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UPSC समसामयिकी: मैडम भीकाजी कामा, 1907 का स्टटगार्ट ध्वज और प्रवासी क्रांतिकारी आंदोलन | दैनिक सामान्य ज्ञान अपडेट UPSC समसामयिकी: मैडम भीकाजी कामा, 1907 का स्टटगार्ट ध्वज और प्रवासी क्रांतिकारी आंदोलन | दैनिक सामान्य ज्ञान अपडेट

24 Sep 2026 24 Sep 2026

UPSC समसामयिकी: मैडम भीकाजी कामा, 1907 का स्टटगार्ट ध्वज और प्रवासी क्रांतिकारी आंदोलन | दैनिक सामान्य ज्ञान अपडेट
Indian History Hindi 24 Sep 2026

UPSC समसामयिकी: मैडम भीकाजी कामा, 1907 का स्टटगार्ट ध्वज और प्रवासी क्रांतिकारी आंदोलन | दैनिक सामान्य ज्ञान अपडेट

भारतीय राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम केवल ब्रिटिश भारत की भौगोलिक सीमाओं के भीतर ही नहीं लड़ा गया; इसका एक परिष्कृत और वैश्वीकृत आयाम भी विकसित हुआ, जिसका नेतृत्व प्रवासी बुद्धिजीवियों, छात्रों और राजनीतिक विद्रोहियों ने किया। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में सक्रिय इन कार्यकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय राजनयिक अपीलों, गुप्त हथियारों की खरीद और उपनिवेशवाद-विरोधी राजनीतिक साहित्य के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्यवादी आधिपत्य को खुली चुनौती दी।

इस बाह्य अभियान के अग्रिम मोर्चे पर मैडम भीकाजी रुस्तम कामा खड़ी थीं, जिन्हें भारतीय इतिहास-लेखन में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की अग्रदूत और "भारतीय क्रांति की जननी" के रूप में सम्मानित किया जाता है। 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट में आयोजित 'द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस' में भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के प्रथम पूर्ववर्ती रूप को फहराने का उनका ऐतिहासिक कार्य आधुनिक भारतीय इतिहास में एक युगांतरकारी घटना है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए मैडम कामा के वैचारिक विकास, संगठनात्मक पहलों और राजनयिक रणनीतियों का विश्लेषण प्रारंभिक (Prelims) और मुख्य (Mains) दोनों चरणों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है।

प्रारंभिक जीवन, मानवीय राहत और वैचारिक रूपांतरण

भीकाजी पटेल का जन्म 24 सितंबर 1861 को बंबई (अब मुंबई) के एक समृद्ध, आंग्ल-शिक्षित पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता, सोराबजी फ्रामजी पटेल, एक प्रभावशाली व्यापारी और प्रशिक्षित वकील थे, जिन्होंने प्रगतिशील व्यापारिक समुदाय के भीतर महिलाओं की पाश्चात्य शिक्षा का दृढ़ता से समर्थन किया। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा बंबई के 'अलेक्जेंड्रा गर्ल्स इंग्लिश इंस्टीट्यूशन' से प्राप्त की—यह संस्था सुधारक मानेकजी करसेटजी श्रॉफ द्वारा स्थापित की गई थी, जिसमें भाषाई दक्षता, अनुशासन और आधुनिक सामाजिक विज्ञानों पर बल दिया जाता था। अगस्त 1885 में, भीकाजी का विवाह एक प्रख्यात बैरिस्टर और प्राच्यविद विद्वान खुरशेदजी रुस्तमजी कामा के पुत्र, रुस्तमजी कामा से हुआ।

यह वैवाहिक संबंध मौलिक राजनीतिक और दार्शनिक मतभेदों के कारण सफल नहीं रहा। जहाँ रुस्तमजी कामा औपनिवेशिक ढांचे के तहत संस्थागत राजनीति में प्रवेश करने के इच्छुक एक ब्रिटिश-समर्थक रूढ़िवादी बने रहे, वहीं भीकाजी का झुकाव आमूलचूल (कट्टर) राष्ट्रवाद और जनहितैषी कार्यों की ओर दृढ़ता से बढ़ता गया।

