UPSC समसामयिकी: वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1 FY27) में भारत का चालू खाता घाटा बढ़कर $4.2 बिलियन हुआ | दैनिक सामान्य ज्ञान अपडेट एवं अथर्व एग्ज़ामवाइज़ विश्लेषण
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा प्रकाशित प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1 FY27) के दौरान भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) बढ़कर $4.2 बिलियन अथवा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 0.5% हो गया। यह वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही (Q1 FY26) में दर्ज $3.4 बिलियन के घाटे (GDP का 0.4%) की तुलना में सांकेतिक और आनुपातिक दोनों दृष्टियों से वृद्धि को दर्शाता है। घाटे में यह विस्तार मुख्य रूप से व्यापारिक (मर्चेंडाइज) व्यापार घाटे के बढ़कर $86.1 बिलियन होने के कारण हुआ, जो औद्योगिक इनपुट, कच्चे तेल और मध्यवर्ती पूंजीगत वस्तुओं के लिए निरंतर घरेलू मांग को प्रदर्शित करता है।
हालाँकि, अदृश्य प्राप्तियों (Invisible Earnings) में मजबूत वृद्धि—विशेष रूप से सॉफ्टवेयर सेवाओं और विदेश से आने वाले धन प्रेषण (Remittances)—ने एक प्रति-चक्रीय सुरक्षा कवच (Counter-cyclical cushion) प्रदान किया, जिसने समग्र घाटे को विवेकपूर्ण सीमाओं के भीतर सीमित रखा। वित्तपोषण के मोर्चे पर, उच्च पोर्टफोलियो बहिर्वाह के साथ-साथ वाणिज्यिक उधारी और अनिवासी जमाओं में कमी के कारण भुगतान संतुलन (Balance of Payments - BoP) के आधार पर आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार से शुद्ध निकासी दर्ज की गई।
अथर्व एग्ज़ामवाइज़ समसामयिकी से तैयारी करने वाले सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए यह आर्थिक घटनाक्रम सीधे तौर पर UPSC सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-III (GS Paper III) और राज्य PCS परीक्षाओं के समष्टि अर्थशास्त्र (Macroeconomics) पाठ्यक्रम से संबंधित है।
मुख्य तथ्य और सांख्यिकीय झलकियां: Q1 FY27 एक नज़र में
भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी प्रमुख सांख्यिकीय तथ्य इस प्रकार हैं:
चालू खाता घाटा (CAD): Q1 FY27 में बढ़कर $4.2 बिलियन (GDP का 0.5%) हो गया, जो Q1 FY26 में $3.4 बिलियन (GDP का 0.4%) था।
व्यापारिक व्यापार घाटा (Merchandise Trade Gap): पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही के $68.9 बिलियन की तुलना में बढ़कर $86.1 बिलियन हो गया।
शुद्ध सेवा प्राप्तियां (Net Services Receipts): कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, व्यावसायिक परामर्श और परिवहन सेवाओं में विस्तार के सहारे एक वर्ष पूर्व के $47.9 बिलियन से बढ़कर $51.6 बिलियन हो गईं।
द्वितीयक आय (प्रेषण/Remittances): भारतीय प्रवासियों द्वारा किए गए व्यक्तिगत धन हस्तांतरण के कारण Q1 FY26 के $33.2 बिलियन से बढ़कर $42.9 बिलियन पर पहुंच गई।
प्राथमिक आय बहिर्वाह (Primary Income Outgo): कम निवेश आय भुगतान के कारण Q1 FY26 के $13.3 बिलियन से घटकर $10.5 बिलियन रह गया।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): शुद्ध FDI अंतर्वाह $6.1 बिलियन दर्ज किया गया, जो Q1 FY26 में $5.2 बिलियन था।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI): Q1 FY26 के $1.6 बिलियन के शुद्ध अंतर्वाह के विपरीत Q1 FY27 में तीव्र गिरावट के साथ $9.6 बिलियन का शुद्ध बहिर्वाह दर्ज हुआ।
