भारत की रणनीतिक स्वायत्तता में तकनीकी और रणनीतिक मील के पत्थर
25 जून 2026 को, भारत के रक्षा इकोसिस्टम ने एयरोस्पेस तकनीक के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल किया। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने आधिकारिक तौर पर स्वदेशी नेत्रा एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (Netra Airborne Early Warning and Control - AEW&C) प्रणाली का फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस (FOC) प्रमाणपत्र भारतीय वायु सेना (IAF) को सौंप दिया। बेंगलुरु (कर्नाटक) स्थित 'सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स' (CABS) में आयोजित इस FOC समारोह ने भारत की पहली घरेलू "आसमान में आंख" (eye in the sky) की पूर्ण परिचालन परिपक्वता (operational maturity) की पुष्टि की है। यह प्रमाणपत्र प्रमाणित करता है कि यह प्रणाली पूरी तरह से युद्ध के लिए तैयार है, संरचनात्मक रूप से मान्य है, और अत्यधिक तीव्र युद्ध स्थितियों में बिना किसी प्रतिबंध के तैनाती के लिए स्वीकृत है।
शुरुआत में 2017 में इसे इनिशियल ऑपरेशनल क्लीयरेंस (IOC) दिया गया था। इसके बाद पूर्ण FOC प्रमाणन प्राप्त करने के लिए नेत्रा प्लेटफॉर्म को लगभग एक दशक तक कड़े परिचालन मूल्यांकनों, डिजाइन संशोधनों और सॉफ्टवेयर अपग्रेड से गुजरना पड़ा। इस औपचारिक हैंडओवर समारोह की अध्यक्षता उप वायु सेना प्रमुख (Deputy Chief of the Air Staff) एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने की, जिसमें वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, DRDO के वैज्ञानिक और निजी रक्षा विनिर्माण भागीदार शामिल हुए। FOC हासिल करने के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा पांच देशों के विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है जो स्वदेशी हवाई निगरानी और युद्ध प्रबंधन सूट (airborne surveillance and battle management suites) का डिजाइन, विकास और तैनाती करने में पूरी तरह सक्षम हैं।
ऐतिहासिक उत्पत्ति, क्रमिक विकास और अकादमिक श्रद्धांजलि
स्वदेशी हवाई प्रारंभिक चेतावनी क्षमता विकसित करने की भारत की यात्रा 1980 के दशक की शुरुआत में 'प्रोजेक्ट गार्जियन' (Project Guardian) के तहत शुरू हुई थी। DRDO के वैज्ञानिकों और वायु सेना (IAF) के अधिकारियों की एक संयुक्त टीम ने हॉकर सिडली HS-748 एवरो (Hawker Siddeley HS-748 Avro) परिवहन विमान को एक प्रोटोटाइप रोटोडोम से लैस करके एयरबोर्न सर्विलांस प्लेटफॉर्म (ASP) में बदलने का प्रयास किया था। इस प्रणाली ने नवंबर 1990 में अपनी पहली उड़ान भरी और 1991 में इसे इटली से आयातित नौसैनिक रडार के साथ एकीकृत किया गया, जो पहली बार था जब किसी भारतीय विमान पर निगरानी रडार का सफल परीक्षण किया गया था।
यह शुरुआती तकनीकी सफलता जनवरी 1999 में एक त्रासदी में बदल गई, जब तमिलनाडु में एक परीक्षण उड़ान के दौरान प्रायोगिक ASP विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस दुर्घटना में DRDO के चार वैज्ञानिकों और IAF के चार जांबाज वायु सैनिकों की जान चली गई। हालांकि इस दुर्घटना ने कार्यक्रम को अस्थायी रूप से रोक दिया, लेकिन ASP टेस्टबेड से प्राप्त संरचनात्मक इंजीनियरिंग डेटा और तकनीकी सीख ने आधुनिक नेत्रा कार्यक्रम की नींव रखी, जिसे अंततः अक्टूबर 2004 में सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) द्वारा औपचारिक रूप से मंजूरी दी गई। जून 2026 के इस FOC समारोह में वैज्ञानिक और सैन्य नेतृत्व ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि को आधिकारिक तौर पर 1999 में सर्वोच्च बलिदान देने वाले उन आठ कर्मियों को समर्पित किया, और यह सिद्ध किया कि उनका अग्रणी कार्य आज एक विश्व स्तरीय रणनीतिक संपत्ति के रूप में परिणत हो चुका है।
