यूपीएससी करेंट अफेयर्स दैनिक सामान्य ज्ञान अपडेट: मेकेदातु बांध परियोजना, कावेरी जल बंटवारा विवाद और पर्यावरणीय प्रभाव
कार्यकारी अवलोकन एवं हालिया कानूनी घटनाक्रम
कर्नाटक में कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु संतुलन जलाशय और पेयजल परियोजना समकालीन भारतीय जल-राजनीति, पर्यावरणीय शासन और संवैधानिक संघवाद में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभरी है। कर्नाटक के रामनगर जिले में नियोजित—बेंगलुरु से लगभग 100 से 110 किलोमीटर दक्षिण और तमिलनाडु के साथ अंतर-राज्यीय सीमा से लगभग 3.90 किलोमीटर अपस्ट्रीम (उर्ध्वप्रवाह)—यह बहुउद्देशीय परियोजना कावेरी बेसिन में ऊपरी और निचले तटवर्ती राज्यों के बीच दीर्घकालिक विवादों को गहरा कर चुकी है।
कावेरी नीरावरी निगम लिमिटेड (CNNL) द्वारा क्रियान्वित इस परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य 67.16 हज़ार मिलियन घन फीट (TMC) की सकल भंडारण क्षमता (लगभग 59.46 TMC उपयोगी/लाइव भंडारण) वाला एक संतुलन जलाशय (बैलेंसिंग रिजर्वोयर) बनाना है। परियोजना का लक्ष्य तेजी से विस्तार कर रहे बेंगलुरु महानगरीय क्षेत्र के लिए 4.75 TMC समर्पित पेयजल सुरक्षित करना और 400 मेगावाट (MW) जलविद्युत उत्पन्न करना है। हालांकि, इस प्रस्ताव को तमिलनाडु के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिसका तर्क है कि ऊपरी तटवर्ती क्षेत्र में कोई भी भंडारण संरचना अदालती आदेशों द्वारा अनिवार्य निचले प्रवाह को बाधित करती है।
हालिया कानूनी कार्यवाहियों में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने परियोजना के प्रारंभिक कदमों को चुनौती देने वाली तमिलनाडु की पुनर्विचार याचिका को समयपूर्व बताते हुए खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) वर्तमान में वैधानिक विशेषज्ञ निकायों—विशेष रूप से केंद्रीय जल आयोग (CWC) और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA)—द्वारा तकनीकी मूल्यांकन के अधीन है, इसलिए वैधानिक मूल्यांकन से पहले डाउनस्ट्रीम अधिकारों पर फैसला नहीं सुनाया जा सकता। इस बीच, तमिलनाडु राज्य विधानसभा ने परियोजना का विरोध करते हुए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किए, जो सीमापारीय जल प्रबंधन को लेकर राजनीतिक और संघीय संवेदनशीलता को उजागर करता है। अभ्यर्थी वैधानिक नदी प्राधिकरणों पर विस्तृत विश्लेषण अथर्व एग्ज़ामवाइज़ इंटर-स्टेट वॉटर डिस्प्यूट्स नोट्स पोर्टल पर देख सकते हैं।
मेकेदातु परियोजना के इंजीनियरिंग पैरामीटर और मुख्य उद्देश्य
कन्नड़ भाषा में 'मेकेदातु' शब्द का अर्थ "बकरी की छलांग" (Goat's Leap) होता है, जो एक संकीर्ण और गहरे कंदरा (गॉर्ज) को संदर्भित करता है जहाँ अर्कावती नदी कावेरी नदी की मुख्य धारा से मिलती है। यह परियोजना समुद्र तल से 440 मीटर की ऊंचाई पर डिज़ाइन किए गए पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) के साथ इस गॉर्ज के पास एक कंक्रीट गुरुत्वाकर्षण बांध (कंक्रीट ग्रेविटी डैम) की परिकल्पना करती है।
परियोजना इंजीनियरिंग विनिर्देश
| परियोजना पैरामीटर | तकनीकी विनिर्देश / विशेषता |
|---|---|
| स्थान | मेकेदातु गॉर्ज, रामनगर जिला, कर्नाटक (कावेरी और अर्कावती नदियों का संगम) |
| अंतर-राज्यीय सीमा से दूरी | तमिलनाडु सीमा (बिलिगुंडलू गेजिंग स्टेशन) से लगभग 3.90 किमी से 5.0 किमी अपस्ट्रीम |
| सकल भंडारण क्षमता | 67.16 TMC (1,901.97 मिलियन क्यूबिक मीटर) |
| पेयजल आवंटन | बेंगलुरु महानगरीय क्षेत्र के लिए 4.75 TMC समर्पित |
| विद्युत उत्पादन क्षमता | 400 MW जलविद्युत (90% निर्भरता पर प्रतिवर्ष 650.28 मिलियन यूनिट) |
