UPSC Current Affairs April 2026: दसवीं अनुसूची और दलबदल विरोधी कानून का विस्तृत विश्लेषण | Atharva Examwise Daily GK Update

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भारतीय संवैधानिक इतिहास और संसदीय लोकतंत्र की यात्रा में अप्रैल 2026 का अंतिम सप्ताह एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज किया गया है। आम आदमी पार्टी (AAP) के दस राज्यसभा सांसदों में से सात सांसदों का भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होना न केवल एक राजनीतिक उलटफेर है, बल्कि इसने भारतीय संविधान की 'दसवीं अनुसूची' (Tenth Schedule) से जुड़े कानूनी और नैतिक प्रश्नों को पुनः जीवित कर दिया है । अथर्व एक्ज़ामवाइज़ (Atharva Examwise) के इस विशेष विश्लेषण में, हम इस घटनाक्रम के हर उस पहलू की पड़ताल करेंगे जो आपकी UPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए अनिवार्य है।   

दलबदल विरोधी कानून का उदय: ऐतिहासिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि

भारतीय राजनीति में दलबदल (Defection) की समस्या कोई नई नहीं है, लेकिन 1960 और 1970 के दशक में इसने सरकार की स्थिरता के लिए एक गंभीर संकट पैदा कर दिया था। "आया राम, गया राम" का मुहावरा इसी दौर की उपज है, जो राजनीतिक अवसरवाद का प्रतीक बन गया ।   

"आया राम, गया राम" की कहानी

वर्ष 1967 में हरियाणा के एक विधायक, गया लाल ने मात्र नौ घंटों के भीतर तीन बार अपनी राजनीतिक निष्ठा बदली । उन्होंने पहले कांग्रेस छोड़ी, फिर संयुक्त मोर्चा में शामिल हुए, फिर वापस कांग्रेस में आए और कुछ ही घंटों बाद पुनः संयुक्त मोर्चा में चले गए। इस घटना ने भारतीय लोकतंत्र की नैतिकता पर गहरे सवाल खड़े किए। इसी अस्थिरता को रोकने के लिए, संसद ने 1985 में 52वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया, जिसके माध्यम से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई ।   

दलबदल विरोधी कानून के मूल उद्देश्य

राजनीतिक स्थिरता: निर्वाचित प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत लाभ या मंत्री पद के लालच में दल बदलने से रोककर सरकार को स्थिरता प्रदान करना ।   

मतदाताओं के जनादेश का सम्मान: यह सुनिश्चित करना कि यदि कोई उम्मीदवार किसी विशेष दल के चुनाव चिह्न और विचारधारा पर जीतता है, तो वह पूरे कार्यकाल के दौरान उसी के प्रति वफादार रहे ।   

पार्टी अनुशासन: विधायी निकायों के भीतर पार्टी अनुशासन को मजबूत करना और सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को बढ़ावा देना ।   

दसवीं अनुसूची की संरचना: 52वां संविधान संशोधन, 1985

52वें संशोधन ने पहली बार भारतीय संविधान में 'राजनीतिक दल' शब्द को आधिकारिक पहचान दी । इसने अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 में संशोधन किया ताकि दलबदल के आधार पर अयोग्यता के प्रावधानों को शामिल किया जा सके ।   

अयोग्यता के आधार (Grounds for Disqualification)

दसवीं अनुसूची के तहत, किसी भी सदन (संसद या राज्य विधानमंडल) के सदस्य को निम्नलिखित स्थितियों में अयोग्य घोषित किया जा सकता है:

सदस्यता का प्रकारअयोग्यता की स्थितिसंबंधित प्रावधान
राजनीतिक दल के सदस्ययदि वह स्वेच्छा से अपने दल की सदस्यता छोड़ देता है या पार्टी व्हिप (Whip) के खिलाफ मतदान करता है ।पैराग्राफ 2(1)(a) और (b)
स्वतंत्र (Independent) सदस्ययदि वह चुनाव जीतने के बाद किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है ।पैराग्राफ 2(2)
मनोनीत (Nominated) सदस्ययदि वह सदन में अपना स्थान ग्रहण करने के छह महीने की समाप्ति के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है ।पैराग्राफ 2(3)

    

'स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना' का अर्थ

UPSC के दृष्टिकोण से यह समझना महत्वपूर्ण है कि 'स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना' का अर्थ केवल औपचारिक इस्तीफा नहीं है । सर्वोच्च न्यायालय ने रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994) में स्पष्ट किया कि सदस्य के आचरण से भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसने सदस्यता छोड़ दी है, जैसे कि किसी अन्य दल की बैठकों में शामिल होना या अपनी पार्टी की नीतियों की सार्वजनिक आलोचना करना ।   

91वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003: कानून की मजबूती

1985 के मूल कानून में एक बड़ी खामी थी—'विभाजन' (Split) का प्रावधान । इसके अनुसार, यदि किसी दल के एक-तिहाई (1/3) सदस्य एक साथ अलग होते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं माना जाता था। इसका दुरुपयोग 'थोक दलबदल' के लिए किया जाने लगा । इसे रोकने के लिए 2003 में 91वां संशोधन लाया गया।   

प्रमुख बदलाव और उनके प्रभाव

विभाजन के प्रावधान का विलोपन: अब एक-तिहाई सदस्यों का अलग होना 'विभाजन' नहीं माना जाता और ऐसे सभी सदस्य अयोग्यता के पात्र होते हैं ।   