अनिवासी जमा एवं बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ECBs): अनिवासी जमाओं में शुद्ध अंतर्वाह घटकर $2.8 बिलियन (पहले $3.6 बिलियन) रहा, जबकि शुद्ध बाह्य वाणिज्यिक उधारी घटकर $3.3 बिलियन (पहले $4.4 बिलियन) रह गई।
विदेशी मुद्रा भंडार: BoP आधार पर आधिकारिक भंडार में $8.1 बिलियन का संकुचन (कमी) हुआ, जबकि Q1 FY26 में $4.5 बिलियन की वृद्धि (संचय) दर्ज की गई थी।
तुलनात्मक विश्लेषण: Q1 FY26 बनाम Q1 FY27 भुगतान संतुलन (BoP)
नीचे दी गई तालिका भारत के बाह्य खातों का एक संरचित तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करती है, जो वर्तमान देनदारियों और पूंजी वित्तपोषण की बदलती प्रकृति को दर्शाती है:
| बाह्य क्षेत्र संकेतक | Q1 FY26 (गत वर्ष की समान तिमाही) | Q1 FY27 (समीक्षाधीन तिमाही) | पूर्ण एवं संरचनात्मक विचलन |
|---|---|---|---|
| चालू खाता संतुलन | -$3.4 बिलियन (-0.4% GDP) | -$4.2 बिलियन (-0.5% GDP) | घाटे में $0.8 बिलियन (GDP का 10 bps) का विस्तार |
| दृश्य व्यापार घाटा (मर्चेंडाइज) | -$68.9 बिलियन | -$86.1 बिलियन | व्यापार घाटे में $17.2 बिलियन की वृद्धि |
| शुद्ध सेवा प्राप्तियां (अदृश्य मदें) | +$47.9 बिलियन | +$51.6 बिलियन | शुद्ध अधिशेष में $3.7 बिलियन का विस्तार |
| द्वितीयक आय (व्यक्तिगत प्रेषण) | +$33.2 बिलियन | +$42.9 बिलियन | प्रेषण में $9.7 बिलियन की वृद्धि |
| प्राथमिक आय संतुलन (शुद्ध बहिर्वाह) | -$13.3 बिलियन | -$10.5 बिलियन | शुद्ध बहिर्वाह में $2.8 बिलियन का संकुचन |
| शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) | +$5.2 बिलियन | +$6.1 बिलियन | अंतर्वाह में $0.9 बिलियन का विस्तार |
| विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) | +$1.6 बिलियन | -$9.6 बिलियन | -$11.2 बिलियन का शुद्ध नकारात्मक उलटफेर |
| बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ECBs) | +$4.4 बिलियन | +$3.3 बिलियन | अंतर्वाह में $1.1 बिलियन की कमी |
| अनिवासी भारतीय (NRI) जमा | +$3.6 बिलियन | +$2.8 बिलियन | अंतर्वाह में $0.8 बिलियन की कमी |
| विदेशी मुद्रा भंडार (BoP आधार) | +$4.5 बिलियन (संचय) | -$8.1 बिलियन (निकासी) | -$12.6 बिलियन का शुद्ध नकारात्मक परिवर्तन |
समष्टि आर्थिक वैचारिक ढांचा: चालू खाता क्या है?
भुगतान संतुलन (BoP) की कार्यप्रणाली को समझने के लिए चालू लेन-देन और पूंजी निर्माण के बीच संरचनात्मक विभाजन को जानना आवश्यक है।
भुगतान संतुलन की संरचना
भुगतान संतुलन किसी देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच एक निश्चित समयावधि में किए गए सभी आर्थिक लेन-देन का एक व्यापक लेखा रिकॉर्ड होता है। इसे सामान्यतः अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के बैलेंस ऑफ पेमेंट्स मैनुअल (BPM6) के आधार पर तैयार किया जाता है। प्रत्येक लेन-देन को क्रेडिट (विदेशी मुद्रा का अंतर्वाह, जिसे धनात्मक संकेत के साथ दर्शाया जाता है) या डेबिट (विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह, जिसे ऋणात्मक संकेत के साथ दर्शाया जाता है) के रूप में दर्ज किया जाता है।
बाह्य बहीखाता दो प्राथमिक खातों में विभाजित होता है: चालू खाता (Current Account) और पूंजी खाता (Capital Account)। FDI और पोर्टफोलियो प्रवाह जैसे निवेशों को दर्ज करने के लिए अक्सर पूंजी खाते के साथ या उसके भीतर एक तीसरा वर्ग, वित्तीय खाता (Financial Account) भी दर्शाया जाता है।
चालू खाते के प्रमुख घटक