नेत्रा कार्यक्रम की एक अनूठी विशेषता यह रही कि भारतीय वायु सेना ने केवल एक अंतिम उपयोगकर्ता (end-user) के रूप में डिलीवरी का इंतजार नहीं किया, बल्कि परियोजना की शुरुआत से ही इसके डिजाइन, परीक्षण, एकीकरण और परिचालन मूल्यांकन चरणों में एक सक्रिय भागीदार की भूमिका निभाई। 2017 के IOC और 2026 के FOC के बीच की अवधि में, सक्रिय मिशनों से प्राप्त प्रत्यक्ष ऑपरेटर फीडबैक के आधार पर प्रणाली में कई महत्वपूर्ण अपग्रेड शामिल किए गए:
स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ESM): पहले इस्तेमाल किए जा रहे आयातित लेगेसी ESM सूट को पूरी तरह से स्वदेशी प्रणाली से बदल दिया गया, जो दुश्मन के उत्सर्जकों (hostile emitters) को उच्च सटीकता के साथ खोजने और वर्गीकृत करने में सक्षम है।
उन्नत रडार प्रोसेसिंग: भारी ग्राउंड क्लटर (जमीनी व्यवधानों) के बीच भी कम ऊंचाई पर उड़ने वाले और कम रडार-क्रॉस-सेक्शन (RCS) वाले लक्ष्यों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने की क्षमता में सुधार के लिए सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम को अपग्रेड किया गया।
सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (SDR): सुरक्षित, जैम-प्रतिरोधी और नेटवर्क-केंद्रित कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए पुराने, हार्डवेयर-निर्भर संचार उपकरणों को हटाकर उच्च क्षमता वाले स्वदेशी SDR से बदला गया।
नेत्रा (Netra) Mk-1 का तकनीकी बुनियादी ढांचा और सिस्टम आर्किटेक्चर
नेत्रा Mk-1 को ब्राजील के साथ 2008 में किए गए एक अनुबंध के तहत संशोधित एम्ब्रेयर EMB-145I (Embraer EMB-145I) ट्विन-इंजन क्षेत्रीय जेट प्लेटफॉर्म पर तैयार किया गया है। इसमें इन-फ़्लाइट रिफ्यूलिंग प्रोब (हवा में ईंधन भरने की प्रणाली), संवर्धित विद्युत ऊर्जा उत्पादन, सहायक कूलिंग सिस्टम और विशेष एयरोडायनामिक संरचनाएं शामिल हैं।
इस प्लेटफॉर्म का प्राथमिक सेंसर एक्टिव एंटीना एरे यूनिट (Active Antenna Array Unit - AAAU) है, जो विमान की पीठ पर लगा एक 8.2 मीटर लंबा 'बैलेंस बीम' ढांचा है। पारंपरिक घूमने वाले रडार (rotating radomes) के विपरीत, यह AAAU एक स्थिर ढांचा है जिसके भीतर DRDO की प्रयोगशाला 'इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट' (LRDE) द्वारा विकसित एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार लगा हुआ है।
यह प्रणाली S-बैंड आवृत्तियों (S-band frequencies) पर काम करती है और इसमें 1,000 से अधिक गैलियम आर्सेनाइड (GaAs) सेमीकंडक्टर-आधारित ट्रांसमिट/रिसीव मॉड्यूल शामिल हैं, जिन्हें 160 मल्टी-मॉड्यूल (TRMMs) में कॉम्पैक्ट रूप से जोड़ा गया है ताकि कई किलोवाट की पीक पावर उत्पन्न की जा सके। ये एरे पीठ-से-पीठ (back-to-back) व्यवस्थित हैं जो 240-डिग्री का इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग एजीमुथ (azimuth) प्रदान करते हैं। यह दुश्मन के लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों और मानव रहित हवाई वाहनों (UAVs) का उनकी साइज और वायुमंडलीय स्थितियों के आधार पर 250 से 375+ किलोमीटर की दूरी से पता लगा सकता है।