| कुल आवश्यक भूमि | 5,252.40 हेक्टेयर (लगभग 12,000 एकड़) |
| कुल जलमग्न क्षेत्र | 4,996.00 हेक्टेयर |
| अनुमानित परियोजना लागत | लगभग ₹9,000 करोड़ |
| EIA श्रेणी | श्रेणी 'A' (MoEFCC द्वारा अनिवार्य केंद्रीय पर्यावरण मंजूरी) |
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रमुख तथ्य
प्राथमिक उद्देश्य: अप्रयुक्त मानसून बाढ़ के पानी (जैसे 2018 में दर्ज) को संचित करने, बेंगलुरु की पेयजल जरूरतों को पूरा करने और नवीकरणीय ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए एक संतुलन जलाशय के रूप में डिजाइन किया गया।
बांध अवसंरचना: एक कंक्रीट गुरुत्वाकर्षण बांध जिसमें रेडियल गेट्स और फ्लिप बकेट एनर्जी डिसिपेटर से युक्त एक केंद्रीय स्पिलवे शामिल है।
विद्युत संयंत्र: 400 MW जलविद्युत उत्पन्न करने वाले टर्बाइनों के लिए तीन अलग-अलग गुहाओं (कैवर्न्स) वाला एक भूमिगत पावरहाउस।
जल स्थानांतरण: बेंगलुरु की ओर 4.75 TMC कच्चे पेयजल के परिवहन के लिए जलाशय के तट पर जैकवेल-कम-पंप हाउस और राइजिंग मेन्स का उपयोग।
अंतर-राज्यीय जल-राजनीति: तर्क और न्यायिक ढांचा
कर्नाटक (ऊपरी तटवर्ती राज्य) और तमिलनाडु (निचले तटवर्ती राज्य) के बीच जल-राजनीतिक विवाद ऐतिहासिक जल आवंटन निर्णयों, मौसमी प्रवाह परिवर्तनशीलता और न्यायसंगत उपयोग (इक्विटेबल यूटिलाइजेशन) के सिद्धांत के इर्द-गिर्द घूमता है। भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र के तहत, अंतर-राज्यीय नदियों को राष्ट्रीय संपत्ति माना गया है, जिसका अर्थ है कि कोई भी एकल राज्य उनके जल पर अनन्य स्वामित्व का दावा नहीं कर सकता।
कावेरी कानूनी ढांचे का विकास
कावेरी बेसिन में जल का आवंटन कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) द्वारा 2007 में निर्धारित किया गया था और फरवरी 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक फैसले द्वारा संशोधित किया गया था।
| बेसिन राज्य / पैरामीटर | CWDT अंतिम निर्णय (2007) | सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (2018) | प्रमुख कानूनी समायोजन और संदर्भ |
|---|---|---|---|
| तमिलनाडु | 419.00 TMC | 404.25 TMC | उपलब्ध भूजल को ध्यान में रखते हुए 14.75 TMC घटाया गया |
| कर्नाटक | 270.00 TMC | 284.75 TMC | विशेष रूप से बेंगलुरु के पेयजल के लिए 14.75 TMC बढ़ाया गया |
| केरल | 30.00 TMC | 30.00 TMC | बिना किसी बदलाव के यथावत रखा गया |
| पुदुचेरी | 7.00 TMC | 7.00 TMC | बिना किसी बदलाव के यथावत रखा गया |
| पर्यावरण संरक्षण प्रवाह | 14.00 TMC | पारिस्थितिकी तंत्र प्रवाह में एकीकृत | नदी गलियारे के पारिस्थितिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आरक्षित |
| बिलिगुंडलू में वार्षिक लक्षित प्रवाह | 192.00 TMC | 177.25 TMC | सामान्य वर्ष में कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु को जारी की जाने वाली अनिवार्य मात्रा |
ऊपरी और निचले तटवर्ती राज्यों के भिन्न दृष्टिकोण
कर्नाटक का तर्क है कि राष्ट्रीय जल नीति के तहत पेयजल को सर्वोच्च प्राथमिकता प्राप्त है। उसका दावा है कि यह परियोजना तमिलनाडु के आवंटित हिस्से को छुए बिना केवल अतिरिक्त मानसून अपवाह को संग्रहीत करेगी। राज्य का मानना है कि यह संतुलन जलाशय प्रवाह को विनियमित करने में मदद करेगा, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि तमिलनाडु को बिलिगुंडलू में उसका अनिवार्य 177.25 TMC वार्षिक आवंटन एक नियंत्रित और अनुमानित तरीके से प्राप्त हो। अभ्यर्थी अथर्व एग्ज़ामवाइज़ इंडियन पॉलिटी मेन्स रिसोर्स हब पर अंतर-राज्यीय संघीय विवादों का विस्तार से अध्ययन कर सकते हैं।
