UPSC Current Affairs 14 May 2026: दार्जिलिंग की बरखा सुब्बा को मिला 'ग्रीन ऑस्कर' (Whitley Award) – हिमालयन सैलामैंडर संरक्षण पर विशेष रिपोर्ट

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पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भारत के लिए 29 अप्रैल 2026 का दिन एक ऐतिहासिक उपलब्धि लेकर आया, जब लंदन के रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी में आयोजित एक भव्य समारोह में दार्जिलिंग की पर्यावरण शोधकर्ता डॉ. बरखा सुब्बा को प्रतिष्ठित 'व्हिटली अवार्ड' (Whitley Award) से सम्मानित किया गया । इस पुरस्कार को विश्व स्तर पर 'ग्रीन ऑस्कर' के नाम से जाना जाता है, जो जमीनी स्तर पर वन्यजीव संरक्षण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले विशेषज्ञों को प्रदान किया जाता है । बरखा सुब्बा के साथ-साथ मुंबई की परवीन शेख को भी भारतीय स्किमर पक्षी के संरक्षण के लिए इस वर्ष यह सम्मान मिला है, जो वैश्विक मंच पर भारतीय महिला वैज्ञानिकों के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करता है ।

यह पुरस्कार बरखा सुब्बा को पूर्वी हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले अत्यंत दुर्लभ और रहस्यमयी जीव 'हिमालयन सैलामैंडर' (Tylototriton himalayanus) और उसके सिकुड़ते आर्द्रभूमि आवासों (Wetlands) को बचाने के लिए दिया गया है । इस सम्मान के साथ उन्हें £50,000 (लगभग 52 लाख रुपये) की पुरस्कार राशि प्राप्त हुई है, जिसका उपयोग वे आगामी वर्षों में सैलामैंडर के संरक्षण नेटवर्क को भारत, नेपाल और भूटान के बीच विस्तारित करने के लिए करेंगी ।

व्हिटली अवार्ड (Whitley Award): पर्यावरण का 'ग्रीन ऑस्कर'

व्हिटली अवार्ड्स की स्थापना 1994 में एडवर्ड व्हिटली द्वारा 'व्हिटली फंड फॉर नेचर' (WFN) के माध्यम से की गई थी । यह पुरस्कार उन संरक्षणवादियों को दिया जाता है जो वैज्ञानिक प्रमाणों और सामुदायिक भागीदारी के समन्वय से 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) में जैव विविधता की रक्षा करते हैं । 2026 के पुरस्कारों के लिए दुनिया भर से 270 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें से केवल 12 उम्मीदवारों को अंतिम रूप से चुना गया और अंततः 6 विजेताओं की घोषणा की गई ।

व्हिटली अवार्ड 2026: मुख्य विवरणविवरण
प्रदाता संस्थाव्हिटली फंड फॉर नेचर (WFN), यूनाइटेड किंगडम
स्थापना वर्ष1994
पुरस्कार राशि£50,000 (प्रत्येक विजेता को)
मुख्य संरक्षिका (Patron)एचआरएच द प्रिंसेस रॉयल (राजकुमारी ऐन)
भारतीय विजेता 2026बरखा सुब्बा और परवीन शेख
व्हिटली गोल्ड अवार्ड 2026फारविज़ा फरहान (इंडोनेशिया)

व्हिटली गोल्ड अवार्ड उन पूर्व विजेताओं को दिया जाता है जिन्होंने अपने कार्य को बड़े पैमाने पर विस्तार दिया है। इस वर्ष यह सम्मान इंडोनेशिया की फारविज़ा फरहान को 'ल्यूसर इकोसिस्टम' की रक्षा के लिए मिला । यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं (competitive exam news today) के दृष्टिकोण से यह जानना आवश्यक है कि व्हिटली फंड केवल वित्तीय सहायता ही नहीं देता, बल्कि विजेताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी आवाज बुलंद करने के लिए मीडिया प्रशिक्षण और वैश्विक नेटवर्किंग का अवसर भी प्रदान करता है ।

हिमालयन सैलामैंडर: 'एक खोई हुई दुनिया का उत्तरजीवी'