इस प्लेटफॉर्म का मिशन सूट एक एकीकृत "सिस्टम ऑफ सिस्टम्स" के रूप में कार्य करता है, जो एक व्यापक रिकॉग्नाइजेबल एयर सिचुएशन पिक्चर (Recognizable Air Situation Picture - RASP) तैयार करने के लिए कई सक्रिय और निष्क्रिय सेंसरों से प्राप्त इनपुट को समेकित करता है। इन उपप्रणालियों (subsystems) का प्रवाह इस प्रकार है:
+-----------------------------------------------------------------+ | नेत्रा Mk-1 AAAU | | +------------------------+ +-----------------------+ | | | प्राथमिक रडार | | द्वितीयक रडार (SSR) | | | | S-बैंड GaAs AESA रडार | | Mode 4/5 IFF सिस्टम | | | +------------------------+ +-----------------------+ | +-------------------------------+---------------------------------+ | v +-------------------------------+---------------------------------+ | ऑनबोर्ड मिशन सूट | | +------------------------+ +-----------------------+ | | | निष्क्रिय रिसीवर | | सुरक्षित डेटा लिंक | | | | ESM / CSM ELINT | | SDR / CBDL / SATCOM | | | +------------------------+ +-----------------------+ | | | | +---------------------------+ | | | ऑनबोर्ड मिशन कंप्यूटर | | | | (डेटा फ्यूजन इंजन) | | | +-------------+-------------+ | +-------------------------------|---------------------------------+ | रियल-टाइम RASP लिंक | v +-------------------------------+---------------------------------+ | ग्राउंड एक्सप्लोइटेशन स्टेशन | | +------------------------+ +-----------------------+ | | | टैक्टिकल कंसोल | <------> | IAF IACCS कोर ग्रिड | | | | डेटा रिकॉर्डिंग/रीप्ले | | (नेशनल एयर ग्रिड) | | | +------------------------+ +-----------------------+ | +-----------------------------------------------------------------+
ऑनबोर्ड मिशन कंप्यूटर द्वारा उत्पन्न रियल-टाइम RASP को C-बैंड लाइन-ऑफ-साइट (LOS) डेटा लिंक या Ku-बैंड उपग्रह संचार के माध्यम से मोबाइल/तैनात करने योग्य ग्राउंड एक्सप्लोइटेशन स्टेशन्स (Ground Exploitation Stations - GES) पर भेजा जाता है। भिसियाना, जोधपुर और अंबाला जैसे प्रमुख हवाई अड्डों पर संचालित होने वाले ये GES इस खुफिया जानकारी को सीधे वायु सेना के केंद्रीकृत इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) में फीड करते हैं, जिससे ग्राउंड-बेस्ड कमांडरों और हवा में भेजे गए इंटरसेप्टर पायलटों को राष्ट्रीय हवाई रक्षा ग्रिड में लाइव थ्रेट डेटा (खतरे का विवरण) स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
परिचालन इतिहास: सक्रिय युद्ध में अवधारणा को सिद्ध करना
नेत्रा प्रणाली की रणनीतिक उपयोगिता वास्तविक दुनिया के अत्यधिक तनावपूर्ण परिचालन परिदृश्यों में बार-बार सिद्ध हुई है, जिसने एक अद्वितीय 'फोर्स मल्टीप्लायर' (बल वर्धक) के रूप में इसकी प्रतिष्ठा को मजबूत किया है।
2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक
फरवरी 2019 में बालाकोट में आतंकी ठिकानों के खिलाफ किए गए एहतियाती, गैर-सैन्य हमलों के दौरान, नेत्रा प्लेटफॉर्म ने भारतीय हवाई क्षेत्र के भीतर गश्त करते हुए प्राथमिक सामरिक कमान पोस्ट (tactical command post) के रूप में कार्य किया था। इस प्लेटफॉर्म के S-बैंड AESA रडार ने दुश्मन के इलाके के काफी अंदर तक का नक्शा तैयार किया, जिससे पाकिस्तान की तरफ से उड़ान भरने वाले लड़ाकू विमानों की समय रहते प्रारंभिक चेतावनी मिली और एयर ट्रैफिक कंट्रोलरों को भारतीय वायु सेना के मिराज-2000 और सुखोई Su-30MKI स्ट्राइक पैकेजों को सुरक्षित रूप से दिशा-निर्देश देने में मदद मिली।
