भारत के चरण-II बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा मील के पत्थर का परिचय
10 और 11 जून 2026 को वैश्विक रणनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया, जब रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने अपनी अगली पीढ़ी के रक्षा प्लेटफॉर्मों के लगातार तीन सफल उड़ान परीक्षण किए। इन परीक्षणों ने आने वाले लंबी दूरी के बैलिस्टिक मिसाइल खतरों, जिसमें इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) श्रेणी के खतरे भी शामिल हैं, को रोकने और नष्ट करने की भारत की बहुस्तरीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (BMD) क्षमता का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया। इन उन्नत तकनीकों के सत्यापन (validation) के साथ, भारत परिचालन-स्तर की बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों वाले सैन्य शक्तियों के एक विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है जो ICBM-स्तरीय खतरों से निपटने में सक्षम हैं। ऐतिहासिक रूप से यह समूह संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन और इज़राइल तक ही सीमित रहा है।
ओडिशा के तट पर चांदीपुर में एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) और एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से किए गए इन लगातार परीक्षणों ने पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर (एक्सो-एटमॉस्फेरिक / exo-atmospheric) और भीतर (एंडो-एटमॉस्फेरिक / endo-atmospheric) दोनों जगहों पर दुश्मन के प्रोजेक्टाइल्स (मिसाइलों) को नष्ट करने के लिए डिज़ाइन की गई एक बहुस्तरीय मिसाइल रक्षा वास्तुकला (architecture) का सत्यापन किया। रक्षा मंत्रालय की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, इंटरसेप्टर प्लेटफॉर्मों ने उन्नत बैलिस्टिक मिसाइल प्रोफाइल का अनुकरण (simulate) करने वाले उच्च गति वाले लक्ष्यों को सफलतापूर्वक निशाना बनाया।
रणनीतिक BMD परीक्षणों के साथ-साथ, DRDO ने स्वदेशी नेवल एंटी-शिप मिसाइल-मीडियमレンジ (NASM-MR) का भी सफल पहला उड़ान परीक्षण किया। यह समानांतर उपलब्धि राष्ट्रीय सुरक्षा ग्रिड के आक्रामक (offensive) और रक्षात्मक (defensive) दोनों घटकों को मजबूत करने के समन्वित प्रयास को रेखांकित करती है। जैसा कि 'अथर्व एक्जामवाइज़' दैनिक जीके अपडेट में शामिल किया गया है, ये विकास आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत तकनीकी आत्मनिर्भरता की भारत की खोज में एक महत्वपूर्ण कदम हैं, जो भारत-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में क्षेत्रीय निवारण गतिशीलता (deterrence dynamics) को मौलिक रूप से बदल रहे हैं।
भारतीय बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का विकास
भारतीय BMD कार्यक्रम की शुरुआत 1999 के कारगिल युद्ध के बाद की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय विरोधियों की बढ़ती मिसाइल क्षमताओं से रणनीतिक शहरी केंद्रों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रक्षा करना था। लगभग तीन दशकों में, DRDO ने अलग-अलग ऊंचाइयों और श्रेणियों पर आने वाले लक्ष्यों को रोकने के लिए डिज़ाइन की गई एक दोहरे स्तर (double-tiered) की रक्षात्मक ढाल विकसित और परिष्कृत की है। इस कार्यक्रम की प्रगति को दो परिचालन चरणों में विभाजित किया गया है।
