NCERT, UPSC और MPPSC के लिए लाइव + रिकॉर्डेड कोर्सेस उपलब्ध हैं। निःशुल्क डेमो क्लास के लिए रजिस्टर करें। Live + Recorded courses for NCERT, UPSC & MPPSC now available. Register for a free demo class. अभी रजिस्टर करें → Register Now →
Environment and Biodiversity Hindi Environment and Biodiversity Hindi

UPSC समसामयिकी: भारत में हाथी गलियारों और हाथी अभयारण्यों का संपूर्ण विश्लेषण | अथर्व एग्ज़ामवाइज़ करंट न्यूज़ UPSC समसामयिकी: भारत में हाथी गलियारों और हाथी अभयारण्यों का संपूर्ण विश्लेषण | अथर्व एग्ज़ामवाइज़ करंट न्यूज़

25 Aug 2026 25 Aug 2026

UPSC समसामयिकी: भारत में हाथी गलियारों और हाथी अभयारण्यों का संपूर्ण विश्लेषण | अथर्व एग्ज़ामवाइज़ करंट न्यूज़
Environment and Biodiversity Hindi 25 Aug 2026

UPSC समसामयिकी: भारत में हाथी गलियारों और हाथी अभयारण्यों का संपूर्ण विश्लेषण | अथर्व एग्ज़ामवाइज़ करंट न्यूज़

वृहद-पारिस्थितिकीय संदर्भ: कीस्टोन और अम्ब्रेला प्रजाति के रूप में एशियाई हाथी

एशियाई हाथी (Elephas maximus) दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय वन पारिस्थितिक तंत्रों में एक आधारभूत स्थान रखता है। एक सर्वोत्कृष्ट कीस्टोन प्रजाति (Keystone species) और पारिस्थितिक तंत्र इंजीनियर (Ecosystem engineer) के रूप में कार्य करते हुए, एशियाई हाथी वानस्पतिक संरचना को संशोधित करता है, प्राकृतिक रिक्त स्थान (clearings) बनाता है जो वन अनुक्रमण (forest succession) को सुगम बनाते हैं, बड़े बीजों वाली वनस्पतियों को लंबी दूरियों तक प्रकीर्णित करता है, तथा ऐसे जल गर्तों (hydrological depressions) को बनाए रखता है जो मौसमी सूखे के दौरान सह-स्थानिक वन्यजीवों (sympatric wildlife) को सहारा देते हैं। चूँकि हाथियों का एक झुंड सैकड़ों वर्ग किलोमीटर में विस्तृत विशाल गृह-परिक्षेत्र (home range) बनाए रखता है, इसलिए हाथी एक अम्ब्रेला प्रजाति (Umbrella species) के रूप में भी कार्य करता है; इसके विशाल और निरंतर पर्यावास को सुरक्षित करना अप्रत्यक्ष रूप से बंगाल टाइगर (Panthera tigris) जैसे शीर्ष परभक्षियों सहित व्यापक पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

ऐतिहासिक रूप से पश्चिम में दजला-फ़रात (टिग्रिस-यूफ्रेट्स) बेसिन से लेकर पूर्व में यांग्त्ज़ी नदी तक निरंतर वितरित एशियाई हाथी के भौगोलिक विस्तार में भारी संकुचन हुआ है, और वर्तमान में यह अपनी ऐतिहासिक सीमा के केवल 5% से 7% हिस्से में ही सीमित है। भारत इस प्रजाति के लिए सर्वप्रमुख जनसांख्यिकीय गढ़ बना हुआ है, जहाँ वैश्विक जंगली आबादी का 60% से अधिक हिस्सा निवास करता है (उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, पूर्व-मध्य और दक्षिणी क्षेत्रीय परिदृश्यों में समन्वित राष्ट्रीय गणना में लगभग 29,964 हाथी दर्ज किए गए)।

