UPSC Current Affairs May 2026: अनुच्छेद 324(2) और मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति अधिनियम 2023 का व्यापक विश्लेषण – Atharva Examwise Daily GK Update

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भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के सुचारू संचालन के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव एक अनिवार्य शर्त है। मई 2026 के वर्तमान परिदृश्य में, भारत का सर्वोच्च न्यायालय एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहा है जो सीधे तौर पर हमारे लोकतंत्र की नींव यानी भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की संस्थागत स्वायत्तता से जुड़ा है । 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023' की संवैधानिक वैधता को दी गई चुनौती न केवल कानूनी बल्कि एक गहरा राजनीतिक और संवैधानिक मुद्दा बन गई है । संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के गंभीर अभ्यर्थियों के लिए, अनुच्छेद 324, सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों और निर्वाचन सुधारों की लंबी यात्रा को समझना अत्यंत आवश्यक है। यह रिपोर्ट इस विषय के हर सूक्ष्म पहलू का विश्लेषण करती है, जिसमें संवैधानिक प्रावधानों से लेकर समकालीन न्यायिक टिप्पणियों तक सब कुछ शामिल है।

निर्वाचन आयोग की संवैधानिक संरचना और अनुच्छेद 324 की गहराई

भारतीय संविधान का भाग XV (अनुच्छेद 324-329) निर्वाचन प्रणाली का खाका तैयार करता है । अनुच्छेद 324 वह धुरी है जिस पर संपूर्ण चुनावी मशीनरी टिकी हुई है। यह अनुच्छेद न केवल आयोग की स्थापना करता है, बल्कि इसे चुनावों के "अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण" की व्यापक शक्तियां भी प्रदान करता है ।

अनुच्छेद 324 के विभिन्न खंडों का विस्तृत विवरण

अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग की शक्तियां और संरचना विभाजित हैं, जिन्हें समझना अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है:

खंडविवरणमहत्व
324(1)संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार करने और संचालन का अधिकार ।यह खंड आयोग को एक स्वतंत्र और सर्वशक्तिमान निकाय बनाता है ।
324(2)आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित संख्या में अन्य चुनाव आयुक्त (ECs) होंगे ।नियुक्ति प्रक्रिया संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन होगी ।
324(3)जब अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किए जाते हैं, तो CEC आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।यह आयोग के भीतर पदानुक्रम और नेतृत्व को स्पष्ट करता है ।
324(4)राष्ट्रपति आयोग की सहायता के लिए क्षेत्रीय आयुक्तों की नियुक्ति कर सकते हैं ।यह बड़े चुनावों के दौरान प्रशासनिक विस्तार की सुविधा प्रदान करता है ।
324(5)सेवा की शर्तें और कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किए जाएंगे, लेकिन CEC को केवल उसी प्रक्रिया से हटाया जा सकता है जैसे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को ।यह सुरक्षा आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए दी गई है ।

संविधान निर्माताओं ने जानबूझकर अनुच्छेद 324(2) में यह प्रावधान रखा था कि नियुक्तियां संसद द्वारा बनाए गए कानून के "अधीन" होंगी । हालांकि, विडंबना यह रही कि सात दशकों से अधिक समय तक संसद ने ऐसा कोई कानून नहीं बनाया, जिससे नियुक्तियों का पूर्ण अधिकार केंद्र सरकार (कार्यपालिका) के पास बना रहा । मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इसी विलंब को "निर्वाचितों की निरंकुशता" (tyranny of the elected) के रूप में व्याख्यायित किया है ।

निर्वाचन आयोग का विकास: एक सदस्यीय निकाय से बहु-सदस्यीय संस्था तक

1950 में स्थापना के समय से लेकर आज तक, निर्वाचन आयोग ने कई संगठनात्मक परिवर्तन देखे हैं। अभ्यर्थियों को इस विकासक्रम की जानकारी होनी चाहिए क्योंकि यह अक्सर 'Static GK' के रूप में पूछा जाता है।

ऐतिहासिक विकास यात्रा

1950 से 1989 तक, निर्वाचन आयोग केवल एक सदस्यीय निकाय था, जिसमें केवल मुख्य चुनाव आयुक्त होते थे । 16 अक्टूबर 1989 को, राष्ट्रपति ने पहली बार दो अतिरिक्त चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की, जिससे यह एक बहु-सदस्यीय निकाय बन गया । हालांकि, यह परिवर्तन अल्पकालिक था और 1 जनवरी 1990 को इन पदों को समाप्त कर दिया गया । अंततः, 1 अक्टूबर 1993 को निर्वाचन आयोग को स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय निकाय बना दिया गया, जो आज भी जारी है ।