सार्वजनिक जीवन में उनका निर्णायक प्रवेश अक्टूबर 1896 में हुआ, जब बंबई प्रेसीडेंसी भीषण अकाल की चपेट में आ गई और उसके तुरंत बाद ब्यूबोनिक प्लेग का प्रकोप फैल गया, जिसने मुंबई शहर को तबाह कर दिया। नगर निगम वार्डों में राहत दलों के साथ स्वेच्छा से जुड़कर उन्होंने महीनों तक मरीजों की सेवा की और स्वच्छता व्यवस्था का समन्वय किया। इन राहत कार्यों के दौरान वे स्वयं ब्यूबोनिक प्लेग से संक्रमित हो गईं। यद्यपि वे स्वस्थ हो गईं, किंतु इस गंभीर बीमारी ने उनके स्वास्थ्य को अत्यंत कमजोर कर दिया, जिसके लिए उन्हें विशेष चिकित्सा उपचार की आवश्यकता थी। 1901-1902 में, वे चिकित्सा के लिए यूरोप रवाना हुईं, जिसने उनके तीन दशकों से अधिक लंबे निर्वासन की शुरुआत की।

मैडम भीकाजी कामा के जीवन का कालक्रम और राजनीतिक मील के पत्थर

मैडम कामा के जीवन का घटनाक्रम भारतीय उपनिवेशवाद-विरोधी सक्रियता के उस संक्रमण को दर्शाता है, जो उदारवादी संस्थागत पैरवी से निकलकर यूरोपीय राजधानियों में मुखर क्रांतिकारी प्रचार में परिवर्तित हुआ।

वर्षप्रमुख मील का पत्थर / घटनाऐतिहासिक महत्व
1861बंबई प्रेसीडेंसी में जन्म (24 सितंबर)।एक संभ्रांत पारसी परिवार में जन्म; असाधारण बहुभाषी दक्षता अर्जित की।
1885रुस्तमजी कामा से विवाह; प्रारंभिक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) सत्रों में भागीदारी।तत्कालीन राजनीतिक विमर्शों और राष्ट्रवादी बहसों से प्रारंभिक परिचय।
1896बंबई में अकाल और ब्यूबोनिक प्लेग राहत कार्य।प्लेग से संक्रमित हुईं; एक परोपकारी से सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में रूपांतरण।
1902चिकित्सीय उपचार के लिए लंदन प्रवास।सुदीर्घ यूरोपीय निर्वासन की शुरुआत; प्रवासी नेटवर्कों में सक्रिय भागीदारी।
1904–1905दादाभाई नौरोजी की निजी सचिव।ब्रिटिश संसदीय और समिति प्रक्रियाओं की प्रत्यक्ष व्यावहारिक समझ प्राप्त की।
1905लंदन में 'इंडियन होम रूल सोसाइटी' की सह-स्थापना।पूर्ण स्वराज की मांग के लिए श्यामजी कृष्ण वर्मा के साथ साझेदारी की।
1907स्टटगार्ट (22 अगस्त) में 'भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज' फहराया।विदेशी धरती पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का पहला ऐतिहासिक आरोहण।
1909पेरिस स्थानांतरण; 'पेरिस इंडियन सोसाइटी' की सह-स्थापना।एक अंतरराष्ट्रीय आधार स्थापित किया; क्रांतिकारी पत्रिका वंदे मातरम् की शुरुआत की।
1914–1917प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस में नजरबंदी।मार्सिले में भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रेरित करने का प्रयास; फ्रांसीसी पुलिस द्वारा नजरबंद।
1935चिकित्सीय याचिका के पश्चात बंबई वापसी (प्रत्यावर्तन)।राजनीति में भाग न लेने की सख्त शर्त के तहत भारत लौटने की अनुमति।
1936मुंबई के पारसी जनरल अस्पताल में देहावसान (13 अगस्त)।अपनी व्यक्तिगत संपत्ति महिला अनाथालयों और पारसी ट्रस्टों के नाम वसीयत की।

लंदन में राजनीतिक गतिविधियाँ और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद की ओर संक्रमण

लंदन में अपने शुरुआती वर्षों के दौरान, मैडम कामा ने स्वयं को महानगरीय संवैधानिक राजनीति में सक्रिय रखा। उनकी संगठनात्मक क्षमताओं के कारण उनका जुड़ाव दादाभाई नौरोजी से हुआ, जो उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश समिति का नेतृत्व कर रहे थे और ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के पहले भारतीय सदस्य के रूप में कार्यरत थे। नौरोजी की निजी सचिव के रूप में कार्य करते हुए, कामा ने राजनीतिक लॉबिंग, ब्रिटिश उदारवादियों के साथ पत्राचार और औपनिवेशिक आर्थिक दोहन (Drain of Wealth) पर आधारित सार्वजनिक व्याख्यानों में हिस्सा लिया।