कृषि विस्तार, निष्कर्षण उद्योगों (extractive industries) और रैखिक अवसंरचना (linear infrastructure) के कारण संरक्षित क्षेत्रों का तेजी से होता विखंडन परिदृश्य-स्तरीय कनेक्टिविटी (landscape-scale connectivity) को अनिवार्य बनाता है। हाथी गलियारे (Elephant Corridors)—जिन्हें पारिस्थितिक रूप से भूमि की ऐसी कार्यात्मक और संकीर्ण पट्टियों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो हाथियों को दो या दो से अधिक व्यावहारिक पर्यावास खंडों के बीच मौसमी या स्थायी आवागमन की सुविधा प्रदान करते हैं—आनुवंशिक सेतु (genetic bridges) के रूप में कार्य करते हैं। इन पारिस्थितिक जीवन-रेखाओं को बनाए रखने से जनसांख्यिकीय अलगाव के खतरों को रोका जा सकता है, आनुवंशिक विचलन (genetic drift) को कम किया जा सकता है, स्थानीय अंतःप्रजनन अवनति (inbreeding depression) पर अंकुश लगाया जा सकता है, और दीर्घकालिक मेटापॉपुलेशन व्यवहार्यता को बनाए रखा जा सकता है। अभ्यर्थी अथर्व एग्ज़ामवाइज़ एनवायरनमेंट नोट्स में पूरक पारिस्थितिकीय रूपरेखाओं का अध्ययन कर सकते हैं।

प्रमुख निष्कर्ष: 'एलीफेंट कॉरिडोर्स ऑफ इंडिया' रिपोर्ट

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने प्रोजेक्ट एलीफेंट प्रभाग के माध्यम से, राज्य वन विभागों और वन्यजीव अनुसंधान निकायों के सहयोग से, 'एलीफेंट कॉरिडोर्स ऑफ इंडिया' (Elephant Corridors of India) शीर्षक से एक ज़मीनी स्तर पर सत्यापित रिपोर्ट जारी की। यह ऐतिहासिक प्रकाशन देश के आवागमन मार्गों की वर्तमान स्थानिक सीमाओं, परिचालन स्थिति और पारिस्थितिक स्वास्थ्य को रेखांकित करता है।

क्षेत्रीय परिदृश्य (Regional Landscape)ज़मीनी स्तर पर सत्यापित गलियारे (Ground-Validated Corridors)राष्ट्रीय कुल में हिस्सेदारी (%)प्रमुख पारिस्थितिक एवं मानवजनित विशेषताएँ (Dominant Ecological & Anthropogenic Characteristics)
पूर्व-मध्य भारत (East-Central India)5235%ओपन-कास्ट खनन, व्यापक कृषि और गंभीर मानव-हाथी संघर्ष से प्रेरित उच्च विखंडन।
उत्तर-पूर्व भारत (North-East India)4832%रैखिक परिवहन नेटवर्क, चाय बागानों और बाढ़ के मैदानों से आच्छादित सघन तलहटी कनेक्टिविटी।
दक्षिण भारत (Southern India)3221%व्यावसायिक बागानों और बुनियादी ढाँचों से विखंडित पश्चिमी और पूर्वी घाट पर्वतीय परिसर।
उत्तर भारत (Northern India)1812%बढ़ते शहरी प्रसार, नहरों और राजमार्गों के दबाव में तराई-भाबर रैखिक भूभाग।
अखिल भारतीय कुल (Pan-India Total)150100%15 हाथी-विस्तार वाले राज्यों में 33 नामित हाथी अभयारण्यों (Elephant Reserves) को जोड़ता है।

मात्रात्मक वृद्धि और स्थानिक सीमांकन

ज़मीनी स्तर पर सत्यापित सूची: इस राष्ट्रीय मूल्यांकन ने 15 हाथी-विस्तार वाले राज्यों में 150 क्षेत्र-सत्यापित गलियारों को सूचीबद्ध किया, जो 2010 की ऐतिहासिक 'गजह' (Gajah) रिपोर्ट में एलीफेंट टास्क फोर्स द्वारा मूल रूप से पहचाने गए 88 गलियारों की तुलना में 40% की वृद्धि दर्शाता है।

राज्य-स्तरीय संकेंद्रण: पश्चिम बंगाल में देश भर में गलियारों का सर्वाधिक घनत्व है, जिसमें 26 मार्ग शामिल हैं (उत्तरी उप-हिमालयी डुआर्स और दक्षिणी विखंडित परिदृश्यों दोनों में वितरित)।