| मापदंड (Parameter) | चरण-I (Phase-I) BMD वास्तुकला | चरण-II (Phase-II) BMD वास्तुकला |
|---|---|---|
| विकासात्मक समयरेखा | 1999 में शुरू हुआ; विकासात्मक परीक्षण अप्रैल 2019 में पूरे हुए। | 2010 के दशक में परिकल्पना की गई; अंतिम विकासात्मक परीक्षण जून 2026 में पूरे हुए। |
| खतरे से निपटने की रेंज | 2,000 किमी तक की कम और मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का मुकाबला करने के लिए डिज़ाइन किया गया। | 5,000+ किमी तक की मध्यवर्ती दूरी (IRBMs) और सीमित ICBM-श्रेणी के खतरों का मुकाबला करने के लिए डिज़ाइन किया गया। |
| प्राथमिक इंटरसेप्टर | पृथ्वी एयर डिफेंस (PAD) / पृथ्वी डिफेंस व्हीकल (PDV) और एडवांस्ड एयर डिफेंस (AAD)। | एडी-1 (AD-1) और एडी-2 (AD-2) इंटरसेप्टर मिसाइलें। |
| परिचालन ऊंचाई | एक्सो-एटमॉस्फेरिक: 50–100 किमी; एंडो-एटमॉस्फेरिक: 15–30 किमी। | एंडो- और कम एक्सो-एटमॉस्फेरिक (AD-1) से लेकर उच्च एक्सो-एटमॉस्फेरिक (AD-2) तक। |
| लक्ष्य भेदने की गति | मैक 5 (Mach 5) तक। | मैक 6.5 (Mach 6.5) से अधिक। |
| तैनाती की स्थिति | नई दिल्ली और मुंबई जैसे रणनीतिक केंद्रों के आसपास सीमित परिचालन तैनाती। | 2026 तक सीमित क्रमिक उत्पादन (serial production) और प्रारंभिक तैनाती योजना में संक्रमण। |
चरण-II इंटरसेप्टर्स और सेंसर के तकनीकी विनिर्देश
चरण-II BMD वास्तुकला दो नए डिज़ाइन किए गए उच्च गति वाले इंटरसेप्टर प्लेटफॉर्म, AD-1 और AD-2 पर निर्भर करती है, जो एक संवेदनशील, नेटवर्क-केंद्रित प्रणाली बनाने के लिए उन्नत ट्रैकिंग रडार और कमांड नेटवर्क के साथ मिलकर काम करते हैं।
AD-1 इंटरसेप्टर मिसाइल
एडी-1 एक लंबी दूरी की, दो चरणों वाली सॉलिड-प्रोपेलेंट (ठोस ईंधन आधारित) इंटरसेप्टर मिसाइल है जिसे एक बड़े किल एल्टीट्यूड ब्रैकेट (नष्ट करने वाली ऊंचाई सीमा) में काम करने के लिए इंजीनियर किया गया है। इसे कम एक्सो-एटमॉस्फेरिक और एंडो-एटमॉस्फेरिक दोनों तरह के इंटरसेप्शन के लिए डिज़ाइन किया गया है। स्वदेशी रूप से विकसित नेविगेशन, मार्गदर्शन एल्गोरिदम और एक उन्नत नियंत्रण प्रणाली द्वारा संचालित, एडी-1 लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ-साथ हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली (AWACS) सहित उच्च ऊंचाई वाले विमानों को नष्ट करने में सक्षम है।
AD-2 इंटरसेप्टर मिसाइल
एडी-2 को उच्च एक्सो-एटमॉस्फेरिक इंटरसेप्शन के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह प्लेटफॉर्म बाहरी अंतरिक्ष में हाइपरसोनिक गति से यात्रा करने वाली मध्यवर्ती दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों (IRBMs) और चुनिंदा ICBM-श्रेणी के खतरों को पृथ्वी के निचले वायुमंडल में उनके पुन: प्रवेश (re-entry phase) से पहले ही नष्ट करने के लिए अनुकूलित है।
भारत के एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल प्लेटफॉर्मों के भौतिक और परिचालन मापदंडों की तुलना नीचे दी गई तालिका में की गई है:
| इंटरसेप्टर प्लेटफॉर्म | परिचालन चरण | प्रणोदन प्रणाली | अधिकतम गति (Mach) | अधिकतम लक्ष्य रेंज (किमी) | इंटरसेप्शन ऊंचाई (किमी) | मार्गदर्शन और टर्मिनल सीकर | लक्ष्य श्रेणी (Target Class) |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| PAD (प्रद्युम्न) | चरण-I (Exo) | दो चरण: तरल (प्रथम), ठोस (द्वितीय) | मैक 5 | 300–2,000 | 50–80 | INS + ग्राउंड अपडेट + एक्टिव रडार होमिंग | MRBM और IRBM |
| AAD (अश्विन) | चरण-I (Endo) | एकल चरण: ठोस प्रणोदक | मैक 4.5 | 150–200 | 15–30 | INS + ग्राउंड अपडेट + एक्टिव रडार होमिंग | MRBM |
| PDV | संक्रमण (Exo) | दो चरण: ठोस रॉकेट मोटर | उच्च सुपरसोनिक | 2,000+ | 50–180 | रिंग लेजर गाइरो (RLG) INS + IIR टर्मिनल होमिंग | MRBM और IRBM |
| PDV Mk2 | एंटी-सैटेलाइट (ASAT) | दो चरण ठोस + काइनेटिक किल व्हीकल | मैक 8–10 | 5,000+ | >1,200 | उच्च-सटीकता INS + काइनेटिक इंटरसेप्शन | लो-अर्थ सैटेलाइट्स |
| AD-1 | चरण-II (Endo/Low-Exo) | दो चरण ठोस रॉकेट मोटर | मैक 6.5 | 1,000–3,000 | लो-एक्सो और एंडो | उन्नत नियंत्रण प्रणाली + काइनेटिक हिट-टू-किल | MRBM, IRBM, और AWACS |
| AD-2 | चरण-II (High-Exo) | दो चरण ठोस रॉकेट मोटर | > मैक 6.5 | 3,000–5,500 | उच्च एक्सो-एटमॉस्फेरिक | उन्नत मार्गदर्शन + काइनेटिक हिट-टू-किल | IRBM और ICBM |
रडार और सेंसर वास्तुकला
भारत की BMD प्रणाली की ट्रैकिंग क्षमताएं स्वॉर्डफिश लॉन्ग-रेंज ट्रैकिंग रडार (LRTR) पर निर्भर करती हैं, जो इजरायली ग्रीन पाइन (Green Pine) तकनीक से विकसित एक एक्टिव फेज़्ड एरे रडार है। यह एक्टिव फेज़्ड एरे सिस्टम 1,500 किमी तक की विस्तारित रेंज में एक साथ 200 लक्ष्यों को खोजने और ट्रैक करने में सक्षम है। चरण-II परीक्षणों के दौरान, DRDO ने भूमि आधारित ट्रैकिंग रडार के साथ समुद्र आधारित सेंसरों को भी एकीकृत किया, जिससे भारत-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री मार्गों पर स्थितिजन्य जागरूकता (situational awareness) का विस्तार हुआ। रीयल-टाइम टेलीमेट्री डेटा को मिशन कंट्रोल सेंटर (MCC) द्वारा संसाधित किया जाता है, जो सेंसर, लॉन्च प्लेटफॉर्म और इंटरसेप्टर को जोड़ने के लिए कम-विलंबता (low-latency) संचार नेटवर्क का उपयोग करता है।
राष्ट्रीय एकीकरण: सुदर्शन चक्र वायु रक्षा कवच
चरण-II BMD इंटरसेप्टर्स का सत्यापन भारत की व्यापक हवाई रक्षा पहल का एक प्रमुख घटक है, जिसे मिशन सुदर्शन चक्र (Mission Sudarshan Chakra) के रूप में जाना जाता है। इस पहल का उद्देश्य 2035 तक एक एकीकृत, बहुस्तरीय वायु और मिसाइल रक्षा कवच स्थापित करना है। यह वास्तुकला सामरिक रूप से बहुत कम दूरी के हथियारों को रणनीतिक लंबी दूरी की प्रणालियों के साथ जोड़ती है, जिससे भारतीय हवाई क्षेत्र की ड्रोन, लड़ाकू विमानों, क्रूज मिसाइलों और बैलिस्टिक वॉरहेड्स से रक्षा की जा सके।
यह राष्ट्रीय सुरक्षा ग्रिड कई प्रमुख रक्षात्मक नेटवर्कों को एकीकृत करता है, जिनका विवरण नियमित रूप से 'अथर्व एक्जामवाइज़' प्रतियोगी परीक्षा समाचारों में विश्लेषित किया जाता है:
रणनीतिक बाहरी ढाल (Strategic Outer Shield - BMD चरण-I और II): यह 30 किमी से लेकर 180 किमी से अधिक की ऊंचाई पर आने वाले मध्यम, मध्यवर्ती और अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक खतरों को निशाना बनाती है।
लंबी दूरी की क्षेत्रीय रक्षा (Long-Range Area Defence - S-400 ट्रिम्फ और प्रोजेक्ट कुशा): यह 150 किमी से 400 किमी के बीच की दूरी पर उच्च प्रदर्शन वाले विमानों, स्टील्थ प्लेटफॉर्मों और क्रूज मिसाइलों के खिलाफ क्षेत्रीय रक्षा प्रदान करता है।
मध्यम से कम दूरी की सुरक्षा (Medium-to-Short Range Shielding): इसमें महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों और कमांड हब की सुरक्षा के लिए स्वदेशी आकाश (Akash) सैम प्रणाली (45 किमी रेंज) और भारत-इजरायल बराक-8 (Barak-8) एमआरएसएएम (70–100 किमी रेंज) शामिल हैं।
पॉइंट डिफेंस और टर्मिनल लेयर (Point Defence & Terminal Layer): यह कम ऊंचाई वाली क्रूज मिसाइलों, सटीक हथियारों और ड्रोन झुंडों (drone swarms) को बेअसर करने के लिए QRSAM, SPYDER, और VSHORAD प्लेटफॉर्मों को निर्देशित-ऊर्जा हथियारों (DEWs) के साथ जोड़ता है।
यह समझने के लिए कि भारत आयातित प्लेटफॉर्मों के साथ घरेलू विकासात्मक कार्यक्रमों को कैसे संतुलित करता है, नीचे दी गई तालिका रूस से खरीदे गए S-400 ट्रिम्फ की तुलना DRDO के आगामी प्रोजेक्ट कुशा (Project Kusha) से करती है:
| मापदंड (Parameter) | S-400 ट्रिम्फ (भारतीय सेवा में सुदर्शन) | प्रोजेक्ट कुशा (Extended Range Air Defence System - ERADS) |
|---|---|---|
| मूल देश | रूस | भारत (DRDO और BEL द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित) |
| प्राथमिक प्रणाली भूमिका | लंबी दूरी की क्षेत्रीय वायु रक्षा प्रणाली | स्वदेशी लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल (SAM) |
| रडार तकनीक | एक्टिव फेज़्ड एरे रडार | गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित मल्टी-फंक्शन रडार (MFR) |
| ट्रैकिंग क्षमता | एक साथ 300 लक्ष्यों तक | एक साथ 200 लक्ष्यों तक (2m² RCS के लिए 600 किमी रेंज) |
| मशगुली क्षमता (Engagement) | एक साथ 36 लक्ष्यों तक का मुकाबला कर सकता है | उड़ान में 24 इंटरसेप्टर मिसाइलों तक का मार्गदर्शन कर सकता है |
| इंटरसेप्टर वेरिएंट | बहुस्तरीय मिसाइलें: 9M96E (40 किमी), 9M96E2 (120 किमी), 48N6DM (250 किमी), 40N6 (400 किमी) | तीन वेरिएंट: M1 (120–150 किमी), M2 (250 किमी), M3 (350–400 किमी) |
| लक्ष्य प्रोफ़ाइल | लड़ाकू विमान, स्टील्थ प्लेटफॉर्म, यूएवी (UAVs), क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलें | स्टील्थ विमान, क्रूज मिसाइलें, ड्रोन, हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन |
| परिचालन समयरेखा | 2026 तक खरीदे गए पांच स्क्वाड्रनों में से तीन सक्रिय हैं | 2026 में पहला निर्देशित परीक्षण; 2028 से 2030 तक नियोजित प्रेरण (induction) |