चालू खाता उन वास्तविक आर्थिक लेन-देन को दर्ज करता है जो किसी राष्ट्र की बाह्य परिसंपत्ति या देनदारी स्थिति में परिवर्तन नहीं करते हैं। पूंजी खाते के विपरीत—जो भविष्य के ऋण या इक्विटी पुनर्भुगतान के दायित्व बनाता है—चालू खाता चार घटकों के माध्यम से वास्तविक राष्ट्रीय आय सृजन और व्यय को दर्शाता है:
व्यापारिक खाता (दृश्य व्यापार / Visible Trade): यह घटक भौतिक वस्तुओं के सीमा-पार आयात और निर्यात को दर्ज करता है। निर्यात राजस्व ($X_g$) और आयात व्यय ($M_g$) का अंतर दृश्य व्यापार संतुलन निर्धारित करता है। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में यह उप-खाता आमतौर पर संरचनात्मक घाटा प्रदर्शित करता है, क्योंकि कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक घटकों, औद्योगिक मशीनरी और सोने जैसे आवश्यक इनपुट का बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ता है।
सेवा खाता (अदृश्य व्यापार / Invisible Trade): इसमें अमूर्त वाणिज्यिक उत्पादों के लिए सीमा-पार प्राप्तियां और भुगतान शामिल होते हैं। इसके प्रमुख क्षेत्रों में कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर सेवाएं, व्यावसायिक व प्रबंधन परामर्श, वित्तीय मध्यस्थता, वैश्विक परिवहन और पर्यटन प्राप्तियां शामिल हैं। भारत इस उप-खाते में एक संरचनात्मक अधिशेष बनाए रखता है, जो वस्तु व्यापार घाटे को संतुलित करने में मदद करता है।
प्राथमिक आय खाता (कारक आय / Factor Income): यह खाता सीमा-पार उत्पादन के कारकों (भूमि, श्रम, पूंजी) के पारिश्रमिक को दर्ज करता है। इसमें दो प्रमुख प्रवाह शामिल हैं:
कर्मचारियों का पारिश्रमिक: विदेशों में अस्थायी रूप से कार्यरत घरेलू श्रमिकों या घरेलू स्तर पर कार्यरत विदेशी श्रमिकों द्वारा अर्जित शुद्ध मुआवजा।
निवेश आय: लाभांश, विदेशी सहायक कंपनियों से अर्जित व्यावसायिक लाभ और बाह्य वाणिज्यिक ऋणों तथा सरकारी प्रतिभूतियों पर देय ब्याज भुगतान का सीमा-पार प्रवाह।
द्वितीयक आय खाता (एकपक्षीय हस्तांतरण / Unilateral Transfers): इसमें ऐसे एकतरफा सीमा-पार हस्तांतरण शामिल होते हैं जिनके बदले में कोई प्रत्यक्ष आर्थिक वस्तु, सेवा या परिसंपत्ति प्रदान नहीं की जाती। इसके प्रमुख उदाहरणों में प्रवासी श्रमिकों द्वारा भेजे जाने वाले व्यक्तिगत प्रेषण (Remittances), विदेशी सरकारों द्वारा दिए जाने वाले आधिकारिक अनुदान और अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सहायता शामिल हैं।
गणितीय संतुलन और बचत-निवेश सर्वसमिका (Savings-Investment Identity)
चालू खाता घाटा तब उत्पन्न होता है जब वस्तुओं, सेवाओं और कारक भुगतानों के लिए कुल डेबिट (बहिर्वाह) कुल क्रेडिट (आय) से अधिक हो जाता है:
$$\text{CAD} = (\text{वस्तुओं एवं सेवाओं का आयात} - \text{वस्तुओं एवं सेवाओं का निर्यात}) + \text{प्राथमिक एवं द्वितीयक आय का शुद्ध बहिर्वाह}$$
समष्टि अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से, चालू खाता संतुलन राष्ट्रीय आय लेखांकन से सीधे जुड़ा हुआ है। कुल घरेलू उत्पादन ($Y$) उपभोग ($C$), निवेश ($I$), सरकारी व्यय ($G$) और शुद्ध निर्यात ($NX = X - M$) के बीच विभाजित होता है:
$$Y = C + I + G + (X - M)$$
सकल राष्ट्रीय बचत ($S$) को निजी उपभोग और सार्वजनिक व्यय के बाद शेष बची राष्ट्रीय आय के रूप में परिभाषित किया जाता है ($S = Y - C - G$)। इसे राष्ट्रीय उत्पादन सर्वसमिका में प्रतिस्थापित करने पर यह स्पष्ट होता है कि बाह्य चालू खाता संतुलन कुल घरेलू बचत और कुल घरेलू पूंजी निवेश के अंतर के बराबर होता है:
$$\text{चालू खाता संतुलन} = S - I$$