बरखा सुब्बा के प्रोजेक्ट का शीर्षक "Survivor of a Lost World: Saving the Himalayan Salamander and its Wetlands" जीव के विकासवादी महत्व को दर्शाता है । हिमालयन सैलामैंडर एक उभयचर (Amphibian) है जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'लिविंग फॉसिल' या जीवित जीवाश्म भी कहा जा सकता है क्योंकि यह लाखों वर्षों से पृथ्वी पर अपने मौलिक स्वरूप में मौजूद है ।

जीव वैज्ञानिक वर्गीकरण और शारीरिक विशेषताएँ

हिमालयन सैलामैंडर (Tylototriton himalayanus) को स्थानीय रूप से नेपाली भाषा में 'पानी कुकुर' (Pani Kukur) या जल-कुत्ता कहा जाता है । वर्ष 2015 तक यह माना जाता था कि भारत में केवल एक प्रजाति Tylototriton verrucosus पाई जाती है, लेकिन विस्तृत आणविक और रूपात्मक विश्लेषण के बाद यह सिद्ध हुआ कि पूर्वी हिमालय की यह प्रजाति एक विशिष्ट और नई प्रजाति है, जिसे Tylototriton himalayanus नाम दिया गया ।

पैरामीटरहिमालयन सैलामैंडर (T. himalayanus)
लंबाई13 सेमी से 19 सेमी तक
जीवनकाललगभग 11 वर्ष
आवास1000 से 3000 मीटर की ऊंचाई पर आर्द्रभूमियाँ
रंगगहरा भूरा या काला, नारंगी-भूरे रंग के मस्से (Warts)
विशेष गुणपूर्ण अंगों को पुनर्जीवित (Regenerate) करने की क्षमता

सैलामैंडर की सबसे विशिष्ट शारीरिक विशेषता उसके शरीर के दोनों ओर पाए जाने वाले मस्से जैसे उभार हैं, जो रक्षा तंत्र का हिस्सा हो सकते हैं । इनका सिर कुंद और अंडाकार होता है तथा पूंछ पार्श्व रूप से दबी हुई होती है, जो उन्हें पानी में तैरने में मदद करती है ।

प्रजनन और फिलोपैत्री (Philopatry) का महत्व

हिमालयन सैलामैंडर की उत्तरजीविता के लिए सबसे बड़ा खतरा उनकी 'फिलोपैत्री' (Philopatry) की प्रवृत्ति है। यह वह प्रक्रिया है जिसमें जीव प्रजनन और अंडे देने के लिए हमेशा उसी तालाब या जल निकाय में लौटते हैं जहाँ उनका जन्म हुआ था । यदि विकास, प्रदूषण या जलवायु परिवर्तन के कारण वह विशिष्ट तालाब सूख जाए या नष्ट हो जाए, तो सैलामैंडर की पूरी पीढ़ी समाप्त हो सकती है क्योंकि वे आसानी से दूसरे स्थान पर अनुकूलित नहीं होते ।

प्रजनन मुख्य रूप से मानसून के दौरान होता है जब ये जीव जंगलों के फर्श से निकलकर मौसमी तालाबों की ओर प्रवास करते हैं । वे जलमग्न वनस्पतियों पर अपने अंडे देते हैं, जिनकी सुरक्षा के लिए वे अत्यंत संवेदनशील होते हैं ।

संरक्षण की चुनौतियाँ: आर्द्रभूमि विनाश और कवक रोग

दार्जिलिंग की पहाड़ियां अपनी चाय की खेती और पर्यटन के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं, लेकिन यही गतिविधियाँ सैलामैंडर के आवासों के लिए संकट बन गई हैं ।

मानवीकरण और आवास का विखंडन

दार्जिलिंग हिमालय क्षेत्र में आर्द्रभूमियाँ तेजी से गायब हो रही हैं। शहरीकरण के कारण तालाबों को भरकर कंक्रीट के जंगल बनाए जा रहे हैं । अनियंत्रित पर्यटन और कचरा प्रबंधन की कमी ने पहाड़ी जलाशयों को प्रदूषित कर दिया है 。 इसके अलावा, चाय बागानों के विविधीकरण और जल स्रोतों के दोहन से सैलामैंडर के प्रजनन स्थल नष्ट हो रहे हैं । वर्तमान में दार्जिलिंग क्षेत्र में केवल लगभग 30 प्रजनन स्थल ही शेष बचे हैं, जिनमें से अधिकांश संरक्षित क्षेत्रों के बाहर निजी भूमि या चाय बागानों में स्थित हैं ।