ऑपरेशन सिंदूर (मई 2025)
7 मई 2025 को भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा शुरू किए गए बहु-आयामी अभियान 'ऑपरेशन सिंदूर' (Operation Sindoor) में नेत्रा ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह अभियान 22 अप्रैल 2025 को कश्मीर घाटी के पहलगाम जिले में हुए एक भीषण सीमा पार आतंकवादी हमले के जवाब में शुरू किया गया था, जिसमें 26 नागरिकों की जान चली गई थी। त्वरित और नपे-तुले प्रतिशोध में, भारतीय वायु सेना ने बहावलपुर में जैश-ए-मोहम्मद और मुरीदके में लश्कर-ए-तैयबा के संगठनात्मक मुख्यालयों को निशाना बनाकर नष्ट कर दिया, जबकि भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा (LoC) के पार सीमित कार्रवाई की।
इसके बाद आसमान में छिड़े भीषण हवाई डॉगफाइट के दौरान, पाकिस्तानी सेना ने भारतीय संपत्तियों को निशाना बनाने के लिए चीन निर्मित जे-10सी (J-10C) 4.5-पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को तैनात किया था। नेत्रा प्लेटफॉर्मों ने अत्यधिक चुनौतीपूर्ण और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) से ग्रस्त माहौल में लगातार आसमान की निगरानी की ताकि दुश्मन की तरफ से किसी भी अचानक होने वाले हमले को रोका जा सके। नेत्रा के इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स ने दुश्मन के रडार उत्सर्जनों की सफलतापूर्वक पहचान की, जबकि इसके सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो ने अग्रिम पंक्ति के राफेल (Rafale) और Su-30MKI लड़ाकू विमानों के साथ स्पष्ट संचार बनाए रखा, जिससे भारत का हवाई वर्चस्व पूरी तरह से सुरक्षित रहा।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नेत्रा की सफलता ने दुश्मन के दुष्प्रचार को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। जहां विरोधी सोशल मीडिया अभियानों में बार-बार यह दावा किया जा रहा था कि उन्होंने इस संघर्ष में कई भारतीय राफेल विमानों को मार गिराया है, वहीं जून 2026 में वायु सेना मुख्यालय द्वारा सभी 36 राफेल जेट विमानों के लिए एक मेंटेनेंस ब्रिज सपोर्ट पैकेज की मांग करते हुए जारी किए गए आधिकारिक 'रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल' (RFP) ने यह साबित कर दिया कि पूरा राफेल बेड़ा पूरी तरह सुरक्षित और सक्रिय है।
भू-राजनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय क्षमताएं
नेत्रा की इन शानदार परिचालन सफलताओं के बावजूद, भारत को अपने पड़ोसियों की तुलना में हवाई प्रारंभिक चेतावनी संपत्तियों (airborne early warning assets) के मामले में एक बड़ी संख्यात्मक कमी का सामना करना पड़ रहा है। आधुनिक नेटवर्क-केंद्रित युद्ध के लिए लगातार और निर्बाध हवाई निगरानी की आवश्यकता होती है, और वायु सेना का वर्तमान बेड़ा सीमाओं की विशालता के मुकाबले काफी कम है। भारतीय वायु सेना वर्तमान में केवल छह प्लेटफॉर्म संचालित करती है — तीन स्वदेशी नेत्रा Mk-1 सिस्टम और तीन रूसी प्लेटफॉर्म (IL-76) पर आधारित फाल्कन (Phalcon) AWACS।