नेटवर्क लिंकेज: ये 150 मार्ग 10 प्रमुख मैक्रो-परिदृश्यों में फैले 33 हाथी अभयारण्यों को परस्पर जोड़ते हैं, जिससे भिन्न-भिन्न संरक्षित क्षेत्रों के बीच संरचनात्मक कनेक्टिविटी बनी रहती है।

ज़मीनी सत्यापन कार्यप्रणाली

स्थानिक सटीकता और कार्रवाई योग्य संरक्षण योजना सुनिश्चित करने के लिए मूल्यांकन में एक मानकीकृत कार्यप्रणाली का उपयोग किया गया:

संयुक्त क्षेत्र सत्यापन समितियों (जिसमें प्रोजेक्ट एलीफेंट के प्रतिनिधि, राज्य वन्यजीव प्रभाग के अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल थे) ने वास्तविक समय में हाथियों की आवाजाही के साक्ष्य दर्ज करने के लिए संरचित प्रश्नावली का उपयोग किया।

गलियारों को कार्यात्मक वर्गों में वर्गीकृत किया गया: सक्रिय (Active) (झुंडों द्वारा आदतन और प्रभावी रूप से उपयोग किए जाने वाले, प्रत्यक्ष देखे जाने, पदचिह्न/विष्ठा सर्वेक्षणों और GPS-टेलीमेट्री डेटा द्वारा पुष्ट) और बाधित (Impaired) (ऐसे मार्ग जहाँ भौतिक व्यवधान, गंभीर क्षरण या निर्मित बाधाओं के कारण हाथियों की आवाजाही लगभग समाप्त हो चुकी है)।

मैपिंग प्रोटोकॉल में प्रशासनिक सीमाओं और रास्टर वन-कवर बेस मैप्स पर सांकेतिक दिशात्मक वैक्टर (indicative directional vectors) का उपयोग किया गया, जिसमें क्षेत्रीय भूमि-उपयोग ज़ोनिंग को निर्देशित करते हुए गतिशील पारिस्थितिक लचीलापन बनाए रखने के लिए कठोर भूकर सीमांकन (cadastral demarcations) से जानबूझकर परहेज किया गया।

कार्यात्मक स्थिति और उपयोग प्रवृत्तियाँ

स्थिर से लेकर तीव्र उपयोग: 59 गलियारे निरंतर या बढ़ते हुए मौसमी हाथी आवागमन को प्रदर्शित करते हैं, जो उनके लचीले जैविक उपयोग को दर्शाते हैं।

घटता उपयोग: 29 गलियारों में आवागमन की आवृत्ति में कमी दर्ज की गई है, जो मुख्य रूप से विकासात्मक विखंडन, मानवीय अशांति और भौतिक बाधाओं (bottlenecks) के कारण है।

त्वरित पुनर्स्थापन की आवश्यकता: लगभग 10 गलियारों को स्थायी संरचनात्मक विच्छेद से बचाने के लिए तत्काल पारिस्थितिक पुनर्स्थापन की आवश्यकता है।

भारत में हाथी अभयारण्यों (Elephant Reserves) का नेटवर्क

हाथी अभयारण्य (ERs) प्रोजेक्ट एलीफेंट—1992 में MoEFCC द्वारा शुरू की गई एक केंद्र प्रायोजित योजना—के तहत स्थापित समर्पित परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण इकाइयों का प्रतिनिधित्व करते हैं। राष्ट्रीय उद्यानों या वन्यजीव अभयारण्यों के विपरीत, हाथी अभयारण्य विभिन्न भूमि-स्वामित्व प्रणालियों, जिनमें संरक्षित क्षेत्र, आरक्षित वन, सामुदायिक वन और राजस्व भूमि शामिल हैं, पर एक प्रशासनिक सुरक्षा कवच (administrative overlay) प्रदान करते हैं।