हालाँकि, 'प्रार्थना, याचिका और विरोध' (Prayer, Petition, and Protest) की उदारवादी रणनीति उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को संतुष्ट करने में असमर्थ रही। 1905 के बंगाल विभाजन ने जब पूरे भारत में स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया, तब कामा ने स्वयं को अधिक समझौताहीन और उग्रवादी नेताओं के साथ जोड़ा, जिनमें प्रमुख रूप से श्यामजी कृष्ण वर्मा शामिल थे। वर्मा ने उत्तरी लंदन के हाईगेट में 'इंडिया हाउस' की स्थापना की थी, जो क्रांतिकारी भारतीय छात्रों के लिए एक आवासीय और वैचारिक केंद्र बन गया था।

फरवरी 1905 में, वर्मा और सरदार सिंह राणा (एस. आर. राणा) के साथ मिलकर मैडम कामा ने 'इंडियन होम रूल सोसाइटी' की स्थापना में सहयोग किया। उन्होंने लंदन के हाइड पार्क में सार्वजनिक सभाओं को संबोधित करना शुरू किया, जहाँ उन्होंने भारत में ब्रिटिश निरंकुशता की भर्त्सना की और प्रवासियों से पूर्ण स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया।

उनके बढ़ते प्रभाव को भांपते हुए ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने उनके विरुद्ध कठोर खुफिया निगरानी शुरू कर दी। जब उन्होंने भारत लौटने के लिए आधिकारिक अनुमति हेतु आवेदन किया, तो औपनिवेशिक प्रशासन ने यह शर्त रखी कि उन्हें भविष्य में किसी भी ब्रिटिश-विरोधी गतिविधि में शामिल न होने के एक औपचारिक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने होंगे। अपने सिद्धांतों से समझौता करने से इनकार करते हुए, कामा ने उस बांड पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया और महाद्वीपीय यूरोप में अपने क्रांतिकारी नेटवर्क का विस्तार करते हुए निर्वासन में ही रहना स्वीकार किया।

1907 का स्टटगार्ट सम्मेलन: भारतीय स्वतंत्रता के ध्वज का आरोहण

मैडम कामा के जीवन का सबसे ऐतिहासिक क्षण 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ट में आयोजित 'द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस' के दौरान आया। इस सम्मेलन में दुनिया भर के एक हजार से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जो विभिन्न ट्रेड यूनियनों और समाजवादी दलों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इनमें व्लादिमीर लेनिन, ज्यां जाउरेस और रोजा लक्जमबर्ग जैसी प्रमुख वैश्विक हस्तियां उपस्थित थीं।

Plaintext

 

हरी पट्टी (शीर्ष)        :  आठ अधखिले कमल (ब्रिटिश भारत के आठ प्रांत) केसरिया पट्टी (मध्य)    :  देवनागरी लिपि में "वंदे मातरम्" लाल पट्टी (निचली)       :  उत्तोलक सिरे (Hoist) पर सूर्य (हिंदू) और छोर (Fly) पर अर्धचंद्र (मुस्लिम)

सम्मेलन में ब्रिटिश राजनयिक प्रतिनिधियों ने यह तर्क देकर कामा के बोलने पर रोक लगाने का प्रयास किया कि भारत कोई स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र नहीं है। किंतु प्रभावशाली यूरोपीय समाजवादी नेताओं—अगस्त बेबेल, क्लारा ज़ेटकिन और एच. एम. हाइंडमैन—ने मंच तक उनकी पहुंच सुनिश्चित की। अंतरराष्ट्रीय सभा को संबोधित करते हुए कामा ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन पर कड़ा प्रहार किया और विस्तार से बताया कि कैसे ब्रिटिश आर्थिक नीतियों और अत्यधिक भू-राजस्व वसूली के कारण बार-बार विनाशकारी अकाल पड़े, जिनसे लाखों निर्दोष लोगों की असमय मौत हुई।