रखरखाव, मरम्मत और पायलट प्रशिक्षण चक्रों को ध्यान में रखते हुए पश्चिमी और उत्तरी दोनों सीमाओं पर एक साथ 24 घंटे persistent (सतत) निगरानी बनाए रखने के लिए, भारतीय वायु सेना को कम से कम 18 प्रारंभिक चेतावनी विमानों के बेसलाइन बेड़े की आवश्यकता है।
तालिका 1: क्षेत्रीय प्रारंभिक चेतावनी संपत्तियों की तुलनात्मक भू-राजनीतिक सूची
| देश / सेना | बेड़े का आकार | प्राथमिक विमान प्लेटफॉर्म | रडार आर्किटेक्चर और तकनीक | कवरेज और रणनीतिक पहुंच |
|---|---|---|---|---|
| भारत (भारतीय वायु सेना) | 6 यूनिट | • 3 एम्ब्रेयर EMB-145I (नेत्रा Mk-1)
• 3 इल्युशिन IL-76 (फाल्कन) | • S-बैंड GaAs AESA
• L-बैंड एक्टिव फेज्ड एरे | • नेत्रा: 240° कवरेज; ~375 किमी रेंज
• फाल्कन: 360° कवरेज; >400 किमी रेंज |
| पाकिस्तान (पाकिस्तानी वायु सेना) | 13 यूनिट | • 9 साब 2000 (इरीआई - Erieye)
• 4 शांक्सी Y-8 (ZDK-03) | • S-बैंड एक्टिव एरे
• चीनी पल्स-डॉप्लर AESA | • साब: 240° कवरेज; ~450 किमी रेंज
• ZDK-03: 360° कवरेज; ~350 किमी रेंज |
| चीन (पीपल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स) | दर्जनों (अनुमानित 30+) | • KJ-200, KJ-500, KJ-2000, और KJ-3000 सीरीज | • मल्टी-फैसेटेड AESA सिस्टम
• उन्नत GaN-आधारित फेज्ड एरे | • स्थानीयकृत उच्च-सहनशीलता प्लेटफॉर्मों के साथ संतुलित 360° रणनीतिक कवरेज। |
तकनीकी रोडमैप: GaN-आधारित नेत्रा Mk-1A और Mk-2 कार्यक्रम
इस संख्यात्मक कमी को व्यवस्थित रूप से दूर करने के लिए, रक्षा मंत्रालय दो अगली पीढ़ी के अनुवर्ती कार्यक्रमों (follow-on programs) पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक बहु-स्तरीय स्वदेशीकरण रोडमैप पर काम कर रहा है। इस तकनीकी विकास का मुख्य केंद्र भविष्य के सभी रडार ट्रांसमिट/रिसीव मॉड्यूल के लिए गैलियम आर्सेनाइड (GaAs) से गैलियम नाइट्राइड (GaN) सेमीकंडक्टर तकनीक पर स्विच करना है। पुराने GaAs सिस्टम की तुलना में GaN-आधारित सिस्टम के महत्वपूर्ण लाभ हैं:
$$\text{Power Density Scale Factor} = \frac{\text{GaN Peak Power Output}}{\text{GaAs Peak Power Output}} \gg 5$$
GaN सेमीकंडक्टर उच्च वोल्टेज और तापमान पर काम कर सकते हैं, काफी ठंडे रहते हैं और मजबूत इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिग्नल उत्पन्न करते हैं। यह रडार ट्रांसमिट पावर और रिसीवर संवेदनशीलता में भारी वृद्धि करता है, जिससे डिटेक्शन रेंज का विस्तार होता है, टारगेट का सटीक रिज़ॉल्यूशन मिलता है, और बेहद कम रडार क्रॉस-सेक्शन वाले छोटे, धीमी गति से चलने वाले ड्रोन, हाइपरसोनिक हथियारों और स्टील्थ विमानों (stealth aircraft) को भी आसानी से ट्रैक किया जा सकता है।
नेत्रा Mk-1A कार्यक्रम
रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने लगभग ₹9,000 करोड़ की अनुमानित लागत से छह नेत्रा Mk-1A प्रणालियों के अधिग्रहण को आगे बढ़ाया है। चूंकि एम्ब्रेयर ने मूल EMB-145 बिजनेस जेट का उत्पादन बंद कर दिया है, इसलिए DRDO वैश्विक वाणिज्यिक बाजार से पुराने (pre-owned) EMB-145 प्लेटफॉर्म खरीद रहा है।
इन विमानों को भारत में CABS द्वारा पूरी तरह से मॉडिफाई किया जाएगा ताकि निम्नलिखित चीजें शामिल की जा सकें:
अपग्रेड किए गए GaN-आधारित S-बैंड AESA रडार एरे, जो लक्ष्य को ट्रैक करने की सीमा को बढ़ाकर लगभग 450 किलोमीटर कर देंगे।
IAF के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड Control सिस्टम (IACCS) के साथ अधिक गहरा सॉफ्टवेयर एकीकरण।