संरक्षण पैरामीटर (Conservation Parameter)सत्यापित डेटा बिंदु (Verified Data Point)रणनीतिक और पारिस्थितिक महत्व (Strategic & Ecological Significance)
कुल हाथी अभयारण्य14 राज्यों में 33 नामित अभयारण्यलगभग 80,000 $\text{km}^2$ के महत्वपूर्ण पर्यावास को समाहित करता है।
पहला नामित अभयारण्यसिंहभूम हाथी अभयारण्य, झारखंड (अधिसूचित 2001)भारत में परिदृश्य-स्तरीय हाथी प्रबंधन की ऐतिहासिक नींव।
सबसे बड़ा हाथी अभयारण्यसिंहभूम हाथी अभयारण्य (~13,440 $\text{km}^2$)विशाल, निरंतर पूर्व-मध्य पर्णपाती और साल वन क्षेत्रों की सुरक्षा करता है।
सबसे छोटा हाथी अभयारण्यसिंगफन हाथी अभयारण्य, नागालैंड (23.5 $\text{km}^2$)पूर्वोत्तर में महत्वपूर्ण तलहटी कनेक्टिविटी प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण शरण-स्थल।
नवीनतम अधिसूचनातराई हाथी अभयारण्य, उत्तर प्रदेश (33वाँ अभयारण्य, 2022)भारत-नेपाल परिदृश्य में सीमा पार वन्यजीव प्रवासन की सुविधा प्रदान करता है।
सर्वाधिक अभयारण्य वाले राज्यअसम (5 अभयारण्य) और तमिलनाडु (5 अभयारण्य)उच्च-संघर्ष इंटरफ़ेस क्षेत्रों में रहने वाली उच्च-घनत्व आबादी की रक्षा करता है।
बाघ-हाथी सह-अस्तित्व (Tiger-Elephant Overlaps)काजीरंगा (असम), पेरियार (केरल), अन्नामलाई (तमिलनाडु), सिमलीपाल (ओडिशा)बहु-प्रजाति संरक्षित आवासों में प्रबंधन तालमेल को अधिकतम करता है।

जनसांख्यिकीय निगरानी दर्शाती है कि दक्षिणी और उत्तर-पूर्वी परिदृश्यों में जंगली हाथियों की संख्या सर्वाधिक है, जिसमें कर्नाटक (6,049 हाथी), असम (5,719 हाथी), और केरल (3,054 हाथी) शीर्ष पर हैं। वन्यजीव जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों पर नियमित विश्लेषणात्मक सारांश अथर्व एग्ज़ामवाइज़ करंट अफेयर्स पर उपलब्ध हैं।

विखंडन के चालक और मानवजनित दबाव बिंदु

हाथियों के विस्तृत गृह-परिक्षेत्रों और मानव बस्तियों के विस्तार के बीच प्रतिच्छेदन ने संरचनात्मक विखंडन को बढ़ा दिया है। पर्यावास का यह अलगाव एक कारण-श्रृंखला (causal cascade) को जन्म देता है: रैखिक बुनियादी ढांचा और कृषि अतिक्रमण मुख्य पर्यावासों को संकुचित करते हैं; यह संकुचन वन सीमा घनत्व (forest edge density) को बढ़ाता है, जो बदले में हाथियों के चारा खोजने के व्यवहार को उच्च-पोषक तत्वों वाली फसलों की ओर मोड़ देता है। इसके परिणामस्वरूप होने वाला मानव-हाथी संघर्ष (HEC) पर्याप्त सामाजिक-आर्थिक नुकसान, मानव और हाथी हताहतों तथा गंभीर प्रतिशोधी दबाव का कारण बनता है, जिसका अंत आनुवंशिक विखंडन और जनसंख्या में गिरावट के रूप में होता है।

रैखिक अवसंरचना और औद्योगिक खतरे

परिवहन नेटवर्क: नामित गलियारों से गुजरने वाली अनियंत्रित रेलवे पटरियां और बहु-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग हाथियों की अस्वाभाविक मृत्यु का एक प्राथमिक स्रोत बने हुए हैं, क्योंकि उच्च गति की टक्कर और झूलती बिजली लाइनों से करंट लगना उनकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी होने वाले प्रवासन को बाधित करता है।

जलवैज्ञानिक परिवर्तन (Hydrological Alterations): बड़े पैमाने पर पनबिजली परियोजनाओं से हाइड्रोपीकिंग संचालन—जैसे लोअर सुबनसिरी हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट से अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाना—हाथियों के बच्चों (बछड़ों) के जीवित रहने के लिए खतरा पैदा करता है और मौसमी नदी पार करने के मार्गों को अस्थिर करता है।