अपने भाषण के समापन पर, उन्होंने सभा के समक्ष हाथ से सिला हुआ तिरंगा लहराया और उद्घोष किया:

"यह भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज है। देखिए, इसका जन्म हो चुका है! यह युवा भारतीय शहीदों के रक्त से पवित्र हुआ है। इस ध्वज के नाम पर, मैं दुनिया भर के स्वतंत्रता-प्रेमियों से इस संघर्ष का समर्थन करने की अपील करती हूँ।"

स्टटगार्ट ध्वज का डिज़ाइन और प्रतीकवाद

मैडम कामा द्वारा फहराया गया यह ध्वज विनायक दामोदर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा के सहयोग से सह-डिज़ाइन किया गया था। यह 1906 के 'कलकत्ता ध्वज' (कमल ध्वज) का ही एक परिष्कृत रूप था, जिसे विभाजन-विरोधी आंदोलन के दौरान एक एकीकृत राष्ट्रीय पहचान प्रस्तुत करने के लिए अनुकूलित किया गया था।

इस ध्वज की संरचनात्मक बनावट इस प्रकार थी:

शीर्ष पट्टी (हरा रंग): इस पर आठ अधखिले कमल अंकित थे, जिनमें से प्रत्येक ब्रिटिश भारत के आठ प्रमुख प्रशासनिक प्रांतों (बंगाल, बंबई, मद्रास, संयुक्त प्रांत, पंजाब, मध्य प्रांत, असम और बर्मा) का प्रतीक था।

मध्य पट्टी (केसरिया/स्वर्ण-पीला रंग): इस पर गहरे देवनागरी लिपि में राष्ट्रीय नारा "वंदे मातरम्" अंकित था।

निचली पट्टी (लाल रंग): इस पर दो समन्वित धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीक प्रदर्शित थे: उत्तोलक सिरे (स्तंभ की ओर) एक चमकता हुआ सूर्य (हिंदू परंपरा का प्रतीक) और उड़ते हुए सिरे (बाहरी किनारे) की ओर तारे के साथ एक अर्धचंद्र (इस्लामी परंपरा का प्रतीक), जो साम्राज्यवादी शासन के विरुद्ध सांप्रदायिक एकता को रेखांकित करता था।

सम्मेलन के बाद, इस मूल ध्वज को यूरोप में समाजवादी नेटवर्कों द्वारा सुरक्षित रखा गया। बाद में गुजराती राष्ट्रवादी और सांसद इंदुलाल याज्ञिक द्वारा इसे गुप्त रूप से ब्रिटिश भारत लाया गया। इसे महाराष्ट्र में संरक्षित किया गया और वर्तमान में यह पुणे के मराठा और केसरी पुस्तकालय (केसरी वाड़ा) में जनता के दर्शनार्थ सुरक्षित है।

भारत में प्रारंभिक राष्ट्रवादी ध्वजों का विकास

प्रारंभिक भारतीय ध्वजों के क्रमिक और प्रतीकात्मक रूपांतरण को समझना आधुनिक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण विषय है:

ध्वज संस्करणवर्ष और स्थानमुख्य वास्तुकार / ध्वजारोहकप्रमुख हेराल्डिक और प्रतीकात्मक विशेषताएँ
कलकत्ता ध्वज (कमल ध्वज)7 अगस्त 1906; पारसी बागान स्क्वायर, कलकत्ताशचींद्र प्रसाद बोस और सुकुमार मित्राहरे, पीले और लाल रंग की तीन क्षैतिज पट्टियाँ; शीर्ष पर आठ सफेद कमल; केंद्र में देवनागरी में 'वंदे मातरम्'; नीचे सूर्य और अर्धचंद्र।
स्टटगार्ट ध्वज (भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज)22 अगस्त 1907; स्टटगार्ट, जर्मनीमैडम भीकाजी कामा, वी. डी. सावरकर और एस. के. वर्माहरा, केसरिया और लाल रंग की तीन क्षैतिज पट्टियाँ; आठ कमल (प्रांत); केंद्र में 'वंदे मातरम्'; नीचे सूर्य और अर्धचंद्र।
होम रूल आंदोलन ध्वज1917; पूरे ब्रिटिश भारत मेंबाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंटपाँच लाल और चार हरी वैकल्पिक क्षैतिज पट्टियाँ; ऊपरी कैंटन में यूनियन जैक; सप्तऋषि तारामंडल के सात सितारे; एक सफेद अर्धचंद्र और तारा।
स्वराज ध्वज (स्वराज्य ध्वज)1921 (विजयवाड़ा) एवं संशोधित 1931 (कराची)पिंगली वेंकैया (महात्मा गांधी द्वारा अनुमोदित)1921: लाल और हरी पट्टियाँ तथा चरखा। 1931: केसरिया, सफेद और हरी पट्टी जिसके केंद्र में चरखा स्थापित था।
तिरंगा (भारत का राष्ट्रीय ध्वज)22 जुलाई 1947 को अंगीकृत; संविधान सभा, नई दिल्लीपिंगली वेंकैया द्वारा अभिकल्पित; डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व वाली तदर्थ ध्वज समितिगहरा केसरिया, सफेद और गहरा हरा; चरखे के स्थान पर केंद्र में 24 तीलियों वाला नेवी ब्लू अशोक चक्र; 2:3 का आयामी अनुपात।