इन प्रणालियों के परिचालन समन्वय को "ऑपरेशन सिंदूर" (Operation Sindoor) के दौरान प्रदर्शित किया गया था—जो पहलगाम में एक आतंकवादी हमले के बाद 2025 में शुरू किया गया एक त्रि-सेवा (tri-services) सैन्य अभियान था। अभियान के दौरान, लंबी दूरी के हवाई रक्षा नेटवर्कों ने दुश्मन के ड्रोन और रॉकेट हमलों को सफलतापूर्वक रोका, जिससे इंटीग्रेटेड Air Command and Control System (IACCS) के माध्यम से रीयल-टाइम डेटा संलयन (data fusion) की उपयोगिता साबित हुई।
समुद्री युद्ध में सामरिक प्रगति: NASM-MR
रणनीतिक BMD परीक्षणों के साथ ही, DRDO ने 10 जून 2026 को नेवल एंटी-शिप मिसाइल-मीडियम रेंज (NASM-MR) का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया। यह सबसोनिक, सी-स्किमिंग (समुद्र की सतह के बिल्कुल करीब उड़ने वाली) एंटी-शिप मिसाइल है जिसे भारतीय नौसेना द्वारा फ्रिगेट, कोरवेट और डिस्ट्रॉयर जैसे सतह के युद्धपोतों के खिलाफ उपयोग के लिए डिज़ाइन किया गया है।
मिसाइल में कई प्रमुख तकनीकी घटक शामिल हैं:
स्ट्राइक रेंज और प्रोफाइल: यह लगभग 300 किमी की मारक क्षमता के साथ काम करती है। दुश्मन के रडार होराइजंस (क्षितिज) से नीचे रहने के लिए यह कम ऊंचाई वाली, सी-स्किमिंग उड़ान प्रोफाइल बनाए रखती है।
मार्गदर्शन प्रणालियाँ: यह मध्य-मार्ग उड़ान के लिए जीपीएस अपडेट और उच्च-सटीकता वाले रडार अल्टीमीटर के साथ एकीकृत जड़त्वीय नेविगेशन प्रणाली (INS) का उपयोग करती है।
टर्मिनल सीकर: इसमें एक सक्रिय एक्स-बैंड (X-band) एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) टर्मिनल सीकर है। यह कम दूरी की NASM-SR की तुलना में एक बड़ा अपग्रेड है, जो इमेजिंग इन्फ्रारेड (IIR) टर्मिनल सीकर का उपयोग करती है।
प्रणोदन और पेलोड: यह टू-वे डेटा लिंक और एक पेनेट्रेशन-कम-ब्लास्ट (भेदन और विस्फोट) वॉरहेड से लैस है। हालांकि शुरुआती उड़ान परीक्षणों में सफरान (Safran) निर्मित टर्बोजेट इंजन का उपयोग किया गया है, लेकिन श्रृंखला-उत्पादन (series-production) मॉडल को DRDO के स्वदेशी एक्टिव टर्बाइन गैस जेनरेटर (ATGG) टर्बोफैन इंजन का उपयोग करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
लॉन्च प्लेटफॉर्म: इसे मुख्य रूप से मिग-29के (MiG-29K) जैसे नौसेना के लड़ाकू विमानों के साथ एकीकृत एक एयर-टू-शिप (हवा से जहाज पर मार करने वाले) हथियार के रूप में डिज़ाइन किया गया है, जो चार NASM-MR मिसाइलें ले जा सकता है।
+--------------------------------------------------------------------------+ | NASM-MR उड़ान प्रक्षेपवक्र (Trajectory) | | | | [हवाई लॉन्च: MiG-29K] | | │ | | ▼ (मध्य-मार्ग: INS + GPS + रडार अल्टीमीटर सी-स्किमिंग) | | ~~~~~~⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓⎓~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ | | (टर्मिनल: एक्स-बैंड AESA सीकर) | | ▼ | | [Hostile Combatant] | +--------------------------------------------------------------------------+
भारत-प्रशांत क्षेत्र में भू-राजनीतिक और रणनीतिक निहितार्थ
भारत की चरण-II BMD प्रणाली का विकास और राष्ट्रीय रक्षा ग्रिड में इसका एकीकरण कई व्यापक भू-राजनीतिक और रणनीतिक निहितार्थ रखता है:
क्षेत्रीय निवारण गतिशीलता को बदलना