निष्कर्षण औद्योगिकीकरण (Extractive Industrialization): विशेष रूप से झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में ओपन-कास्ट कोयला और लौह-अयस्क खनन सघन वन आवरण को नष्ट करता है और अंकुआ-अंबिया तथा जमपानी-भागबिला जैसे पारंपरिक गलियारों को अवरुद्ध कर देता है, जिससे हाथियों के झुंड कृषि परिदृश्यों में जाने के लिए विवश होते हैं।

मानव-हाथी संघर्ष की गतिशीलता

जैसे-जैसे संरचनात्मक कनेक्टिविटी कम होती जाती है, झुंडों के चारा खोजने की रणनीति गतिशील रूप से मानव-प्रभुत्व वाले क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो जाती है। हाथी अनुकूलन क्षमता, बुद्धिमत्ता और सांस्कृतिक संचरण का प्रदर्शन करते हुए गैर-घातक बाधाओं को दरकिनार कर उच्च-ऊर्जा वाली कृषि फसलों का दोहन करते हैं। यह स्थिति गंभीर सामाजिक-आर्थिक संकट, संपत्ति की हानि और गंभीर मानव मौतों को जन्म देती है—जैसे कि दो दशकों में असम के वन प्रभागों में 1,400 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं—जिससे संरक्षण पहलों के लिए स्थानीय सामुदायिक समर्थन कमजोर होता है।

गलियारा संरक्षण और संघर्ष शमन में तकनीकी नवाचार

आधुनिक वन्यजीव प्रबंधन गलियारों की निगरानी और घातक घटनाओं को रोकने के लिए स्थानिक मॉडलिंग और सेंसर प्रौद्योगिकियों को एकीकृत करता है।

तकनीकी पहल (Technological Initiative)मूल तंत्र और संरचना (Core Mechanism & Architecture)तैनाती का दायरा और प्रदर्शित परिणाम (Deployment Scope & Demonstrated Outcomes)
गजराज प्रणाली (AI डिटेक्शन)रेलवे पटरियों के किनारे हाथियों की आवाजाही के वास्तविक समय के ध्वनिक और भूकंपीय कंपन संकेतों (acoustic and seismic vibration signatures) को पकड़ने के लिए डिस्ट्रीब्यूटेड ऑप्टिकल फाइबर सेंसिंग (DAS) का उपयोग करता है, जिससे लोको-पायलटों को तुरंत सतर्क किया जा सके।पूर्वोत्तर में संवेदनशील गलियारों में 700 किलोमीटर के रेलवे नेटवर्क पर तैनात, जिसने रेल टक्करों को रोकने में 99.5% सटीकता हासिल की है।
GIS और प्रेडिक्टिव स्थानिक मॉडलिंगसूक्ष्म-गलियारों (micro-corridors) और आवागमन मार्गों का नक्शा तैयार करने के लिए सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग, भूमि-उपयोग/भूमि-आवरण (LULC) रास्टर और मशीन लर्निंग को जोड़ता है।पश्चिमी सिंहभूम-ओडिशा जैसे जटिल परिदृश्यों में सूक्ष्म स्तर के कार्यात्मक आरक्षित मार्गों को रेखांकित करता है।
पूर्व चेतावनी और जियो-फेंसिंग (Early Warning & Geo-Fencing)इन्फ्रारेड थर्मल सेंसर सरणियों, स्थानीय समुदायों को स्वचालित एसएमएस अलर्ट और संवेदनशील स्थलों पर सौर ऊर्जा संचालित गैर-घातक ई-फेंसिंग को तैनात करता है।मानव-हाथी आमने-सामने की आकस्मिक मुठभेड़ों को कम करता है और समुदाय-आधारित शमन प्रतिक्रियाओं को सशक्त बनाता है।

पर्यावरण प्रौद्योगिकियों की आगे की समीक्षा को अथर्व एग्ज़ामवाइज़ डेली जीके अपडेट पर ट्रैक किया जा सकता है।