अतः, चालू खाता घाटा यह दर्शाता है कि अर्थव्यवस्था का कुल निवेश उसकी घरेलू बचत से अधिक है ($I > S$)। यदि इसमें सरकार के राजकोषीय संतुलन को शामिल किया जाए, जहाँ कुल बचत निजी बचत ($S_p$) और सार्वजनिक बचत ($T - G$) का योग है, तो:
$$\text{CAD} = (I - S_p) + (G - T)$$
यह समीकरण प्रदर्शित करता है कि बढ़ता हुआ CAD या तो निजी बचत-निवेश अंतर, बढ़ते सरकारी राजकोषीय घाटे, या इन दोनों के संयोजन को दर्शाता है—आर्थिक नीति में इसे "ट्विन डेफिसिट" (जुड़वां घाटा) परिकल्पना कहा जाता है।
बढ़ते घाटे के प्रेरक कारक और समष्टि आर्थिक स्थिरीकरणकर्ता
Q1 FY27 में भारत के चालू खाता घाटे का बढ़कर $4.2 बिलियन होना बाह्य खातों के भीतर परस्पर विरोधी शक्तियों का शुद्ध परिणाम था:
+-----------------------------------------------------------------------------------+ | भारत का Q1 FY27 चालू खाता घाटा | | ($4.2 बिलियन) | +------------------------------------------+----------------------------------------+ | | घाटा बढ़ाने वाले प्रमुख कारक समष्टि आर्थिक सुरक्षा कवच | | * व्यापारिक व्यापार अंतर: $86.1B * शुद्ध सेवा प्राप्तियां: $51.6B (Q1 FY26 के $68.9B से बढ़ा) (Q1 FY26 के $47.9B से वृद्धि; IT, परामर्श) * मजबूत घरेलू औद्योगिक मांग * व्यक्तिगत प्रेषण (Remittances): $42.9B * उच्च कमोडिटी और ऊर्जा आयात (द्वितीयक आय के तहत $33.2B से वृद्धि) * कम प्राथमिक आय बहिर्वाह: $10.5B (ऋण अदायगी घटने से $13.3B से घटकर)
व्यापारिक व्यापार घाटे का विस्तार
बाह्य घाटे के बढ़ने का प्राथमिक कारण दृश्य व्यापार घाटे का $17.2 बिलियन बढ़कर $86.1 बिलियन हो जाना था। यह गिरावट निम्नलिखित संरचनात्मक और चक्रीय कारकों से प्रेरित थी:
ऊर्जा आयात की अनम्यता (Energy Inelasticity): भारत की निरंतर घरेलू आर्थिक वृद्धि के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उच्च आयात की आवश्यकता होती है। हाइड्रोकार्बन के घरेलू विकल्पों की सीमित उपलब्धता के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों और बढ़ती औद्योगिक खपत ने आयात बिल को बढ़ा दिया।
पूंजीगत वस्तुओं की मांग: सार्वजनिक पूंजीगत व्यय (Capex) और निजी औद्योगिक क्षमता विस्तार ने मशीन टूल्स, विद्युत उपकरण और मध्यवर्ती घटकों के आयात की मांग को बनाए रखा।
वैश्विक मांग की सुस्ती: भारत के व्यापारिक निर्यातों को यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे पारंपरिक उन्नत व्यापारिक साझेदारों की सुस्त मांग का सामना करना पड़ा, जिससे वस्तुओं के निर्यात की वृद्धि सीमित रही।
संतुलनकारी अदृश्य मदों का सुरक्षा कवच
व्यापार घाटे के प्रभाव को संतुलित करने में अदृश्य व्यापार और हस्तांतरण खातों के तीन घटकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई:
उच्च-मूल्य सेवाओं की सुदृढ़ता: शुद्ध सेवा प्राप्तियां Q1 FY26 के $47.9 बिलियन से बढ़कर $51.6 बिलियन हो गईं। इस वृद्धि को एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर विकास, आईटी सहायता, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) और परिवहन लॉजिस्टिक्स से बल मिला।
प्रेषण अंतर्वाह में उछाल: द्वितीयक आय के तहत व्यक्तिगत धन प्रेषण पिछले वर्ष के $33.2 बिलियन से बढ़कर $42.9 बिलियन दर्ज हुआ। उन्नत पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में भारतीय पेशेवरों और खाड़ी देशों में भारतीय कामगारों की मांग ने सीमा-पार प्रेषण के शीर्ष वैश्विक प्राप्तकर्ता के रूप में भारत की स्थिति को सुदृढ़ किया।