काइट्रिड कवक (Chytrid Fungus) का खतरा

उभयचरों के लिए वैश्विक स्तर पर सबसे घातक खतरा 'काइट्रिडियोमाइकोसिस' (Chytridiomycosis) नामक बीमारी है, जो Batrachochytrium dendrobatidis (Bd) और Batrachochytrium salamandrivorans (Bsal) नामक कवक द्वारा फैलती है । यह कवक उभयचरों की त्वचा को प्रभावित करता है, जिससे उनकी श्वसन प्रक्रिया बाधित होती है और उनकी मृत्यु हो जाती है । बरखा सुब्बा का प्रोजेक्ट इन घातक बीमारियों की निगरानी और स्क्रीनिंग पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है ताकि हिमालय क्षेत्र में किसी महामारी को फैलने से रोका जा सके ।

बरखा सुब्बा का संरक्षण मॉडल: सामुदायिक नेतृत्व

बरखा सुब्बा स्वयं दार्जिलिंग के एक स्वदेशी समुदाय से आती हैं और वे मानती हैं कि वैज्ञानिकों के आने से बहुत पहले से स्थानीय लोग इन जीवों के रक्षक रहे हैं ।

स्वदेशी ज्ञान और सांस्कृतिक संबंध

दार्जिलिंग के कई गांवों में तालाबों और जलाशयों को स्थानीय देवताओं और अनुष्ठानों से जोड़कर देखा जाता है, जिसके कारण उन्हें पवित्र मानकर संरक्षित रखा गया है । सैलामैंडर को भी अक्सर इन पवित्र जल निकायों का रक्षक माना जाता है। बरखा की योजना में 200 से अधिक स्थानीय व्यक्तियों, चाय बागान श्रमिकों, युवाओं और नेताओं को शामिल करना है, जिन्हें संरक्षण तकनीकों और पारिस्थितिकी पर्यटन (Eco-tourism) में प्रशिक्षित किया जाएगा ।

संरक्षण के लिए लक्षित सात प्रमुख स्थलस्वामित्व/प्रबंधन का प्रकार
मार्गरेट होप (Margaret's Hope)चाय बागान के भीतर
नखापानी (Nakhapani)चाय बागान के भीतर
नामथिंग जैव विविधता विरासत स्थलसरकारी भूमि
मझिधूरा (Majhidhura)वन विभाग और समुदायों द्वारा संयुक्त प्रबंधन
मिरिक (Mirik)निजी स्वामित्व वाली आर्द्रभूमि
पोखरियाबोंग (दो स्थल)वन विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच साझा

इन स्थलों का संरक्षण न केवल सैलामैंडर के लिए आवश्यक है, बल्कि ये जल संचयन क्षेत्र (Catchment areas) के रूप में भी कार्य करते हैं, जो नीचे की ओर रहने वाले समुदायों को स्वच्छ पानी प्रदान करते हैं ।

सीमा पार (Transboundary) सहयोग की परिकल्पना

सैलामैंडर का आवास भारत की राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह प्रजाति नेपाल के इलाम जिले और पश्चिमी भूटान में भी पाई जाती है । बरखा सुब्बा का लक्ष्य एक ऐसा 'ट्रांसबाउंड्री फ्रेमवर्क' तैयार करना है, जहाँ तीनों देश मिलकर इस प्रजाति और इसकी साझा आर्द्रभूमियों की रक्षा कर सकें । यह पहल पूर्वी हिमालय क्षेत्र की पारिस्थितिक अखंडता बनाए रखने के लिए क्रांतिकारी सिद्ध हो सकती है।

भारत में कानूनी संरक्षण की स्थिति

UPSC aspirants के लिए यह खंड परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वन्यजीव अधिनियम के अनुच्छेदों और अनुसूचियों पर अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं।

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (WPA)

हिमालयन सैलामैंडर को भारत में अनुसूची I (Schedule I) के तहत कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है । वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 के बाद, जिसमें अनुसूचियों का युक्तिकरण किया गया था, यह जीव उच्चतम सुरक्षा श्रेणी में बना हुआ है ।

अनुसूची I का महत्व: इस श्रेणी में शामिल जीवों के शिकार, व्यापार या अवैध कब्जे पर पूर्ण प्रतिबंध है और उल्लंघन करने पर कठोरतम दंड (जुर्माना ₹1,00,000 और लंबी जेल की सजा) का प्रावधान है ।