कानूनी, संवैधानिक और संस्थागत शासन संरचना

भारत में हाथी संरक्षण एक बहु-स्तरीय कानूनी ढांचे के तहत संचालित होता है जो वैधानिक अधिनियमों, संवैधानिक कर्तव्यों और न्यायिक घोषणाओं को संतुलित करता है।

वैधानिक और संवैधानिक आधार

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: एशियाई हाथी को अनुसूची I के तहत सर्वोच्च कानूनी संरक्षण प्राप्त है। पारंपरिक राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य नेटवर्क के बाहर स्थित महत्वपूर्ण गलियारा संपर्कों को सरकारी स्वामित्व वाली भूमि पर संरक्षण रिजर्व (धारा 36A) या सामुदायिक भूमि पर सामुदायिक रिजर्व (धारा 36C) के रूप में कानूनी रूप से अधिसूचित किया जा सकता है, जिससे उनके भूमि-उपयोग की स्थिति सुरक्षित हो जाती है।

संवैधानिक निर्देश: पर्यावरण संरक्षण को अनुच्छेद 48A (राज्य के नीति निर्देशक तत्व, जो राज्य को वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का दायित्व सौंपता है) और अनुच्छेद 51A(g) (जीवित प्राणियों के प्रति दयाभाव रखने और उनकी रक्षा करने का प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य) के अंतर्गत शामिल किया गया है, जो संरक्षण न्यायशास्त्र के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में कार्य करते हैं।

आवागमन के अधिकार (Right of Passage) पर न्यायिक निर्णय

प्रवासन का अधिकार: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाथियों के "आवागमन के अधिकार" (Right of Passage) को पर्यावरण संरक्षण के एक अनिवार्य पहलू के रूप में पुष्ट किया है, और राज्य प्रशासनों को गलियारों को सुरक्षित करने तथा प्रवासी मार्गों को बाधित करने वाले अनधिकृत व्यावसायिक ढांचों को ध्वस्त करने का निर्देश दिया है।

सिगुर पठार ऐतिहासिक फैसला: सर्वोच्च न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय ने नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व के भीतर सिगुर हाथी गलियारे की स्थापना करने वाली तमिलनाडु सरकार की वैधानिक अधिसूचना को बरकरार रखा, जिससे पारिस्थितिक मार्गों को बहाल करने के लिए निजी व्यावसायिक रिसॉर्ट संपत्तियों का अधिग्रहण करने के राज्य के अधिकार को मान्यता मिली।

अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण साधन

CITES और MIKE कार्यक्रम: भारत 10 नामित हाथी अभयारण्य स्थलों पर CITES-अनिवार्य हाथियों के अवैध शिकार की निगरानी (Monitoring the Illegal Killing of Elephants - MIKE) कार्यक्रम को सक्रिय रूप से लागू करता है, जो आधारभूत संरक्षण प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के लिए अवैध शिकार के मैट्रिक्स और अवैध हाथी दांत व्यापार के रुझानों की निगरानी करता है।

सत्यापित आधारभूत दस्तावेज़ सीधे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (WTI) के माध्यम से उपलब्ध हैं।

संस्थागत पुनर्गठन: प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफेंट का विलय

23 जून 2023 को, MoEFCC ने प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफेंट की केंद्र प्रायोजित योजनाओं को एक एकीकृत इकाई: 'प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलीफेंट' (PT&E) प्रभाग में विलय करने का प्रशासनिक आदेश जारी किया, जिसे 'वन्यजीव पर्यावासों का एकीकृत विकास' (Integrated Development of Wildlife Habitats) योजना के अंतर्गत समाहित किया गया।

संरचनात्मक आयाम (Structural Dimension)स्वतंत्र स्थिति (विलय से पूर्व)एकीकृत PT&E प्रभाग (2023 के बाद का प्रशासन)
प्रशासनिक ढांचाMoEFCC के भीतर कार्यरत स्वतंत्र प्रभाग।दोनों प्रमुख (फ्लैगशिप) प्रजातियों की देखरेख करने वाला एकीकृत PT&E प्रभाग।
वैधानिक समर्थनराष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA, वैधानिक निकाय) बनाम प्रोजेक्ट एलीफेंट (गैर-वैधानिक)।NTCA का वैधानिक ढांचा विशिष्ट बना हुआ है; प्रोजेक्ट एलीफेंट प्रशासनिक सलाहकार का दर्जा बरकरार रखता है।
वित्तीय प्रबंधनप्रत्येक योजना के लिए अलग, समर्पित बजटीय आवंटन।समेकित वार्षिक कार्य योजनाओं (APO) के माध्यम से प्रबंधित संयुक्त बजटीय आवंटन।
परिदृश्य प्रबंधनस्वतंत्र क्षेत्र-स्तरीय परिचालन अधिदेश।परस्पर व्याप्त (ओवरलैपिंग) बाघ और हाथी अभयारण्यों में सुव्यवस्थित संसाधन उपयोग।