इसके विपरीत, तमिलनाडु का तर्क है कि राज्य की सीमा के निकट एक भंडारण जलाशय के निर्माण से कर्नाटक को डाउनस्ट्रीम प्रवाह पर पूर्ण नियंत्रण मिल जाएगा। तमिलनाडु को डर है कि कम बारिश या सूखे वाले वर्षों में कर्नाटक मेकेदातु जलाशय को भरने को प्राथमिकता देगा, जिससे कावेरी डेल्टा में सांबा चावल की फसल के लिए आवश्यक पानी की आपूर्ति में देरी होगी। इसके अलावा, तमिलनाडु का कहना है कि CWDT के फैसले के तहत, कोई भी बेसिन राज्य सह-तटवर्ती राज्यों की स्पष्ट सहमति और CWMA से मंजूरी के बिना नए बांध या भंडारण संरचनाएं नहीं बना सकता है।
पारिस्थितिक प्रभाव और पर्यावरणीय चिंताएं
जल बंटवारे के विवादों से परे, मेकेदातु परियोजना वन जलमग्नता, आवास विखंडन और लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए खतरों से जुड़ी गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियां पेश करती है।
भूमि जलमग्नता का विवरण
परियोजना के लिए 5,252.40 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है, जिसमें से 4,996 हेक्टेयर जलाशय के तहत पूरी तरह जलमग्न हो जाएगी। चिन्हित परियोजना क्षेत्र का 98% से अधिक भाग संरक्षित वन भूमि के अंतर्गत आता है:
कावेरी वन्यजीव अभयारण्य जलमग्नता: 3,181.90 हेक्टेयर संरक्षित अभयारण्य भूमि जलमग्न हो जाएगी।
आरक्षित वन क्षेत्र: 1,869.50 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि जलाशय में समा जाएगी।
राजस्व भूमि: पांच गांवों—संगम, कोंगदोद्दी, मदवाला, मुथाथी और बोम्मासंद्रा—की 201.00 हेक्टेयर राजस्व भूमि जलमग्न होगी, जिसके लिए भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास की आवश्यकता होगी।
अवसंरचना क्षेत्र: 256.40 हेक्टेयर भूमि का उपयोग बांध निर्माण, भूमिगत बिजलीघरों और पहुंच मार्गों के लिए किया जाएगा।
जैव विविधता और वन्यजीव गलियारा व्यवधान
जलमग्न क्षेत्र कावेरी वन्यजीव अभयारण्य के मुख्य आवास में आता है, जो पश्चिमी और पूर्वी घाटों को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक गलियारा है। प्रमुख जैव विविधता संबंधी चिंताओं में शामिल हैं:
हाथी प्रवासी गलियारा: यह क्षेत्र एशियाई हाथियों (Elephas maximus) के लिए एक प्रमुख पारगमन मार्ग है। इस गलियारे के जलमग्न होने से हाथियों की आवाजाही बाधित होगी और निकटवर्ती कृषि क्षेत्रों में मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने का जोखिम होगा।
संकटग्रस्त प्रजातियों के आवास का नुकसान: यह अभयारण्य बंगाल टाइगर, तेंदुए, स्लॉथ भालू, हनी बेजर (रैटल) और ग्रिजल्ड जायंट गिलहरी (Ratufa macroura)—एक निकट-संकटग्रस्त (Near-Threatened) प्रजाति जिसका नदी के किनारों पर स्थित वितान आवास (कैनोपी हैबिटैट) विखंडन के जोखिम में है—के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करता है।
जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और स्थानिक प्रजातियां: नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव हंप-बैक्ड महसीर (Tor remadevii) के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा करता है, जो कावेरी बेसिन की एक गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) मीठे पानी की स्थानिक मछली है और प्रजनन के लिए स्वतंत्र रूप से बहने वाले नदी क्षेत्रों पर निर्भर करती है।
संरक्षित वन्यजीव अभयारण्य के अंदर स्थित होने और अंतर-राज्यीय सीमा के निकट होने के कारण, परियोजना को पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के तहत 'श्रेणी A' (Category 'A') परियोजना के रूप में वर्गीकृत किया गया है। नतीजतन, इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) से पर्यावरणीय मंजूरी के साथ-साथ राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) से वन्यजीव मंजूरी की आवश्यकता है। उम्मीदवार अथर्व एग्ज़ामवाइज़ एनवायरनमेंट एंड बायोडायवर्सिटी सेक्शन पर पर्यावरण संरक्षण अध्ययन सामग्री प्राप्त कर सकते हैं।
