग 30 किलोग्राम है, और इन्हें एक भारी तांबे/कांस्य की अंगूठी से जोड़ा गया है, जिस पर चोल राजवंश की मुहर है।

इन पर क्या लिखा है?

ये ताम्रपत्र असल में शाही फ़रमान (royal charter) हैं जो बताते हैं कि चोल राजाओं ने तमिलनाडु के नागपट्टिनम स्थित एक बौद्ध विहार को ‘अनैमंगलम’ नामक गाँव दान में दिया।

इस विहार का नाम चूडामणि (या चुलामणिवर्मा) विहार था, जिसे दक्षिण‑पूर्व एशिया के श्रीविजय/शैलेन्द्र शासक चूलामणिवर्मन ने बनवाया था।

पाठ दो भाषाओं में है – एक हिस्सा संस्कृत में और दूसरा तमिल में – और इसमें भूमि, कर‑मुक्ति, राजस्व आदि के विस्तार से उल्लेख हैं।

राजराजा और राजेन्द्र चोल की भूमिका

माना जाता है कि मूल दान का आदेश राजराजा चोल‑I ने दिया था, जिसे पहले पाम‑लीफ (ताड़पत्र) पर दर्ज किया गया होगा।

बाद में उनके पुत्र राजेन्द्र चोल‑I ने इसे स्थायी रूप से सुरक्षित रखने के लिए वही विवरण इन तांबे की पट्टिकाओं पर खुदवाने का आदेश दिया; जो अंगूठी सभी पट्टों को बांधती है उस पर राजेन्द्र चोल की सील है।

यह तथ्य दिखाता है कि एक हिंदू शैव शासक ने बौद्ध संस्थान के लिए राजस्व अनुदान दिया, जो उस समय की धार्मिक सहिष्णुता और संरक्षण की परंपरा को दर्शाता है।

इतिहास में ये नीदरलैंड्स कैसे पहुँचे?

18वीं शताब्दी में, जब तमिलनाडु का नागपट्टिनम शहर डच ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में था, तब ये पट्टिकाएँ डच अधिकारी/मिशनरी फ़्लोरेन्टियस कैम्पर के हाथ लगीं और वे इन्हें अपने साथ नीदरलैंड्स ले गए।

बाद में 1862 के आसपास ये Leiden University की लाइब्रेरी के एशियाई संग्रह का हिस्सा बन गईं और लगभग डेढ़‑दो सौ साल तक वहीं सुरक्षित तिजोरियों में रखी रहीं; सामान्य जनता के बजाय मुख्यतः शोधकर्ताओं को ही विशेष अनुमति पर दिखायी जाती थीं।

वापसी की प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय पहल

भारत कम से कम 2012 से इन ताम्रपत्रों की वापसी के लिए औपचारिक रूप से प्रयास कर रहा था।

2022 में नीदरलैंड्स ने औपनिवेशिक काल की कलाकृतियों की वापसी के लिए एक आधिकारिक ‘restution policy’ अपनाई, जिसके बाद इन ताम्रपत्रों का provenance (उत्पत्ति‑इतिहास) विस्तार से जाँचा गया।

यूनेस्को समर्थित ICPRCP (Intergovernmental Committee for Promoting the Return of Cultural Property) की 24वीं बैठक में भारत को इनका वैध मूल देश माना गया और नीदरलैंड्स को भारत के साथ मिलकर वापसी की दिशा में काम करने की सलाह दी गई।

औपचारिक हैंडओवर कब और कैसे हुआ?

15–17 मई 2026 के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड्स यात्रा के दौरान Leiden University Library ने आधिकारिक समारोह में ये ताम्रपत्र भारत सरकार को सौंपे।

हैंडओवर कार्यक्रम में पीएम मोदी और नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री रॉब जेटन दोनों मौजूद रहे; भारत के विदेश मंत्रालय के प्रेस नोट में इसे भारत‑नीदरलैंड्स संबंधों में “महत्वपूर्ण पड़ाव” बताया गया।

पीएम मोदी ने X (पूर्व में ट्विटर) पर इसे “हर भारतीय के लिए हर्ष का क्षण” कहा और बताया कि 11वीं सदी के ये चोल कॉपर प्लेट्स अब भारत लौट रहे हैं।

भारत‑नीदरलैंड्स संबंधों पर इसका असर

यह वापसी केवल एक पुरातात्विक वस्तु का स्थानांतरण नहीं, बल्कि औपनिवेशिक काल में बाहर गई भारतीय धरोहर को वापस लाने के व्यापक अभियान में एक अहम सफलता मानी जा रही है।

इस कदम ने दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक विश्वास और सहयोग को मज़बूत किया है, जबकि समानांतर रूप से दोनों सरकारें सेमीकंडक्टर्स, हरित हाइड्रोजन, रक्षा और हाई‑टेक क्षेत्रों में भी साझेदारी आगे बढ़ा रही हैं।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

ये पट्टिकाएँ चोल साम्राज्य के प्रशासन, कर‑प्रणाली, समुद्री व्यापार और धार्मिक सहअस्तित्व के प्रामाणिक लिखित साक्ष्य हैं; इसलिए इन्हें तमिल और भारतीय इतिहास के लिए “सबसे महत्वपूर्ण बची हुई अभिलेखीय सामग्री” में गिना जाता है।

दक्षिण भारत और दक्षिण‑पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, मलेशिया, सुमात्रा आदि) के बीच समुद्री संपर्क, सांस्कृतिक आदान‑प्रदान और बौद्ध‑हिंदू सह‑अस्तित्व के जो प्रमाण इन पर दर्ज हैं, वे आज के शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत मूल्यवान स्रोत हैं।

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