पेरिस इंडियन सोसाइटी और क्रांतिकारी प्रचार नेटवर्क

जुलाई 1909 में मदन लाल धींगरा द्वारा लंदन में ब्रिटिश राजनीतिक अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वायली की हत्या के बाद, स्कॉटलैंड यार्ड ने इंडिया हाउस से जुड़े भारतीय प्रवासियों पर कड़ा शिकंजा कस दिया। परिणामस्वरूप, मैडम कामा ने अपने संगठनात्मक मुख्यालय को पेरिस (फ्रांस) स्थानांतरित कर दिया और मुंचेरशाह बुरजोरजी गोदरेज तथा एस. आर. राणा के साथ मिलकर 'पेरिस इंडियन सोसाइटी' की स्थापना की।

उस समय पेरिस अंतरराष्ट्रीय असंतुष्टों, समाजवादी विचारकों और साम्राज्यवाद-विरोधी बुद्धिजीवियों का एक प्रमुख केंद्र था। 25 रुए डी पोंथियू स्थित मैडम कामा का आवास एक सुरक्षित ठिकाने (Safe House), बौद्धिक विचार-केंद्र और यूरोप की यात्रा करने वाले भारतीय क्रांतिकारियों—जिनमें वी. डी. सावरकर, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय और लाला हरदयाल शामिल थे—के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन गया।

भूमिगत प्रकाशन और वितरण

ब्रिटिश भारत में औपनिवेशिक प्रेस प्रतिबंधों का मुकाबला करने के लिए, मैडम कामा ने विदेशों से भूमिगत राष्ट्रवादी पत्रिकाओं का वित्तपोषण, संपादन और वितरण किया:

वंदे मातरम्: 10 सितंबर 1909 को पेरिस से इसकी शुरुआत भारत में इस गीत और इसी नाम के प्रकाशन पर लगे औपनिवेशिक प्रतिबंध के सीधे जवाब के रूप में की गई थी। इसके शुरुआती महीनों में इसका संपादन लाला हरदयाल (जिन्होंने बाद में उत्तरी अमेरिका में गदर पार्टी की स्थापना में सहायता की) ने किया। इस मासिक पत्रिका ने ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन की तीखी आलोचना की और क्रांतिकारी गतिविधियों का विवरण प्रकाशित किया।

मदन्स तलवार (द तलवार): 1909 के अंत में मदन लाल धींगरा के बलिदान की स्मृति में इसकी शुरुआत की गई थी। मुख्यतः पेरिस और बर्लिन से प्रकाशित इस पत्र का संपादकीय प्रबंधन वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय द्वारा किया जाता था। इस पत्र ने औपनिवेशिक अधिकारियों के विरुद्ध क्रांतिकारी प्रतिरोध और वैचारिक संघर्ष का खुलकर समर्थन किया।

