ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना (GNIP), जिसे आधिकारिक तौर पर 'ग्रेट निकोबार द्वीप का समग्र विकास' कहा जाता है, आधुनिक भारत के इतिहास में सबसे महत्वाकांक्षी और विवादास्पद बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक के रूप में उभरी है। नीति आयोग द्वारा परिकल्पित और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम (ANIIDCO) द्वारा कार्यान्वित, यह ₹72,000 करोड़ से ₹92,000 करोड़ की मेगा-परियोजना भारत के सबसे दक्षिणी द्वीप को एक वैश्विक समुद्री और रणनीतिक गढ़ में बदलने का लक्ष्य रखती है । अप्रैल 2026 तक, यह परियोजना न केवल भू-राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गई है, बल्कि यह विकास बनाम संरक्षण की बहस का एक ज्वलंत उदाहरण भी है। इस परियोजना के चार मुख्य स्तंभ हैं: एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT), एक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक गैस और सौर हाइब्रिड पावर प्लांट, और एक विशाल टाउनशिप ।
ग्रेट निकोबार द्वीप की भौगोलिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ग्रेट निकोबार द्वीप, जो लगभग $910$ वर्ग किलोमीटर में फैला है, भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु 'इंदिरा पॉइंट' का घर है । यह द्वीप सुमात्रा (इंडोनेशिया) से मात्र $145$ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग 'मलक्का जलडमरूमध्य' (Strait of Malacca) के पश्चिमी प्रवेश द्वार पर रणनीतिक रूप से स्थित है । ऐतिहासिक रूप से, इन द्वीपों का महत्व चोल राजवंश के समय से ही रहा है, जिन्होंने 11वीं शताब्दी में मलक्का जलडमरूमध्य के पास के राज्यों के खिलाफ अपने अभियानों के लिए निकोबार द्वीप समूह को एक आधार के रूप में उपयोग किया था ।
द्वीप का $85\%$ क्षेत्र 'ग्रेट निकोबार बायोस्फीयर रिजर्व' के अंतर्गत आता है, जिसमें 'कैंपबेल बे' और 'गैलाथिया नेशनल पार्क' शामिल हैं । यह क्षेत्र 'सुंडालैंड' (Sundaland) जैव विविधता हॉटस्पॉट का हिस्सा है और इसे यूनेस्को के 'मैन एंड बायोस्फीयर' (MAB) कार्यक्रम के तहत 2013 में मान्यता दी गई थी ।
परियोजना के प्रमुख घटक और आर्थिक महत्व
परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य भारत को एक क्षेत्रीय समुद्री केंद्र के रूप में स्थापित करना और विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करना है। वर्तमान में, भारत का लगभग $25\%$ ट्रांसशिपमेंट कार्गो कोलंबो, सिंगापुर और पोर्ट क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से संचालित होता है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रति वर्ष लगभग $200$ मिलियन डॉलर का राजस्व नुकसान होता है ।
अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT)
गैलाथिया खाड़ी में प्रस्तावित ICTT इस परियोजना का हृदय है। इसकी प्राकृतिक गहराई $20$ मीटर है, जो इसे दुनिया के सबसे बड़े कंटेनर जहाजों को संभालने के लिए उपयुक्त बनाती है ।
| घटक | विवरण | रणनीतिक/आर्थिक प्रभाव |
|---|---|---|
| स्थान | गैलाथिया खाड़ी (पूर्वी तट) | मलक्का जलडमरूमध्य के निकटतम बिंदु पर स्थिति |
| क्षमता (प्रथम चरण) | $4$ मिलियन TEUs | भारतीय निर्यात-आयात व्यापार को गति देना |
| कुल अनुमानित क्षमता | $14.2$ से $16$ मिलियन TEUs | सिंगापुर और कोलंबो के साथ प्रतिस्पर्धा |
| निवेश | ~₹41,000 करोड़ (केवल पोर्ट के लिए) | विदेशी मुद्रा की बचत और रोजगार सृजन |
ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
प्रस्तावित हवाई अड्डा नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए 'दोहरे उपयोग' (Dual-use) वाला होगा । यह $4.2$ वर्ग किलोमीटर में फैला होगा और इसमें $3,300$ मीटर का रनवे होगा, जो बड़े विमानों के संचालन में सक्षम है । यह आईएनएस बाज़ (INS Baaz) नौसैनिक हवाई केंद्र की क्षमताओं को और सुदृढ़ करेगा, जिससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की हवाई निगरानी और त्वरित तैनाती क्षमता में वृद्धि होगी ।
टाउनशिप और शहरी विकास
परियोजना के तहत $149$ से $160$ वर्ग किलोमीटर में एक आधुनिक टाउनशिप विकसित करने की योजना है ।
| जनसंख्या डेटा | वर्तमान स्थिति | भविष्य का अनुमान (2050-55) |
|---|---|---|
| निवासियों की संख्या | ~8,000 | 3.5 लाख से 6.5 लाख |
| मुख्य आर्थिक गतिविधि | निर्वाह खेती और मत्स्य पालन | पर्यटन, रसद, और अंतरराष्ट्रीय व्यापार |
| बुनियादी ढांचा | न्यूनतम (ग्रामीण) | स्मार्ट सिटी, औद्योगिक क्षेत्र, और विलासिता रिसॉर्ट्स |
इस जनसंख्या विस्फोट को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है कि यह द्वीप के सीमित संसाधनों और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर अत्यधिक दबाव डालेगा ।
ऊर्जा आत्मनिर्भरता: गैस और सौर विद्युत संयंत्र
बुनियादी ढांचे को बिजली प्रदान करने के लिए, $450$ MVA का गैस और सौर हाइब्रिड पावर प्लांट प्रस्तावित है । यह न केवल टाउनशिप बल्कि बंदरगाह और हवाई अड्डे की ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा करेगा, जिससे द्वीप बाहरी आपूर्ति पर निर्भर नहीं रहेगा ।
रणनीतिक महत्व: 'मलक्का दुविधा' और हिंद महासागर की सुरक्षा
भारत के लिए ग्रेट निकोबार का महत्व केवल आर्थिक नहीं बल्कि अत्यधिक रणनीतिक है। इसे अक्सर 'हिंद महासागर के द्वार पर तैनात एक प्राकृतिक विमान वाहक पोत' (Natural Aircraft Carrier) कहा जाता है ।
मलक्का जलडमरूमध्य और चीन का प्रभाव
चीन अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग $80\%$ मलक्का जलडमरूमध्य के माध्यम से आयात करता है। इसे चीनी रणनीतिकार 'मलक्का दुविधा' (Malacca Dilemma) कहते हैं, क्योंकि यह मार्ग उनके नियंत्रण से बाहर है और संकट के समय भारत या उसके सहयोगी इसे बाधित कर सकते हैं ।
निगरानी की शक्ति: ग्रेट निकोबार से भारत 'सिक्स डिग्री चैनल' (Six Degree Channel) पर नजर रख सकता है, जो वैश्विक व्यापार और चीन के ऊर्जा मार्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है ।
क्वाड (QUAD) और क्षेत्रीय संतुलन: यह परियोजना भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के 'क्वाड' गठबंधन के उद्देश्यों के साथ संरेखित है, जो एक 'मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत' क्षेत्र की वकालत करते हैं ।
मोतियों की माला (String of Pearls) का मुकाबला: चीन द्वारा म्यांमार (कोको द्वीप), श्रीलंका (हंबनटोटा), और पाकिस्तान (ग्वादर) में बंदरगाह विकसित करने के जवाब में, ग्रेट निकोबार में भारत की उपस्थिति एक मजबूत रक्षा कवच प्रदान करती है ।
अंडमान और निकोबार कमांड (ANC) का सुदृढ़ीकरण
2001 में स्थापित ANC भारत का पहला और एकमात्र 'त्रि-सेवा एकीकृत कमान' है । GNIP के तहत हवाई पट्टी और बंदरगाह सुविधाओं के विस्तार से ANC की परिचालन पहुंच सुमात्रा और दक्षिण-पूर्व एशिया के गहरे जल क्षेत्रों तक हो जाएगी ।
पर्यावरणीय चिंताएं: जैव विविधता का विनाश?