शुद्ध प्राथमिक बहिर्वाह में कमी: शुद्ध कारक घाटा $13.3 बिलियन से घटकर $10.5 बिलियन रह गया। RBI के अनुसार, इसका कारण घरेलू अर्थव्यवस्था में सक्रिय विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा लाभांश वापसी और विदेशी ऋण-अदायगी में कमी आना था।
वित्तीय खाता गतिशीलता, पूंजी बहिर्वाह और विदेशी मुद्रा भंडार
भुगतान संतुलन के नियमों के अनुसार, चालू खाते के किसी भी घाटे को पूंजी अंतर्वाह या विदेशी मुद्रा भंडार से निकासी द्वारा वित्तपोषित किया जाना अनिवार्य है। Q1 FY27 में पूंजी प्रवाह के स्वरूप में बड़े बदलाव देखे गए।
+-----------------------------------------------------------------------------------+ | Q1 FY27 पूंजी एवं वित्तीय गतिशीलता | +------------------------------------------+----------------------------------------+ | स्थिर दीर्घकालिक अंतर्वाह | अस्थिर बहिर्वाह एवं भंडार में कमी | +------------------------------------------+----------------------------------------+ | * शुद्ध FDI अंतर्वाह: $6.1 बिलियन | * शुद्ध FPI बहिर्वाह: -$9.6 बिलियन | | (गत वर्ष के $5.2B से मामूली वृद्धि) | (+$1.6B के अंतर्वाह से तीव्र गिरावट) | | | * बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ECBs): $3.3B | | | (गत वर्ष के $4.4B से कम) | | | * अनिवासी जमा (NRI Deposits): $2.8B | | | (गत वर्ष के $3.6B से कम) | +------------------------------------------+----------------------------------------+ | शुद्ध BoP प्रभाव: विदेशी मुद्रा भंडार में $8.1 बिलियन की कमी दर्ज हुई | +-----------------------------------------------------------------------------------+
FDI और FPI प्रवाह में विचलन
दीर्घकालिक निवेश और अल्पकालिक बाजार पूंजी प्रवाह के बीच स्पष्ट अंतर देखा गया:
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में लचीलापन: शुद्ध FDI अंतर्वाह बढ़कर $6.1 बिलियन हो गया (Q1 FY26 में $5.2 बिलियन)। FDI गैर-ऋण, टिकाऊ इक्विटी निवेश को दर्शाता है जो घरेलू विनिर्माण और बुनियादी ढांचे का निर्माण करता है, जो दीर्घकालिक निवेशक विश्वास का प्रतीक है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में तीव्र उलटफेर: पोर्टफोलियो आवंटन में $9.6 बिलियन का बहिर्वाह दर्ज हुआ, जबकि Q1 FY26 में $1.6 बिलियन का अंतर्वाह हुआ था। FPI अत्यधिक संवेदनशील और अस्थिर पूंजी होती है, जो वैश्विक ब्याज दरों के अंतर, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बदलाव और इक्विटी मूल्यांकन पर तेजी से प्रतिक्रिया देती है। इस बहिर्वाह ने घरेलू परिसंपत्ति मूल्यांकन और विदेशी मुद्रा तरलता पर दबाव डाला।
ऋण-सृजक चैनलों में मंदी
पूंजी प्रवाह के अन्य पारंपरिक स्रोतों में भी तिमाही के दौरान सुस्ती रही:
बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ECBs): शुद्ध ECB प्राप्तियां पिछले वर्ष के $4.4 बिलियन से घटकर $3.3 बिलियन रह गईं, क्योंकि उच्च वैश्विक ब्याज दरों के कारण विदेशी कॉरपोरेट वित्तपोषण घरेलू ऋण बाजार की तुलना में अधिक महंगा हो गया।
अनिवासी जमा (NRI Deposits): अनिवासी जमा में शुद्ध अंतर्वाह $3.6 बिलियन से गिरकर $2.8 बिलियन रह गया, जो विदेशी और घरेलू निश्चित आय साधनों के बीच कम होते यील्ड अंतर को दर्शाता है।
आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार में कमी