तस्करी और गुप्त लॉजिस्टिक माध्यम: चूंकि समुद्री सीमा शुल्क अधिनियम (Sea Customs Act) और भारतीय प्रेस अधिनियम (Indian Press Act) के तहत ब्रिटिश भारतीय बंदरगाहों पर प्रत्यक्ष शिपमेंट प्रतिबंधित था, इसलिए पेरिस नेटवर्क ने इन प्रकाशनों को फ्रांसीसी उपनिवेश पांडिचेरी (पुदुचेरी) के माध्यम से भारत भेजा। इन साहित्यों को धार्मिक ग्रंथों, औद्योगिक बक्सों और वाद्ययंत्रों के भीतर छिपाकर भेजा जाता था। इस तस्करी सामग्री ने बंगाल, महाराष्ट्र और मद्रास में घरेलू क्रांतिकारी प्रकोष्ठों को वैचारिक रूप से सक्रिय रखने में मदद की, जिसने आगे चलकर भगत सिंह जैसे प्रमुख क्रांतिकारियों को भी प्रभावित किया।

संगठन / प्रकाशनस्थापना कालसंचालन का प्राथमिक केंद्रप्रमुख प्रवर्तक एवं सहयोगीमुख्य कार्य एवं लक्षित पाठक
इंडियन होम रूल सोसाइटीफरवरी 1905लंदन, इंग्लैंडएस. के. वर्मा, भीकाजी कामा, एस. आर. राणाब्रिटिश जनमत को लक्षित करते हुए संवैधानिक और राजनीतिक आंदोलन चलाना।
पेरिस इंडियन सोसाइटी1905–1909पेरिस, फ्रांसमैडम कामा, एस. आर. राणा, एम. बी. गोदरेजविदेशी क्रांतिकारी प्रकोष्ठों का समन्वय करना और राजनीतिक शरण सुरक्षित करना।
वंदे मातरम् (पत्रिका)10 सितंबर 1909पेरिस / जिनेवामैडम कामा (प्रकाशक), लाला हरदयाल (संपादक)भारतीय राष्ट्रीय संप्रभुता की मांगों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसार करना।
मदन्स तलवार (द तलवार)1909 के अंत मेंपेरिस / बर्लिनमैडम कामा, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्यायसशस्त्र क्रांतिकारी प्रतिरोध का बचाव और राजनीतिक शहीदों की स्मृति का संरक्षण।

प्रथम विश्व युद्ध की राजनीति, निर्वासन और अंतिम स्वदेश वापसी

प्रथम विश्व युद्ध के भू-राजनीतिक समीकरणों ने पेरिस इंडियन सोसाइटी की गतिविधियों को बाधित कर दिया। जब अगस्त 1914 में युद्ध शुरू हुआ, तो ब्रिटेन और फ्रांस ने एक औपचारिक सैन्य गठबंधन बना लिया। फ्रांसीसी सरकार, जो पहले अपनी सीमाओं के भीतर ब्रिटिश-विरोधी राजनीतिक गतिविधियों के प्रति सहिष्णु थी, पर ब्रिटिश विदेश कार्यालय द्वारा भारतीय असंतुष्टों की गतिविधियों को दबाने का भारी दबाव बनाया गया।

अक्टूबर 1914 में, मैडम कामा और एस. आर. राणा ने मार्सिले के फ्रांसीसी सैन्य बंदरगाह का दौरा किया, ताकि पश्चिमी मोर्चे पर तैनाती के लिए आ रहे ब्रिटिश भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट के भारतीय सैनिकों के बीच राजनीतिक पर्चे बांटे जा सकें। फ्रांसीसी अधिकारियों ने तत्काल हस्तक्षेप किया। एस. आर. राणा को उनके परिवार सहित कैरेबियाई द्वीप मार्टीनिक निर्वासित कर दिया गया, जबकि मैडम कामा को विशी में सैन्य निगरानी में नजरबंद किया गया और बाद में दक्षिणी फ्रांस स्थानांतरित कर दिया गया। गिरते स्वास्थ्य के कारण यद्यपि नवंबर 1917 में उन्हें हिरासत से रिहा कर दिया गया, किंतु वे बोर्डो में पुलिस निगरानी में रहीं और युद्ध की समाप्ति तक उन्हें स्थानीय प्रान्त में साप्ताहिक रिपोर्ट देनी पड़ती थी।

युद्धों के बीच के वर्षों (Interwar Years) में कामा ने यूरोपीय बुद्धिजीवियों और अंतरराष्ट्रीय समाजवादी नेताओं के साथ संपर्क बनाए रखा, जिनमें फ्रांसीसी सांसद और व्लादिमीर लेनिन शामिल थे। लेनिन ने उन्हें सोवियत संघ में निवास करने का निमंत्रण भी दिया था—जिस प्रस्ताव को उन्होंने फ्रांस में ही रहने के पक्ष में अस्वीकार कर दिया।