मल्टी-ऑपरेटर टारगेट ट्रैकिंग को अनुकूलित करने के लिए संवर्धित ह्यूमन-मशीन इंटरफेस (HMI)।
बचे हुए लेगेसी आयातित घटकों को बदलने के लिए पूरी तरह स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ESM) और रडार वार्निंग रिसीवर (RWR)।
नेत्रा Mk-2 कार्यक्रम
सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) द्वारा ₹19,000 से ₹20,000 करोड़ की अनुमानित लागत से स्वीकृत अधिक महत्वाकांक्षी नेत्रा Mk-2 कार्यक्रम, भारत की अगली पीढ़ी की भारी (heavy) AEW&C क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है। यह कार्यक्रम एयर इंडिया से खरीदे गए छह पुराने एयरबस ए321 (Airbus A321) यात्री विमानों के एयरफ्रेम का उपयोग करता है। एक बड़े, नैरो-बॉडी एयरलाइनर प्लेटफॉर्म पर स्विच करने से छोटे एम्ब्रेयर जेट की सीमित आंतरिक जगह, पेलोड वजन और बिजली उत्पादन की गंभीर सीमाएं दूर हो जाती हैं।
Mk-2 का प्राथमिक सेंसर स्वदेशी उत्तम (Uttam) AESA रडार का एक उन्नत, बड़े पैमाने का प्रारंभिक चेतावनी व्युत्पन्न (derivative) है, जो एक विस्तारित डोर्सल बैलेंस बीम में लगाया जाएगा। इस एरे में उन्नत GaN तकनीक का उपयोग करते हुए Mk-1 की तुलना में लगभग दोगुने ट्रांसमिट/रिसीव मॉड्यूल होंगे, जिससे इसकी प्राथमिक ट्रैकिंग रेंज 500 किलोमीटर से अधिक हो जाएगी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि Mk-2 विमान के नोज कोन (नाक के हिस्से) के अंदर एक अतिरिक्त, फॉरवर्ड-लुकिंग (आगे देखने वाला) AESA रडार स्थापित करके Mk-1 के सामने के 120-डिग्री के ब्लाइंड स्पॉट को समाप्त करता है, जिससे इसका इलेक्ट्रॉनिक कवरेज बढ़कर लगभग 300-डिग्री एजीमुथ हो जाता है। इसके अतिरिक्त, इस प्लेटफॉर्म में शामिल हैं:
सभी मौसमों में संचालन के लिए एक समर्पित ऑक्सिलरी पावर यूनिट (APU) और विशेष इंजन व विंग एंटी-आइसिंग सिस्टम।
एक समर्पित मिसाइल अप्रोच वार्निंग सिस्टम (MAWS) और पैसिव इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल/इन्फ्रा-रेड (EO/IR) टारगेटिंग सेंसर।
भारत के ग्राउंड-बेस्ड बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) आर्किटेक्चर को सीधे डेटा रिले करने के लिए रीयल-टाइम बैलिस्टिक मिसाइल ट्रैकिंग क्षमताएं।
स्टेशन पर 8 घंटे से अधिक का परिचालन लोइटर टाइम (loiter time)।
आज की प्रतियोगी परीक्षा के समाचार: समेकित त्वरित तथ्य (Quick Facts)
आगामी सिविल सेवा (UPSC) और अन्य राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए, यह दैनिक GK अपडेट नेत्रा कार्यक्रम से जुड़े मुख्य, तथ्यात्मक विवरणों को रेखांकित करता है:
विकासकर्ता नोडल एजेंसी: सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (CABS), जो बेंगलुरु, कर्नाटक में स्थित DRDO की एक विशेष प्रयोगशाला है।
औद्योगिक भागीदारी: मुख्य विनिर्माण और उपप्रणाली एकीकरण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) और निजी क्षेत्र के रक्षा भागीदारों के सहयोग से किया गया।
प्रमुख प्लेटफॉर्म विनिर्देश: नेत्रा Mk-1 को संशोधित ब्राजीलियाई एम्ब्रेयर EMB-145I क्षेत्रीय जेट प्लेटफॉर्म पर एकीकृत किया गया है। इसमें S-बैंड GaAs-आधारित AESA रडार एरे शामिल हैं जो 240-डिग्री कवरेज और 250-375 किमी की डिटेक्शन रेंज प्रदान करते हैं।
परिचालन क्षमताएं: इसमें 5 से 6 घंटे की बिना ईंधन भरे उड़ान क्षमता (flight endurance) है, जिसे इन-फ्लाइट रिफ्यूलिंग (IFR) का उपयोग करके लगभग 9 घंटे तक बढ़ाया जा सकता है।