चूंकि शुद्ध पूंजी और वित्तीय प्रवाह बढ़े हुए चालू खाता घाटे और FPI बहिर्वाह की भरपाई करने में अपर्याप्त रहे, इसलिए समग्र भुगतान संतुलन ऋणात्मक हो गया। Q1 FY27 में BoP आधार पर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में $8.1 बिलियन की कमी आई, जबकि Q1 FY26 में $4.5 बिलियन का संचय हुआ था। यह गिरावट मुद्रा की अस्थिरता को रोकने और बाह्य दायित्वों को पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक द्वारा बाजार में डॉलर जारी किए जाने का परिणाम है।
आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है
UPSC सिविल सेवा और राज्य PSC परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए भुगतान संतुलन की घटनाएं गतिशील समसामयिक मुद्दों को समष्टि अर्थशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों से जोड़ती हैं।
नीचे दी गई तालिका विभिन्न परीक्षा चरणों के अनुसार इन विषयों के महत्व को दर्शाती है:
| परीक्षा चरण | पाठ्यक्रम क्षेत्र | प्रमुख अवधारणाएं |
|---|---|---|
| UPSC प्रारंभिक परीक्षा (Paper I) | आर्थिक एवं सामाजिक विकास | BoP के घटक, चालू बनाम पूंजी खाता मदें, FDI बनाम FPI स्थिरता, विदेशी मुद्रा भंडार की संरचना, और मुद्रा अवमूल्यन तंत्र। |
| UPSC मुख्य परीक्षा (GS Paper III) | भारतीय अर्थव्यवस्था तथा संसाधनों को जुटाना | बचत-निवेश गतिशीलता, जुड़वां घाटे का प्रबंधन, बाह्य ऋण स्थिरता, निर्यात विविधीकरण, और बाह्य संवेदनशीलता को कम करने के उपाय। |
| राज्य PSC एवं अन्य परीक्षाएं | सामान्य अध्ययन (समष्टि अर्थशास्त्र) | प्रेषण में प्रवृत्तियां, व्यापारिक व्यापार संतुलन बनाम सेवा अदृश्य मदें, और RBI के नीतिगत हस्तक्षेप। |
मुख्य परीक्षा के लिए प्रमुख विश्लेषणात्मक अंतर्दृष्टि
CAD की संवहनीयता सीमा (Sustainability Threshold): GDP का 0.5% CAD, भुगतान संतुलन प्रबंधन पर गठित RBI की उच्च-स्तरीय समितियों द्वारा अनुशंसित 2.0% से 2.5% की संवहनीय सीमा के भीतर बना हुआ है। यह प्रबंधनीय बाह्य उधारी आवश्यकताओं को दर्शाता है, बशर्ते सेवाएं और प्रेषण व्यापार घाटे को संतुलित करते रहें।
वित्तपोषण की गुणवत्ता और अस्थिरता जोखिम: किसी अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि चालू खाता घाटा गैर-ऋण FDI द्वारा वित्तपोषित हो रहा है या ऋण-सृजक, अस्थिर पोर्टफोलियो प्रवाह द्वारा। जब पोर्टफोलियो बहिर्वाह व्यापार घाटे के विस्तार के साथ मेल खाता है, तो आधिकारिक भंडार पर दबाव बढ़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार की पर्याप्तता और विनिमय दर प्रबंधन की चुनौती खड़ी होती है।
बचत-निवेश संतुलन ($CAD = I - S$): CAD को घरेलू निवेश और घरेलू बचत के अंतर के रूप में समझना आर्थिक नीतियों का विश्लेषण करने में सहायता करता है। विदेशी बचत पर निर्भरता कम करने के लिए विवेकपूर्ण राजकोषीय समेकन के साथ-साथ घरेलू वित्तीय बचत को बढ़ावा देना आवश्यक है।
UPSC अभ्यर्थियों के लिए अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत के भुगतान संतुलन (BoP) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
विदेशों में कार्यरत भारतीयों द्वारा भेजा गया व्यक्तिगत प्रेषण (Remittances) पूंजी खाते के तहत एकपक्षीय हस्तांतरण के रूप में दर्ज किया जाता है।
चालू खाता घाटे को या तो शुद्ध पूंजी अंतर्वाह द्वारा अथवा आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार से निकासी द्वारा वित्तपोषित किया जाना अनिवार्य है।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) अंतर्वाह से घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए ऋण दायित्व उत्पन्न होते हैं।