लंबी दूरी की, उच्च-वेग वाली मिसाइलों को रोकने में सक्षम एक सत्यापित रक्षात्मक कवच की शुरूआत दक्षिण एशिया में निवारण (deterrence) के समीकरणों को बदल देती है। भारत के "नो फर्स्ट यूज़" (NFU - पहले उपयोग नहीं) परमाणु सिद्धांत के अनुरूप, एक मजबूत BMD क्षमता संभावित पूर्व-खाली काउंटर-फोर्स हमलों (pre-emptive counter-force strikes) के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करती है, जिससे देश की जवाबी दूसरी-स्ट्राइक (second-strike) क्षमता सुरक्षित रहती है। यह परमाणु ब्लैकमेल के जोखिम को कम करता है और रणनीतिक स्थिरता की सीमा को बढ़ाता है।
उन्नत मिसाइल शस्त्रागार का मुकाबला करना
चरण-II BMD परीक्षणों को जटिल क्षेत्रीय खतरे के प्रोफाइल को संबोधित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसमें पाकिस्तान की MIRV-सज्जित अबाबील (Ababeel) मिसाइल प्रणाली और चीन की बढ़ती मध्यवर्ती दूरी की सूची, जैसे कि DF-26B एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइल शामिल हैं।
चरण-III इंटरसेप्टर (AD-AH और AD-AM) विकसित करके, DRDO हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहनों (HGVs) और पैंतरेबाज़ी करने वाले री-एंट्री वॉरहेड्स (maneuvering re-entry warheads) जैसे अगली पीढ़ी के खतरों से निपटने की तैयारी कर रहा है।
┌────────────────────────────────────────┐ │ क्षेत्रीय खतरा स्पेक्ट्रम │ └───────────────────┬────────────────────┘ │ ┌────────────────────────┴────────────────────────┐ ▼ ▼ ┌─────────────────────────┐ ┌─────────────────────────┐ │ पाकिस्तानी शस्त्रागार │ │ चीनी शस्त्रागार │ ├─────────────────────────┤ ├─────────────────────────┤ │ • अबाबील (MIRV तकनीक) │ │ • DF-26B (एंटी-शिप BM) │ │ │ │ │ │ • सामरिक लघु-दूरी की │ │ • DF-41 (ICBM श्रेणी) │ │ प्रणालियां │ │ │ └─────────────────────────┘ └─────────────────────────┘
समुद्री क्षेत्र सुरक्षा का विस्तार
BMD वास्तुकला में समुद्र-आधारित सेंसरों को एकीकृत करने से समग्र उत्तरजीविता (survivability) और रडार कवरेज बढ़ता है। मोबाइल नौसैनिक ट्रैकिंग संपत्तियों का उपयोग करके, भारत हिंद महासागर में महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स तक अपने शुरुआती-चेतावनी रडार क्षितिज का विस्तार कर सकता है, जिससे पूर्व-खाली लक्ष्यों के प्रति स्थिर भूमि-आधारित रडार स्टेशनों की संवेदनशीलता कम हो जाती है। यह समुद्री क्षमता अन्य रणनीतिक पहलों के साथ संरेखित है, जैसे कि भारत की तीसरी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी, INS अरिदमन (INS Aridaman) का शामिल होना।
तकनीकी स्वायत्तता और रणनीतिक गठबंधनों को बढ़ावा देना
घरेलू स्तर पर प्रमुख तकनीकों का विकास करना—जिसमें GaN-आधारित रडार, डुअल-पल्स सॉलिड मोटर्स और सीकर सिस्टम शामिल हैं—भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करता है। आयात निर्भरता को कम करने से भारत को संतुलित अंतरराष्ट्रीय सहयोग आगे बढ़ाने की अनुमति मिलती है, जैसे कि इजरायल के साथ तकनीकी साझेदारी और क्वाड (QUAD) ढांचे के तहत संयुक्त अभ्यास, जबकि एक मजबूत घरेलू औद्योगिक रक्षा आधार भी बना रहता है।
आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है
यूपीएससी सिविल सेवा (UPSC Civil Services) और अन्य राज्य स्तरीय प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी करने वाले उम्मीदवारों के लिए, यह विकास सामान्य अध्ययन (GS) पेपर 3 (विज्ञान और प्रौद्योगिकी, प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण और आंतरिक सुरक्षा) के तहत पाठ्यक्रम के कई क्षेत्रों के लिए अत्यधिक प्रासंगिक है।
उम्मीदवारों को 'अथर्व एक्जामवाइज़' करंट न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से इन घटनाक्रमों पर नज़र रखने की सलाह दी जाती है, जो पंचायत उन्नति सूचकांक 2025 (Panchayat Unnati Index 2025) और वेनेजुएला के रणनीतिक ऊर्जा खरीद जैसे अन्य प्रमुख प्रशासनिक विषयों के साथ-साथ रणनीतिक रक्षा मुद्दों का विस्तृत कवरेज प्रदान करता है।
संभावित मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
"भारत के स्वदेशी चरण-II बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा (BMD) कार्यक्रम के रणनीतिक महत्व का परीक्षण कीजिए। प्रोजेक्ट कुशा जैसी क्षेत्रीय हवाई रक्षा प्रणालियों द्वारा पूरक एक बहुस्तरीय एयरोस्पेस सुरक्षा कवच का विकास, विश्वसनीय न्यूनतम निवारण (credible minimum deterrence) के भारत के सिद्धांत को कैसे मजबूत करता है?" (250 शब्द | 15 अंक)
प्रारंभिक परीक्षा के मुख्य बिंदु (Key Prelims Pointers)
एलीट क्लब का दर्जा: चरण-II BMD का सफल सत्यापन भारत को ICBM श्रेणी तक की लंबी दूरी की, उच्च गति वाली बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने की प्रदर्शित क्षमताओं वाला दुनिया का पांचवां देश बनाता है, जो यूएसए, रूस, इजरायल और चीन के साथ शामिल हो गया है।
वायुमंडलीय क्षेत्र: एंडो-एटमॉस्फेरिक (Endo-atmospheric) इंटरसेप्शन पृथ्वी के वायुमंडल के भीतर (100 किमी से नीचे की ऊंचाई) होते हैं, जबकि एक्सो-एटमॉस्फेरिक (exo-atmospheric) इंटरसेप्शन बाहरी अंतरिक्ष (100 किमी से ऊपर) में होते हैं।
AD-1 बनाम AD-2 इंटरसेप्टर: एडी-1 MRBM और IRBM लक्ष्यों को भेदने के लिए एंडो-एटमॉस्फेरिक और कम एक्सो-एटमॉस्फेरिक क्षेत्रों में काम करता है। एडी-2 को IRBM और ICBM को लक्षित करने वाले उच्च एक्सो-एटमॉस्फेरिक इंटरसेप्शन के लिए डिज़ाइन किया गया है।
चरण-III इंटरसेप्टर: हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहनों (HGVs) और MIRV पेलोड का मुकाबला करने के लिए अगली पीढ़ी की AD-AH और AD-AM interceptor मिसाइलें वर्तमान में विकासाधीन हैं।
NASM-MR की विशेषताएं: DRDO द्वारा विकसित 300 किमी की रेंज वाली एक सबसोनिक, सी-स्किमिंग एंटी-शिप मिसाइल। यह रडार अल्टीमीटर के साथ मध्य-मार्ग INS/GPS मार्गदर्शन और एक्स-बैंड AESA RF सीकर के माध्यम से टर्मिनल मार्गदर्शन का उपयोग करती है।
एकीकरण ढांचा: BMD प्रणाली "मिशन सुदर्शन चक्र" के तहत काम करती है और सेना, नौसेना और वायु सेना में संयुक्त अभियानों को समन्वित करने के लिए इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) के माध्यम से जुड़ी हुई है।