1991 का अधिनियम और प्रोटोकॉल की स्थिति

'निर्वाचन आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और कार्य का संचालन) अधिनियम, 1991' ने यह सुनिश्चित किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का वेतन और दर्जा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान होगा 。 यह दर्जा केवल वित्तीय लाभ के लिए नहीं था, बल्कि यह आयोग को उन शक्तिशाली राजनीतिक हस्तियों और कैबिनेट मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई करने की नैतिक और कानूनी शक्ति प्रदान करता था जो चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करते हैं 。

अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023): एक न्यायिक मील का पत्थर

2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में एक युगांतरकारी निर्णय सुनाया । यह निर्णय उन याचिकाओं पर आधारित था जिनमें तर्क दिया गया था कि कार्यपालिका द्वारा चुनाव आयुक्तों की एकपक्षीय नियुक्ति लोकतंत्र के लिए हानिकारक है ।

न्यायालय के प्रमुख तर्क और निर्देश

अदालत ने कहा कि एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग के बिना "स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव" असंभव हैं । कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कार्यपालिका द्वारा की जाने वाली नियुक्तियों में राजनीतिक झुकाव होने की संभावना रहती है, जो आयोग की तटस्थता को प्रभावित कर सकती है ।

इस "विधायी शून्य" (legislative vacuum) को भरने के लिए, कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए एक अंतरिम चयन समिति का गठन किया, जिसमें शामिल थे:

भारत के प्रधानमंत्री

लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता)

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ।

कोर्ट का स्पष्ट उद्देश्य नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका के प्रतिनिधित्व के माध्यम से "तटस्थता" सुनिश्चित करना था 。

मुख्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023: संरचना और प्रावधान

अनूप बरनवाल निर्णय के जवाब में, केंद्र सरकार ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023' पेश किया । यह कानून दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित किया गया और इसने 1991 के अधिनियम को प्रतिस्थापित कर दिया 。

चयन की द्वि-स्तरीय प्रक्रिया

नए अधिनियम के तहत नियुक्ति प्रक्रिया को दो समितियों में विभाजित किया गया है:

1. खोज समिति (Search Committee)

इस समिति का नेतृत्व केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री करते हैं । इसमें केंद्र सरकार के सचिव स्तर के दो अन्य सदस्य शामिल होते हैं । इस समिति का कार्य उपयुक्त उम्मीदवारों का एक पैनल (5 नाम) तैयार करना है ।

2. चयन समिति (Selection Committee)

यह वास्तविक शक्ति केंद्र है, जो राष्ट्रपति को नियुक्ति की सिफारिश करती है। इसकी संरचना इस प्रकार है:

अध्यक्ष: प्रधानमंत्री ।

सदस्य: प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री ।

सदस्य: लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता ।

योग्यता, वेतन और कार्यकाल का विश्लेषण

मानदंड2023 अधिनियम के प्रावधान
योग्यताव्यक्ति भारत सरकार के सचिव के पद पर होना चाहिए या रह चुका हो; ईमानदारी और चुनाव प्रबंधन में अनुभव अनिवार्य है ।
कार्यकाल6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो ।
पुनर्नियुक्तिसदस्य पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं हैं; यदि कोई EC, मुख्य चुनाव आयुक्त बनता है, तो कुल कार्यकाल 6 वर्ष से अधिक नहीं होगा ।
वेतन और दर्जाअब वेतन और सेवा शर्तें कैबिनेट सचिव के समान होंगी (1991 अधिनियम में यह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान था) ।

मई 2026 का कानूनी विवाद: मुख्य चिंताएं क्या हैं?

मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चल रही सुनवाई में याचिकाकर्ताओं (जैसे एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स - ADR) ने इस अधिनियम के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई है ।

1. चयन समिति में कार्यपालिका का प्रभुत्व

अधिनियम में चयन समिति में 2:1 का बहुमत सरकार के पक्ष में है (प्रधानमंत्री + कैबिनेट मंत्री बनाम विपक्ष के नेता) । जस्टिस दीपांकर दत्ता ने सुनवाई के दौरान पूछा कि जब कार्यपालिका के पास ही बहुमत है, तो क्या विपक्ष के नेता की भूमिका केवल "सजावटी" (ornamental) नहीं रह गई है? । कोर्ट का तर्क है कि आयोग को न केवल स्वतंत्र होना चाहिए बल्कि स्वतंत्र "दिखना" भी चाहिए ।

2. मुख्य न्यायाधीश (CJI) का निष्कासन

विवाद का सबसे बड़ा बिंदु चयन समिति से CJI को हटाना और उनकी जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल करना है 。 याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह सुप्रीम कोर्ट के अनूप बरनवाल फैसले की भावना के विपरीत है, जिसने निष्पक्षता के लिए एक न्यायिक सदस्य की आवश्यकता पर जोर दिया था । सरकार का तर्क है कि संसद को अपनी विधायी शक्तियों के तहत अपनी पसंद का तंत्र बनाने का अधिकार है और न्यायपालिका इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती ।