कावेरी नदी प्रणाली की जलवैज्ञानिक रूपरेखा
कावेरी नदी के भौतिक भूगोल को समझना प्रारंभिक परीक्षा के मानचित्रण (मैपिंग) प्रश्नों और मुख्य परीक्षा के प्रायद्वीपीय नदी प्रणाली संबंधी प्रश्नों के लिए आवश्यक है।
| विशेषता | जलवैज्ञानिक एवं भौगोलिक विवरण |
|---|---|
| उत्पत्ति / स्रोत | कर्नाटक के कोडागु जिले में पश्चिमी घाट की ब्रह्मगिरी श्रेणी में स्थित तालकावेरी से उद्गम (~1,341 मीटर की ऊंचाई) |
| कुल लंबाई और प्रवाह मार्ग | कर्नाटक (320 किमी) और तमिलनाडु (357 किमी) से होकर दक्षिण-पूर्व दिशा में लगभग 800 किमी बहती हुई पूम्पुहार में बंगाल की खाड़ी में विसर्जित होती है |
| बेसिन क्षेत्र कवरेज | लगभग 81,155 से 87,900 वर्ग किमी में फैला, जिसमें तमिलनाडु (54%), कर्नाटक (42%), केरल (3.5%), और पुदुचेरी (0.5%) शामिल हैं |
| बाएं तट की सहायक नदियां | हारंगी, हेमावती, शिमशा और अर्कावती |
| दाएं तट की सहायक नदियां | लक्ष्मणतीर्थ, काबिनी, सुवर्णवती, भवानी, नोय्याल और अमरावती |
| वर्षा व्यवस्था (पैटर्न) | पश्चिमी जलग्रहण क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) से वर्षा प्राप्त करता है; पूर्वी जलग्रहण क्षेत्र उत्तर-पूर्वी मानसून (अक्टूबर-दिसंबर) से वर्षा प्राप्त करता है |
| प्रमुख बांध और जलाशय | कर्नाटक में कृष्ण राज सागर (KRS) और काबिनी; तमिलनाडु में मेट्टूर बांध (स्टेनली जलाशय) |
राष्ट्रीय नदी विकास परियोजनाओं पर आधिकारिक अपडेट के लिए उम्मीदवार केंद्रीय जल आयोग (CWC) के आधिकारिक पोर्टल और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के नियामक ढांचे की समीक्षा कर सकते हैं।
यह आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
मेकेदातु बांध विवाद सिविल सेवा परीक्षा के कई खंडों के लिए प्रासंगिक एक अंतर-विषयक केस स्टडी प्रस्तुत करता है:
यूपीएससी सीएसई सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (भारतीय भूगोल): भौतिक भूगोल, नदी बेसिन की गतिशीलता, प्रायद्वीपीय जल निकासी पैटर्न, बाएं/दाएं तट की सहायक नदियों और प्रमुख नदी घाटी अवसंरचना परियोजनाओं के पारिस्थितिक प्रभाव से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित।
यूपीएससी सीएसई सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (राजव्यवस्था एवं शासन): अनुच्छेद 262 के तहत अंतर-राज्यीय जल विवाद, अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम (1956), संघीय जल प्रशासन, वैधानिक नियामक प्राधिकरणों (CWMA, CWC) और अंतर-सीमांत संसाधन प्रबंधन में न्यायिक हस्तक्षेप से जुड़े विषयों के लिए सीधे तौर पर प्रासंगिक।
यूपीएससी सीएसई सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी): पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA श्रेणी 'A' परियोजनाएं), जैव विविधता की हानि, वन डायवर्जन कानून, वन्यजीव गलियारे और पारिस्थितिक संरक्षण के साथ शहरी जल सुरक्षा के संतुलन से संबंधित विषयों में सहायक।
यूपीएससी सीएसई प्रारंभिक परीक्षा (करेंट अफेयर्स एवं मानचित्रण): कावेरी नदी प्रणाली, राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों (कावेरी वन्यजीव अभयारण्य), स्थानिक प्रजातियों के वितरण (हंप-बैक्ड महसीर, ग्रिजल्ड जायंट गिलहरी) और अंतर-राज्यीय सीमा भूगोल से संबंधित स्थान-आधारित प्रश्नों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।