ऐतिहासिक उत्पत्ति: 1980 के दशक में प्रोजेक्ट गार्जियन के तहत HS-748 एवरो टेस्टबेड का उपयोग करके शुरू हुआ था। 2004 में अपने आधुनिक रूप में पुनर्जीवित होने से पहले, 1999 में यह प्रोजेक्ट क्रैश हो गया था, जिसमें आठ लोगों की जान गई थी।
प्रमुख सक्रिय तैनातियां: फरवरी 2019 के बालाकोट हवाई हमलों और मई 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान महत्वपूर्ण युद्धक्षेत्र प्रबंधन संभाला।
भविष्य की फ्लीट पाइपलाइन: IAF ने दो-मोर्चों पर हवाई निवारण (two-front aerial deterrence) बनाए रखने के लिए न्यूनतम 18 प्लेटफॉर्मों का बेड़ा बनाने के लक्ष्य के साथ, छह GaN-आधारित नेत्रा Mk-1A प्लेटफॉर्म और छह एयरबस A321-आधारित नेत्रा Mk-2 प्लेटफॉर्म की खरीद को मंजूरी दी है।
यह आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
रणनीतिक और तकनीकी पहलुओं के दृष्टिकोण से नेत्रा कार्यक्रम को समझना UPSC के उम्मीदवारों के लिए अत्यधिक मूल्यवान है। यह विषय सामान्य अध्ययन (GS) के पाठ्यक्रम के कई प्रमुख क्षेत्रों से सीधे जुड़ता है:
सामान्य अध्ययन (GS) पेपर III: विज्ञान और प्रौद्योगिकी (प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण)
उम्मीदवारों को यह समझना चाहिए कि नेत्रा कार्यक्रम किस प्रकार महत्वपूर्ण रक्षा उपप्रणालियों के सफल स्थानीयकरण (localisation) का उदाहरण प्रस्तुत करता है। मुख्य परीक्षा (Mains) के संभावित प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं:
GaAs से GaN की ओर बदलाव: गैलियम आर्सेनाइड (GaAs) की तुलना में गैलियम नाइट्राइड (GaN) के तकनीकी लाभों — जिसमें थर्मल दक्षता, बिजली घनत्व और सिग्नल रेंज शामिल हैं — को समझाने के लिए तैयार रहें, और यह भी समझें कि यह बदलाव किस प्रकार कम-RCS वाले स्टील्थ प्लेटफॉर्म और माइक्रो-UAVs को ट्रैक करने में सक्षम बनाता है।
सबसिस्टम आर्किटेक्चर: वैचारिक रूप से यह समीक्षा करें कि पुराने मैकेनिकली स्टीयर्ड रडारों की तुलना में AESA रडार कैसे भिन्न हैं, और कैसे सेकेंडरी सर्विलांस रडार (SSR) 'फ्रेंडली फायर' (अपनों पर ही हमले) को रोकने के लिए मोड 4/5 आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो (IFF) सिस्टम के साथ एकीकृत होते हैं।
सामान्य अध्ययन (GS) पेपर III: आंतरिक सुरक्षा और रक्षा (फोर्स मल्टीप्लायर्स और NCW)
नेत्रा AEW&C प्रणाली आधुनिक सैन्य "फोर्स मल्टीप्लायर" (बल वर्धक) का एक आदर्श उदाहरण है। मुख्य परीक्षा के उत्तरों में निम्नलिखित अवधारणाओं को शामिल किया जाना चाहिए:
नेटवर्क-केंद्रित युद्ध (Network-Centric Warfare - NCW): विश्लेषण करें कि कैसे नेत्रा एक सक्रिय इंटेलिजेंस-फ्यूजिंग नोड के रूप में कार्य करता है, जो सुरक्षित डेटा लिंक के माध्यम से हवाई, जमीनी और नौसैनिक सेंसरों को IAF के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) से जोड़ता है।
दो-मोर्चों पर हवाई रक्षा घाटा (Two-Front Air Defense Deficit): भारत के वर्तमान बेड़े के घाटे (चीन के दर्जनों और पाकिस्तान के 13 विमानों के मुकाबले भारत के पास केवल 6 सक्रिय प्लेटफॉर्म हैं) के रणनीतिक निहितार्थों पर चर्चा करें। यह स्पष्ट करें कि नियंत्रण रेखा (LoC) और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर निरंतर 24 घंटे सीमा निगरानी सुरक्षित करने और इस अंतर को पाटने के लिए नेत्रा Mk-1A और Mk-2 प्लेटफॉर्म की फास्ट-ट्रैक खरीद क्यों अत्यंत महत्वपूर्ण है।