3. प्रोटोकॉल और स्वायत्तता का ह्रास

चुनाव आयुक्तों के वेतन और दर्जे को कैबिनेट सचिव के बराबर करना एक "डाउनग्रेड" माना जा रहा है 。 चूँकि कैबिनेट सचिव सरकार के अधीन एक प्रशासनिक अधिकारी होता है, आलोचकों का डर है कि इससे निर्वाचन आयोग की स्थिति एक संवैधानिक संस्था से घटकर एक सरकारी विभाग जैसी हो सकती है 。 यह आयोग को उन मंत्रियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से रोक सकता है जो पदानुक्रम में उनसे ऊपर हैं ।

4. धारा 8 और उम्मीदवारों का मनमाना चयन

अधिनियम की धारा 8 चयन समिति को यह शक्ति देती है कि वह खोज समिति द्वारा सुझाए गए नामों के अलावा भी किसी व्यक्ति के नाम पर विचार कर सकती है 。 याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता खत्म हो जाती है और सरकार अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को पिछले दरवाजे से ला सकती है ।

चुनावी सुधारों पर विभिन्न समितियों की सिफारिशें

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए, विभिन्न समितियों की सिफारिशों की तुलना करना बहुत महत्वपूर्ण है। इनमें से अधिकांश ने कार्यपालिका के प्रभुत्व को कम करने की वकालत की है 。

समिति / आयोगवर्षचयन समिति की सिफारिश
तारकुंडे समिति1975प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश ।
दिनेश गोस्वामी समिति1990प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश (संवैधानिक दर्जा सहित) ।
NCRWC (वेंकटचलैया आयोग)2002प्रधानमंत्री, दोनों सदनों के विपक्ष के नेता, लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति ।
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC)2007प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष के नेता, कानून मंत्री और राज्यसभा के उपसभापति ।
विधि आयोग (255वीं रिपोर्ट)2015प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश ।

इन ऐतिहासिक सिफारिशों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि 2023 का अधिनियम एक महत्वपूर्ण विचलन है, क्योंकि इसने पहली बार चयन पैनल में कार्यपालिका का स्पष्ट बहुमत सुनिश्चित किया है ।

'चौथे स्तंभ' की संस्था के रूप में निर्वाचन आयोग का महत्व

आधुनिक संवैधानिक न्यायशास्त्र में, निर्वाचन आयोग को "चौथे स्तंभ की संस्था" (Fourth Branch Institution) के रूप में देखा जाता है 。 ये वे संस्थाएं हैं जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के पारंपरिक विभाजन से स्वतंत्र रहकर लोकतंत्र की रक्षा करती हैं ।

संस्थागत सुरक्षा के अन्य उदाहरण

संविधान के तहत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और निर्वाचन आयोग (ECI) ऐसी दो प्रमुख संस्थाएं हैं । अनुच्छेद 148 के तहत CAG की नियुक्ति भी राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और इसके लिए भी स्वतंत्र चयन प्रक्रिया की मांग उठ रही है । निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता का मुद्दा इसलिए अधिक संवेदनशील है क्योंकि यह तय करता है कि सत्ता की चाबी किसके पास होगी। यदि निर्वाचन मशीनरी "कार्यपालिका के अंगूठे के नीचे" आ जाती है, तो लोकतंत्र का बुनियादी ढांचा ही खतरे में पड़ सकता है ।

स्वतंत्र सचिवालय और फंडिंग का मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को संस्थागत और वित्तीय रूप से मजबूत करने के लिए सरकार से एक "स्वतंत्र सचिवालय" बनाने और आयोग के खर्चों को "भारत की संचित निधि" (Consolidated Fund of India) पर भारित करने का सुझाव दिया है । वर्तमान में, आयोग अपने बजट के लिए सरकार पर निर्भर है, जो उसकी स्वतंत्रता को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर सकता है ।

निर्वाचन आयोग की अन्य महत्वपूर्ण शक्तियां और समकालीन चुनौतियां

अनुच्छेद 324 के तहत केवल नियुक्ति ही एकमात्र मुद्दा नहीं है। आयोग के पास कई अन्य व्यापक शक्तियां हैं जो परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

1. चुनाव आचार संहिता (Model Code of Conduct - MCC)

MCC एक राजनीतिक सर्वसम्मति है, जिसे आयोग अनुच्छेद 324 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करके लागू करता है । मई 2026 के चुनावों में, आयोग डिजिटल बाधाओं का सामना कर रहा है:

AI और डीपफेक: भ्रामक सूचनाओं और फर्जी वीडियो के माध्यम से मतदाताओं को प्रभावित करना ।