शुद्ध सेवा निर्यात में वृद्धि से देश के चालू खाता घाटे को कम करने में सहायता मिलती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
A. केवल 1 और 3
B. केवल 2 और 4
C. केवल 2, 3 और 4
D. केवल 1, 2 और 4
सही उत्तर: B (केवल कथन 2 और 4)
व्याख्या:
कथन 1 गलत है: व्यक्तिगत प्रेषण एकपक्षीय हस्तांतरण हैं, जिन्हें पूंजी खाते के तहत नहीं, बल्कि चालू खाते के 'द्वितीयक आय' उप-खाते में दर्ज किया जाता है।
कथन 2 सही है: BoP लेखांकन सिद्धांतों के अनुसार, चालू खाते के घाटे की भरपाई वित्तीय/पूंजी खाते के शुद्ध अंतर्वाह से या केंद्रीय बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार की निकासी से की जानी चाहिए।
कथन 3 गलत है: FDI इक्विटी पूंजी और प्रत्यक्ष उद्यम स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करता है; यह गैर-ऋण वित्तपोषण का एक रूप है।
कथन 4 सही है: सेवा निर्यात से होने वाली शुद्ध अदृश्य आय व्यापारिक व्यापार घाटे की भरपाई करती है, जिससे समग्र चालू खाता घाटा कम होता है।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: "यद्यपि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए मध्यम चालू खाता घाटा स्वाभाविक माना जाता है, किंतु इसकी संरचनात्मक व्यवहार्यता व्यापार की संरचना और इसे वित्तपोषित करने वाली बाह्य पूंजी की गुणवत्ता पर निर्भर करती है।" हालिया भुगतान संतुलन आंकड़ों के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (GS Paper III, 250 शब्द, 15 अंक)
मार्गदर्शक उत्तर रूपरेखा:
प्रस्तावना: चालू खाता घाटे को परिभाषित करें और RBI के हालिया आंकड़ों का संदर्भ दें, जिसके अनुसार Q1 FY27 में घाटा बढ़कर $4.2 बिलियन (GDP का 0.5%) हो गया, साथ ही व्यापारिक व्यापार अंतर के बढ़ने और सेवाओं से प्राप्तियों की वृद्धि का उल्लेख करें।
मध्यम CAD क्यों सकारात्मक हो सकता है: बचत-निवेश सर्वसमिका ($CAD = I - S$) के माध्यम से CAD का विश्लेषण करें। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए विदेशी बचत का उपयोग उत्पादक बुनियादी ढांचे, मध्यवर्ती इनपुट और उन्नत पूंजीगत उपकरणों में निवेश के लिए घरेलू बचत की कमी को पूरा करने हेतु किया जाता है।
व्यापार संरचना की वास्तविकताएं: भारत के वस्तु व्यापार घाटे के संरचनात्मक कारणों पर चर्चा करें, जिसमें आयातित ऊर्जा और कच्चे माल पर निर्भरता शामिल है। इसके विपरीत सेवा निर्यात और प्रेषण की भूमिका को रेखांकित करें जो घाटे को संतुलित करते हैं।
वित्तपोषण की संरचना और संवेदनशीलता: गैर-ऋण FDI और अस्थिर FPI प्रवाह के बीच अंतर स्पष्ट करें। संरचनात्मक व्यापार घाटे को पूरा करने के लिए अल्पकालिक पूंजी पर निर्भरता के जोखिमों का विश्लेषण करें, विशेषकर तब जब वैश्विक ब्याज दरों में परिवर्तन से पूंजी बहिर्वाह और भंडार में कमी की स्थिति उत्पन्न होती है।
निष्कर्ष एवं नीतिगत उपाय: समष्टि आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए निर्यात विविधीकरण, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना के तहत घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा, ऊर्जा रूपांतरण और RBI द्वारा सक्रिय विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन जैसे नीतिगत उपायों का सुझाव दें।
संरचित पाठ्यक्रम मार्गदर्शन, NCERT फाउंडेशन कार्यक्रम और वैचारिक शिक्षा के लिए अभ्यर्थी अथर्व एग्ज़ामवाइज़ पर डॉ. अजय भामोलिया के मार्गदर्शन में उपलब्ध अध्ययन सामग्री का उपयोग कर सकते हैं।