इस एकीकरण का उद्देश्य प्रशासनिक दोहराव को समाप्त करना और परस्पर व्याप्त आवासों (जैसे काजीरंगा, कॉर्बेट और पेरियार) में वित्तीय संसाधनों को सुव्यवस्थित करना है। हालांकि, वन्यजीव पारिस्थितिकीविदों का मानना है कि प्रोजेक्ट एलीफेंट NTCA के समकक्ष वैधानिक समर्थन के बिना संचालित होता है, जिससे यह चिंता उत्पन्न होती है कि वित्तीय संसाधन व्यापक हाथी प्रवासी गलियारों की तुलना में बाघ-केंद्रित संरक्षित क्षेत्रों के पक्ष में असंगत रूप से झुक सकते हैं।

आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

UPSC सिविल सेवा परीक्षा (CSE) और राज्य PSC परीक्षाओं में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों के लिए हाथी संरक्षण के स्थानिक, तकनीकी और संस्थागत आयामों को समझना आवश्यक है:

UPSC प्रारंभिक परीक्षा

पारिस्थितिकी और पर्यावरण भूगोल:

मुख्य आंकड़ों को याद रखें: 15 राज्यों में 150 ज़मीनी स्तर पर सत्यापित गलियारे, जिसमें पूर्व-मध्य भारत में 35% (52 गलियारे) हैं और पश्चिम बंगाल में राज्य स्तर पर सर्वाधिक (26 गलियारे) हैं।

33 हाथी अभयारण्यों के प्रमुख विवरणों को नोट करें: सिंहभूम (झारखंड) पहला और सबसे बड़ा है, सिंगफन (नागालैंड) सबसे छोटा है, और तराई (उत्तर प्रदेश) 33वीं अधिसूचना है।

नीति, योजनाएं और शासन:

AI-संचालित गजराज प्रणाली (डिस्ट्रीब्यूटेड ऑप्टिकल फाइबर सेंसिंग) के परिचालन ढांचे को समझें।

MoEFCC के अंतर्गत प्रोजेक्ट टाइगर और एलीफेंट (PT&E) प्रभाग की प्रशासनिक संरचना को ट्रैक करें।

भारत के 10 नामित CITES MIKE निगरानी स्थलों और वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 36A और 36C के तहत वैधानिक तंत्र की समीक्षा करें।

UPSC मुख्य परीक्षा (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र III)

संरक्षण और रैखिक अवसंरचना नियोजन: हाइड्रोपीकिंग जोखिमों और रेलवे टकरावों जैसे उदाहरणों का उपयोग करते हुए, पारिस्थितिक संरक्षण के साथ विकासात्मक लक्ष्यों के एकीकरण पर संतुलित उत्तर तैयार करें।

मानव-वन्यजीव संघर्ष की गतिशीलता: संरक्षण-कृषि दबाव (Conservation-Agrarian Squeeze), एज-इफेक्ट विस्तार और समुदाय-आधारित शमन मॉडल सहित मानव-हाथी संघर्ष के संरचनात्मक कारणों का विश्लेषण करें।

संवैधानिक और कानूनी न्यायशास्त्र: "आवागमन के अधिकार" (Right of Passage) और गलियारा संरक्षण के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों को शामिल करते हुए, पर्यावरण निबंधों और शासन संबंधी उत्तरों को अनुच्छेद 48A और 51A(g) से जोड़ें।

WhatsApp WhatsApp निःशुल्क डेमो Free Demo कोर्स खरीदें Buy Course
WhatsApp पर बात करें
Chat on WhatsApp