1935 तक, पक्षाघात (Paralytic Stroke) के गंभीर दौरे और ढलती उम्र ने मैडम कामा को पूरी तरह से बिस्तर पर ला दिया और वे पूरी तरह से चिकित्सीय देखभाल पर निर्भर हो गईं। भारत में उद्योगपति सर कावासजी जहाँगीर सहित अपने प्रभावशाली मित्रों की मदद से, उन्होंने औपचारिक रूप से ब्रिटिश भारत सरकार के समक्ष स्वदेश लौटने की अनुमति के लिए याचिका दायर की। उनकी शारीरिक असमर्थता को देखते हुए, औपनिवेशिक प्रशासन ने इस शर्त पर वापसी की अनुमति दी कि वे किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि से दूर रहने के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करेंगी।

वे नवंबर 1935 में बंबई पहुँचीं। लगभग नौ महीने तक अस्वस्थ रहने के बाद, मैडम भीकाजी कामा का 13 अगस्त 1936 को 74 वर्ष की आयु में मुंबई के पारसी जनरल अस्पताल में निधन हो गया। सामाजिक कल्याण के प्रति अपनी आजीवन प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए, उन्होंने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति का अधिकांश हिस्सा 'बाई अवाबाई फ्रामजी पेटिट गर्ल्स हाई स्कूल' को दान कर दिया और मुंबई के मझगांव में स्थित 'फ्रामजी नसरवानजी पटेल अगियारी' (अग्नि मंदिर) के लिए ट्रस्ट की स्थापना की।

प्रमुख तथ्य और परीक्षा-उपयोगी आंकड़े

प्रतियोगी परीक्षाओं के पुनरीक्षण के लिए मैडम कामा के जीवन और ऐतिहासिक विरासत से जुड़े प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं:

जन्म एवं निधन: जन्म 24 सितंबर 1861 को बंबई में; निधन 13 अगस्त 1936 को पारसी जनरल अस्पताल, बंबई में।

स्टटगार्ट की विशिष्टता: 22 अगस्त 1907 को स्टटगार्ट, जर्मनी में 'द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस' के दौरान विदेशी धरती पर भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराने वाली पहली भारतीय।

संस्थागत जुड़ाव: लंदन में दादाभाई नौरोजी की निजी सचिव; 'इंडियन होम रूल सोसाइटी' (लंदन, 1905) की संस्थापक समर्थक; 'पेरिस इंडियन सोसाइटी' (1905-1909) की सह-संस्थापक।

प्रमुख भूमिगत प्रकाशन: वंदे मातरम् (संपादक: लाला हरदयाल) और मदन्स तलवार (सहयोगी: वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय) की स्थापना, वित्तपोषण और वितरण।

तस्करी का केंद्र: प्रतिबंधित क्रांतिकारी समाचार पत्रों और साहित्यों की खेप को फ्रांसीसी पांडिचेरी के माध्यम से सुनियोजित रूप से ब्रिटिश भारत में भेजा जाता था।

मूल ध्वज का संरक्षण: 1907 के मूल स्टटगार्ट ध्वज को इंदुलाल याज्ञिक द्वारा गुप्त रूप से भारत लाया गया था और यह वर्तमान में पुणे (महाराष्ट्र) के मराठा और केसरी पुस्तकालय में संरक्षित है।

स्वतंत्रता के बाद आधिकारिक सम्मान:

11वें गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 1962) पर भारतीय डाक विभाग द्वारा एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया।

भारतीय तटरक्षक बल (ICGS) ने 1997 में प्रियदर्शिनी-श्रेणी के एक तीव्र गश्ती पोत का नाम 'आईसीजीएस भीकाजी कामा' रखा।

नई दिल्ली में एक प्रमुख केंद्रीय सरकारी और वाणिज्यिक कार्यालय जिले का नाम उनके सम्मान में 'भीकाजी कामा प्लेस' रखा गया।

वडोदरा (गुजरात) के 'क्रांति वन' में एक स्मारक प्रतिमा और प्रदर्शनी स्थापित की गई है।

आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

UPSC सिविल सेवा परीक्षा और विभिन्न राज्य लोक सेवा आयोगों (UPPSC, BPSC, MPSC, RAS आदि) की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए मैडम भीकाजी कामा की ऐतिहासिक भूमिका पाठ्यक्रम के कई प्रमुख विषयों से सीधे जुड़ती है।

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए प्रासंगिकता: भारत का इतिहास और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

क्रांतिकारी संगठनों, उनके भौगोलिक केंद्रों और प्रमुख प्रकाशनों पर प्रारंभिक परीक्षा में नियमित रूप से प्रश्न पूछे जाते हैं:

विगत वर्षों के प्रश्नों का संदर्भ (UPSC CSE 2006): एक बहु-कथनीय प्रश्न में मैडम कामा के जीवन से जुड़े तथ्यों का परीक्षण किया गया था, जिसमें अभ्यर्थियों से पूछा गया था: (1) क्या उन्होंने पेरिस में ध्वज फहराया था या स्टटगार्ट में, (2) क्या उन्होंने दादाभाई नौरोजी की निजी सचिव के रूप में कार्य किया था, और (3) उनकी पारसी पृष्ठभूमि। गलत कथनों को छांटने के लिए अभ्यर्थियों को सटीक तथ्यात्मक जानकारी—जैसे स्टटगार्ट (जर्मनी) और पेरिस (फ्रांस) के अंतर को समझना—होना अनिवार्य है।

कालानुक्रमिक मानचित्रण: राज्य स्तरीय परीक्षाओं में अक्सर प्रारंभिक राष्ट्रीय ध्वजों के कालक्रम का परीक्षण किया जाता है, जैसे कि 1906 का कलकत्ता लोटस ध्वज, 1907 का स्टटगार्ट ध्वज, 1931 का कराची कांग्रेस ध्वज और 1947 में संविधान सभा द्वारा अंगीकृत राष्ट्रीय ध्वज।

संगठनात्मक और संपादकीय मिलान: क्रांतिकारी पत्रिकाओं (वंदे मातरम्, द तलवार, द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट) को उनके संस्थापकों और विदेशी मुद्रण केंद्रों के साथ सुमेलित करना आधुनिक भारतीय इतिहास में प्रश्नों का एक सामान्य प्रारूप है।

UPSC मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 के लिए प्रासंगिकता: स्वतंत्रता संग्राम

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (GS Paper 1) के कई आवर्ती विषयों के लिए मैडम कामा का योगदान ठोस ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत करता है:

भारतीय उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का बाह्य आयाम: मुख्य परीक्षा में प्रायः यह विश्लेषण पूछा जाता है कि राष्ट्रवाद ने भारत की सीमाओं से परे किस प्रकार कार्य किया। उत्तर में यह स्पष्ट किया जा सकता है कि कामा और उनके समकालीनों ने ब्रिटिश अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को चुनौती देने, साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता का लाभ उठाने और भारत में हथियारों व साहित्य के लॉजिस्टिक मार्ग तैयार करने के लिए विदेशी नेटवर्कों (लंदन, पेरिस, बर्लिन) का उपयोग किस प्रकार किया।

प्रारंभिक स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका: जहाँ पाठ्यपुस्तकें मुख्य रूप से गांधीवादी जन आंदोलनों (1920 के बाद) के दौरान महिलाओं की भागीदारी को रेखांकित करती हैं, वहीं मैडम कामा यह सिद्ध करती हैं कि महिलाओं ने प्रारंभिक क्रांतिकारी और स्वदेशी आंदोलनों (1905–1914) के दौरान भी सक्रिय नेतृत्वकारी भूमिका निभाई थी। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, महिला शिक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए उनकी सार्वजनिक वकालत यह दर्शाती है कि प्रारंभिक नेताओं ने महिला मुक्ति को उपनिवेशवाद-विरोधी संप्रभुता के साथ कैसे जोड़ा।

साम्राज्यवाद-विरोध को वैश्विक समाजवादी आंदोलनों से जोड़ना: स्टटगार्ट कांग्रेस में कामा का हस्तक्षेप एक प्रारंभिक उदाहरण है जहाँ एक भारतीय राष्ट्रवादी ने औपनिवेशिक दासता को व्यापक अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवाद-विरोधी और श्रमिक राजनीति के साथ जोड़ा। इसने उस वैचारिक दिशा का बीजारोपण किया जिसने बाद में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं को भी गहराई से प्रभावित किया।

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