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी आलोचना इसके पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर हो रही है। द्वीप की जैव विविधता अद्वितीय है और कई प्रजातियां केवल यहीं पाई जाती हैं ।
वनों की कटाई और कार्बन सिंक का नुकसान
परियोजना के लिए लगभग $130.75$ वर्ग किलोमीटर प्राचीन वर्षावन को मोड़ने (divert) का प्रस्ताव है ।
| अनुमानित वृक्षों की कटाई | स्रोत |
|---|---|
| 8.52 लाख - 9.64 लाख | सरकारी आधिकारिक आंकड़े |
| 60 लाख - 1 करोड़ | स्वतंत्र पारिस्थितिकीविदों के अनुमान |
| प्रभावित वन क्षेत्र | ~13,000 हेक्टेयर |
पर्यावरणविदों का तर्क है कि हरियाणा जैसे राज्यों में 'प्रतिपूरक वनीकरण' (Compensatory Afforestation) करने से निकोबार के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों की भरपाई नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों की पारिस्थितिकी पूरी तरह भिन्न है ।
संकटग्रस्त प्रजातियों पर प्रभाव
ग्रेट निकोबार कई दुर्लभ प्रजातियों का एकमात्र निवास स्थान है, जिन पर इस निर्माण कार्य का सीधा प्रभाव पड़ेगा ।
जायंट लेदरबैक कछुआ (Giant Leatherback Turtle): गैलाथिया खाड़ी दुनिया के सबसे बड़े कछुओं के लिए हिंद महासागर का सबसे महत्वपूर्ण प्रजनन स्थल है । बंदरगाह के निर्माण से इनके घोंसले बनाने की प्रक्रिया बाधित होगी । 2024 के सीजन में यहां $600$ से अधिक घोंसले दर्ज किए गए थे, जो एक रिकॉर्ड है ।
निकोबार मेगापोड (Nicobar Megapode): यह एक दुर्लभ पक्षी है जो जमीन पर घोंसले बनाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, मेगापोड का स्थानांतरण (translocation) लगभग असंभव है और वनों की कटाई से इनकी आबादी लुप्त हो सकती है ।
प्रवाल भित्तियां (Coral Reefs): लगभग $20,000$ प्रवाल कॉलोनियों को स्थानांतरित करने की योजना है । हालांकि, प्रवाल स्थानांतरण की सफलता दर वैश्विक स्तर पर बहुत कम है और यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी रूप से नष्ट कर सकता है ।
भूगर्भीय और जलवायु जोखिम
ग्रेट निकोबार 'रिंग ऑफ फायर' (Ring of Fire) पर स्थित है और भूकंपीय क्षेत्र V (Seismic Zone V) के अंतर्गत आता है ।
2004 की सुनामी का प्रभाव: 2004 के भूकंप और सुनामी के दौरान, इंदिरा पॉइंट की तटरेखा $4$ मीटर से अधिक धंस गई थी ।
भविष्य का खतरा: विशेषज्ञों का चेतावनी देना है कि इतनी बड़ी परियोजना एक अस्थिर क्षेत्र में विकसित करना वित्तीय और मानवीय दृष्टि से आत्मघाती हो सकता है ।
जनजातीय अधिकार और सामाजिक संकट: शोंपेन और निकोबारी समुदाय
ग्रेट निकोबार दो प्रमुख स्वदेशी समुदायों का घर है, जिनकी जीवनशैली पूरी तरह से वनों और समुद्र पर निर्भर है ।
शोंपेन जनजाति: एक अत्यंत संवेदनशील समूह (PVTG)
शोंपेन जनजाति को भारत सरकार द्वारा 'अत्यंत संवेदनशील जनजातीय समूह' (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इनकी आबादी मात्र $200$ से $450$ के बीच है ।
स्वास्थ्य जोखिम: बाहरी आबादी के संपर्क में आने से शोंपेन लोगों को उन बीमारियों का खतरा हो सकता है जिनसे लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता उनमें नहीं है ।
शोंपेन नीति 2015: यह नीति जनजातीय कल्याण को प्राथमिकता देती है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि परियोजना के लिए उनके 'निःशुल्क, पूर्व और सूचित सहमति' (FPIC) को नजरअंदाज किया गया है ।
निकोबारी जनजाति और 'सहमति' का विवाद
निकोबारी समुदाय के लोग 2004 की सुनामी के बाद विस्थापित हो गए थे। अब वे अपने पैतृक गांवों में लौटने की मांग कर रहे हैं, जो परियोजना क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं ।
वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006: जनजातीय परिषद का आरोप है कि प्रशासन ने उनकी सहमति के बिना और FRA की प्रक्रियाओं का पालन किए बिना परियोजना को आगे बढ़ाया है ।
सरेंडर सर्टिफिकेट: कई जनजातीय नेताओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें अपनी भूमि छोड़ने के लिए 'सरेंडर सर्टिफिकेट' पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया ।
कानूनी घटनाक्रम और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की भूमिका
ग्रेट निकोबार परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी को कई बार अदालतों में चुनौती दी गई है।
हाई-पावर्ड कमेटी (HPC) और गोपनीय रिपोर्ट
2023 में, NGT ने एक 'हाई-पावर्ड कमेटी' का गठन किया था ताकि मंजूरी की समीक्षा की जा सके । हालांकि, इस कमेटी की रिपोर्ट को "राष्ट्रीय सुरक्षा" और "रणनीतिक महत्व" का हवाला देते हुए सार्वजनिक नहीं किया गया ।
फरवरी 2026 का निर्णय