क्रिप्टोग्राफिक वाटरमार्किंग: आयोग पार्टियों से डिजिटल प्रचार सामग्री पर वाटरमार्क लगाने की मांग कर रहा है ताकि फर्जी समाचारों के स्रोत का पता लगाया जा सके ।

48 घंटे का मौन काल: व्हाट्सएप और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स के कारण पारंपरिक "48-घंटे के मौन काल" का प्रवर्तन कठिन हो गया है ।

2. न्यायिक और अर्ध-न्यायिक कार्य

आयोग राजनीतिक दलों के पंजीकरण, उन्हें राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा देने और उनके बीच चुनाव चिन्ह विवादों को सुलझाने का कार्य करता है 。 यह चुनाव खर्चों का विवरण जमा न करने पर उम्मीदवारों को अयोग्य भी घोषित कर सकता है 。

3. मतदाताओं की शिक्षा (SVEEP)

'सिस्टमैटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन' (SVEEP) कार्यक्रम के माध्यम से आयोग समावेशी और मतदाता-अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करता है 。 2011 से हर साल 25 जनवरी को 'राष्ट्रीय मतदाता दिवस' मनाया जाता है 。

आंतरिक सुरक्षा और संस्थागत अखंडता

निर्वाचन आयोग की स्थिरता देश की आंतरिक सुरक्षा से भी जुड़ी है। उदाहरण के लिए, गृह मंत्रालय की नई "PRAHAAR" नीति (2026) न केवल आतंकवाद से लड़ती है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थानों की सुरक्षा और कट्टरपंथ को कम करने पर भी ध्यान केंद्रित करती है । एक मजबूत और तटस्थ निर्वाचन आयोग ऐसी नीतियों के सफल कार्यान्वयन के लिए सामाजिक स्थिरता का आधार प्रदान करता है। अभ्यर्थियों को निर्वाचन सुधारों को व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा और 'Rule of Law' के चश्मे से देखना चाहिए।

अधिक जानकारी के लिए एथर्व एग्जामवाइज (Atharva Examwise) के इन लेखों को पढ़ें: *(https://www.atharvaexamwise.com/details/586)

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त्वरित रिविजन के लिए परीक्षा-उपयोगी तथ्य

संवैधानिक प्रावधान: भाग XV, अनुच्छेद 324-329 ।

स्थापना: 25 जनवरी 1950 (राष्ट्रीय मतदाता दिवस) ।

बहु-सदस्यीय निकाय: 1993 से निरंतर ।

2023 अधिनियम की चयन समिति: प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, विपक्ष के नेता ।

खोज समिति का प्रमुख: केंद्रीय कानून और न्याय मंत्री ।

सेवा शर्तें: अब कैबिनेट सचिव के बराबर (पहले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के बराबर थीं) ।

हटाने की प्रक्रिया: CEC के लिए संसद द्वारा महाभियोग जैसी प्रक्रिया; ECs के लिए CEC की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा ।

अनुच्छेद 326: वयस्क मताधिकार (18 वर्ष और उससे अधिक आयु) ।

अनुच्छेद 329: चुनावी मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप पर रोक ।

Why this matters for your exam preparation

अनुच्छेद 324(2) और 2023 का नया कानून यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यधिक प्रासंगिक है क्योंकि:

यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा (UPSC Prelims): चयन समिति की संरचना, खोज समिति के अध्यक्ष, अनुच्छेद 324 के विभिन्न खंडों और 1991 बनाम 2023 अधिनियम के अंतर पर सीधे प्रश्न पूछे जा सकते हैं ।

मुख्य परीक्षा (GS Paper II - Polity): "संवैधानिक निकायों की स्वायत्तता," "शक्तियों का पृथक्करण" (Separation of Powers), और "स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव" जैसे विषयों पर उत्तर लेखन के लिए यह केस स्टडी अनिवार्य है। अभ्यर्थी को अनूप बरनवाल फैसले और 2023 अधिनियम के बीच के टकराव को बुनियादी ढांचे (Basic Structure) के सिद्धांत के साथ जोड़कर विश्लेषित करना होगा ।

निबंध और साक्षात्कार (Essay & Interview): "लोकतंत्र में संस्थागत तटस्थता की भूमिका" या "निर्वाचित कार्यपालिका बनाम न्यायिक हस्तक्षेप" जैसे विषयों पर तार्किक बहस के लिए मई 2026 की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ और पूर्व समितियों (दिनेश गोस्वामी, विधि आयोग) की सिफारिशें एक ठोस आधार प्रदान करती हैं ।

समसामयिकी (Current Affairs): मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मांगी गई 'ओरिजिनल फाइलों' और 'संसदीय बहस की गुणवत्ता' पर उठाए गए सवाल भारतीय विधायी और न्यायिक प्रक्रियाओं के बदलते स्वरूप को समझने में मदद करते हैं ।

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