प्रजाति का नाम: संशोधन के बाद इसे स्पष्ट रूप से Tylototriton himalayanus के रूप में सूचीबद्ध किया गया है ।

अंतरराष्ट्रीय संरक्षण स्थिति

IUCN रेड लिस्ट (Red List): इसे 'असुरक्षित' (Vulnerable) श्रेणी में रखा गया है । रेड लिस्ट जैव विविधता के स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण संकेतक है, जो विलुप्ति के खतरे को मापता है ।

CITES (Convention on International Trade in Endangered Species): यह परिशिष्ट II (Appendix II) में सूचीबद्ध है, जो इसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार को विनियमित करता है ताकि वन्य जीवन का अस्तित्व खतरे में न पड़े ।

संरक्षण में चिड़ियाघरों की भूमिका: 'एक्स-सिटू' (Ex-situ) संरक्षण

दार्जिलिंग स्थित पद्मजा नायडू हिमालयन जूलॉजिकल पार्क (PNHZP) सैलामैंडर के संरक्षण प्रजनन (Conservation Breeding) कार्यक्रम का केंद्र रहा है । वर्ष 2000 में शुरू हुए इस कार्यक्रम के तहत, सैलामैंडर को उनके प्राकृतिक आवासों (जैसे सुकिया पोखरी) से लाकर चिड़ियाघर के नियंत्रित वातावरण में पाला और प्रजनन कराया जा रहा है । वर्तमान में चिड़ियाघर में सैलामैंडर की संख्या बढ़ रही है, जो भविष्य में उन्हें पुनः प्राकृतिक आवासों में छोड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण स्टॉक (Genetic pool) के रूप में कार्य करेगा ।

बरखा सुब्बा और परवीन शेख: महिला नेतृत्व की नई मिसाल

बरखा सुब्बा के साथ, एक और भारतीय संरक्षणवादी परवीन शेख को भी व्हिटली अवार्ड 2026 से नवाजा गया है । परवीन शेख चंबल नदी क्षेत्र में संकटग्रस्त 'इंडियन स्किमर' (Indian Skimmer) पक्षी को बचाने के लिए काम कर रही हैं । इन दोनों महिला वैज्ञानिकों की सफलता यह दर्शाती है कि भारत में अब संरक्षण केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शोध और सामुदायिक जुड़ाव का एक नया आयाम बन चुका है ।

बरखा सुब्बा ने अपने पुरस्कार भाषण में कहा, "एक सैलामैंडर से मिलना गहरे विकासवादी समय के एक दूत से मिलने जैसा महसूस होता है – यह एक अनुस्मारक है कि प्रकृति ने कितने समय तक सहन किया है और हम इसे कितनी जल्दी खो सकते हैं" ।

आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है (Why this matters for your exam preparation)

UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC current affairs) के लिए यह समाचार निम्नलिखित कारणों से अनिवार्य है:

पर्यावरण और पारिस्थितिकी (Environment & Ecology - GS Paper III):

हिमालयन सैलामैंडर जैसे 'इंडिकेटर प्रजातियों' (Indicator Species) का पारिस्थितिक महत्व।

उभयचरों के वैश्विक संकट (Amphibian Crisis) और काइट्रिड कवक (Chytrid Fungus) की वैज्ञानिक समझ ।

जमीनी स्तर पर सामुदायिक संरक्षण (Community-led Conservation) बनाम सरकारी प्रबंधन ।

कानूनी और प्रशासनिक ढांचा (Polity & Governance - GS Paper II):

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और 2022 के प्रमुख संशोधनों का विश्लेषण ।

आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम और रामसर कन्वेंशन का भारत में क्रियान्वयन ।

अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations - GS Paper II):

भारत-नेपाल-भूटान के बीच सीमा पार जैव विविधता सहयोग (Transboundary Cooperation) ।

वैश्विक संस्थानों जैसे व्हिटली फंड फॉर नेचर (WFN) और IUCN की भूमिका ।

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims - Mapping & Facts):

नामथिंग (Namthing), मिरिक (Mirik) और दार्जिलिंग पहाड़ियों के मानचित्र आधारित प्रश्न ।

सैलामैंडर की विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं और प्रजनन आदतों (जैसे फिलोपैत्री) पर तथ्यात्मक प्रश्न ।

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