16 फरवरी 2026 को, NGT ने परियोजना को हरी झंडी दे दी। अधिकरण ने कहा कि परियोजना का "रणनीतिक महत्व" सर्वोपरि है और इसके लिए पर्याप्त पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय (safeguards) शामिल किए गए हैं । NGT ने निर्देश दिया कि कछुओं के रेत वाले घोंसलों का "कोई शुद्ध नुकसान" (no net loss) नहीं होना चाहिए और निर्माण के कारण तटरेखा में बदलाव नहीं आना चाहिए ।
अप्रैल 2026 की राजनीतिक स्थिति: राहुल गांधी का दौरा और विवाद
अप्रैल 2026 के अंतिम सप्ताह में, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ग्रेट निकोबार का दौरा किया, जिससे यह मामला फिर से राष्ट्रीय चर्चा में आ गया ।
विपक्ष का रुख: राहुल गांधी ने इस परियोजना को "देश की प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के खिलाफ सबसे बड़ा घोटाला और अपराध" करार दिया । उन्होंने आरोप लगाया कि यह परियोजना स्थानीय लोगों की सहमति के बिना "कॉर्पोरेट मित्रों" के लाभ के लिए लागू की जा रही है ।
सरकार की प्रतिक्रिया: केंद्र सरकार और भाजपा ने इन आरोपों को "विकास विरोधी" बताया है। गृह मंत्रालय के अनुसार, यह परियोजना भारत की संप्रभुता और समुद्री शक्ति का केंद्र बनेगी और द्वीप को वैश्विक कार्गो हब में बदलेगी ।
अन्य संबंधित गतिविधियाँ: गहरे समुद्र में खनन (Deep Sea Mining)
परियोजना के अलावा, ग्रेट निकोबार के पास का क्षेत्र खनिज संपदा के लिए भी चर्चा में है। नवंबर 2024 में, भारत सरकार ने ग्रेट निकोबार के पूर्व में 'वेस्ट सेवेल रिज' (West Sewell Ridge) पर सात खनिज ब्लॉकों की ई-नीलामी शुरू की थी ।
| पहलू | विवरण |
|---|---|
| खनिज प्रकार | पॉलीमेटालिक नोड्यूल्स और क्रस्ट्स (निकल, कोबाल्ट, मैंगनीज, REEs) |
| महत्व | इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी और रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण |
| वर्तमान स्थिति (अप्रैल 2026) | तकनीकी तैयारी की कमी और निवेशकों की कम रुचि के कारण नीलामी प्रक्रिया में देरी या रद्दीकरण की खबरें |
निष्कर्ष
ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना भारत के विकास के पथ पर एक जटिल चौराहे का प्रतिनिधित्व करती है। रणनीतिक रूप से, यह हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति का मुकाबला करने और भारत को एक समुद्री महाशक्ति बनाने के लिए अपरिहार्य प्रतीत होती है । आर्थिक रूप से, यह वैश्विक रसद और पर्यटन में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने का वादा करती है ।
हालांकि, इसके लिए चुकाई जाने वाली पारिस्थितिक और मानवीय कीमत अत्यधिक है। शोंपेन जैसी आदिम जनजातियों का अस्तित्व और जायंट लेदरबैक कछुओं जैसे प्राचीन जीवों का आवास दांव पर है । सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार NGT द्वारा अनिवार्य किए गए सुरक्षा उपायों को कितनी कड़ाई से लागू करती है और क्या वह विकास की प्रक्रिया में स्थानीय जनजातियों को वास्तव में भागीदार बना पाती है।
Why this matters for your exam preparation
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट यूपीएससी (UPSC) और अन्य राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। इसके विभिन्न आयामों का महत्व इस प्रकार है:
जीएस पेपर 1 (भूगोल): मलक्का जलडमरूमध्य, सिक्स डिग्री चैनल, और अंडमान-निकोबार की भूगर्भीय स्थिति (भूकंपीय क्षेत्र V) से संबंधित प्रश्न। सुंडालैंड हॉटस्पॉट और उष्णकटिबंधीय वर्षावनों की विशेषताएं ।
जीएस पेपर 2 (शासन और अंतरराष्ट्रीय संबंध): भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति, 'क्वाड' (QUAD) गठबंधन, और जनजातीय अधिकारों (FRA 2006) से संबंधित कानूनी मुद्दे। विशेष रूप से शोंपेन (PVTG) के लिए सरकार की नीतियों का विश्लेषण ।
जीएस पेपर 3 (पर्यावरण और आंतरिक सुरक्षा): पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) की प्रक्रिया, जैव विविधता संरक्षण बनाम बुनियादी ढांचा विकास, और हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में नौसैनिक सुरक्षा और 'मलक्का दुविधा' ।
निबंध और नैतिकता: विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन, और स्वदेशी समुदायों के अधिकारों की रक्षा में राज्य की नैतिक जिम्मेदारी जैसे विषयों पर केस स्टडी के रूप में उपयोग किया जा सकता है ।
इस परियोजना के नवीनतम घटनाक्रमों (जैसे अप्रैल 2026 का राजनीतिक विवाद और NGT के आदेश) पर नजर रखना प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) के करंट अफेयर्स और मुख्य परीक्षा (Mains) के उत्तर लेखन के लिए अनिवार्य है।
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