विलय (Merger) की सीमा: अयोग्यता से बचने के लिए अब कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का दूसरे दल में विलय आवश्यक है ।   

मंत्रिपरिषद की सीमा (Article 75 & 164): दलबदलुओं को मंत्री पद के लालच से दूर रखने के लिए मंत्रिपरिषद की संख्या सदन की कुल शक्ति के 15% तक सीमित कर दी गई ।   

लाभ के पदों पर रोक: अयोग्य घोषित सदस्य तब तक कोई लाभ का राजनीतिक पद (Remunerative Political Post) धारण नहीं कर सकता जब तक वह पुनः निर्वाचित न हो जाए ।   

अप्रैल 2026 का संकट: AAP सांसदों का भाजपा में विलय

24 अप्रैल 2026 को राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों ने भाजपा के साथ 'विलय' की घोषणा की । इस घटना ने संवैधानिक प्रावधानों के व्यावहारिक अनुप्रयोग की एक जटिल तस्वीर पेश की है।   

संख्या बल का गणित (The Math of Defection)

राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सांसद थे ।   

कुल सांसद: 10

दो-तिहाई (2/3) का आंकड़ा: 10×32​=6.66, जिसे दलबदल कानून के संदर्भ में 7 माना जाता है।

विलय करने वाले सांसद: 7 (राघव चड्ढा, संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता) ।   

चूंकि यह संख्या ठीक दो-तिहाई के आंकड़े को छूती है, इसलिए इन सांसदों ने दावा किया है कि यह कानूनी रूप से एक 'विलय' है और उनकी सदस्यता बनी रहनी चाहिए ।   

भाजपा में शामिल होने वाले सांसदों का विवरण

सांसद का नामपृष्ठभूमिराज्यकार्यकाल समाप्ति
राघव चड्ढाचार्टर्ड अकाउंटेंट, AAP के संस्थापक सदस्यपंजाबअप्रैल 2028
स्वाति मालीवालपूर्व अध्यक्ष, दिल्ली महिला आयोगदिल्लीजनवरी 2030
संदीप पाठकपूर्व IIT प्रोफेसर, चुनावी रणनीतिकारपंजाबअप्रैल 2028
हरभजन सिंहपूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरपंजाबअप्रैल 2028
अशोक मित्तलसंस्थापक, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU)पंजाबअप्रैल 2028
विक्रमजीत साहनीउद्योगपति और समाज सेवीपंजाबअप्रैल 2028
राजिंदर गुप्तासंस्थापक, ट्राइडेंट ग्रुपपंजाबअक्टूबर 2031

  

इस घटना के बाद राज्यसभा में AAP की शक्ति घटकर मात्र 3 रह गई है (संजय सिंह, बलबीर सिंह सीचेवाल और एन.डी. गुप्ता) । पंजाब की राजनीति पर इसका गहरा प्रभाव पड़ने की संभावना है, क्योंकि पंजाब से चुने गए लगभग सभी राज्यसभा सांसद अब भाजपा का हिस्सा हैं ।   

कानूनी और संवैधानिक विवाद: क्या यह विलय वैध है?

AAP के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने इस कदम को "असंवैधानिक और अवैध" करार देते हुए राज्यसभा सभापति से सांसदों की अयोग्यता की मांग की है । यहाँ मुख्य विवाद 'विधायी दल' (Legislature Party) और 'मूल राजनीतिक दल' (Original Political Party) के बीच के अंतर को लेकर है 。   

संजय सिंह और AAP का तर्क

संजय सिंह का कहना है कि दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 के तहत 'विलय' तभी माना जाता है जब मूल राजनीतिक दल का दूसरे दल में विलय हो । उनके अनुसार, जब तक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली AAP भाजपा में विलय नहीं करती, तब तक केवल सांसदों का एक समूह 'विलय' का दावा नहीं कर सकता । उन्होंने सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल (2023) के मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दल और विधायी दल के बीच स्पष्ट अंतर किया था ।   

विशेषज्ञों और विशेषज्ञों की राय (Expert Perspectives)

सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी और नीरज किशन कौल का तर्क है कि दसवीं अनुसूची का पैराग्राफ 4(2) स्पष्ट रूप से 'विधायी दल' के दो-तिहाई सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करता है । यदि किसी विशेष सदन में दो-तिहाई सदस्य सहमत हैं, तो उसे एक 'मानित विलय' (Deemed Merger) माना जा सकता है ।   

वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता ए.एम. सिंघवी का मानना है कि दसवीं अनुसूची अब एक "बांझ कानून" (Sterile Law) बन गई है, जिसे समाप्त कर एक नया सरल नियम लाना चाहिए: "जो भी दल बदले, वह इस्तीफा दे और पुनः चुनाव लड़े" ।   

न्यायिक समीक्षा और ऐतिहासिक निर्णय: किहोतो होलोहन केस

दसवीं अनुसूची की वैधता को चुनौती देने वाला सबसे प्रमुख मामला किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्लु (1992) है ।   

किहोतो होलोहन (1992) के प्रमुख निष्कर्ष

कानून की वैधता: सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल विरोधी कानून को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, यह कहते हुए कि इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक नैतिकता की रक्षा करना है ।   

न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीठासीन अधिकारी (Speaker/Chairman) का निर्णय अंतिम नहीं है और यह हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा न्यायिक समीक्षा के अधीन है ।   

पीठासीन अधिकारी की भूमिका: निर्णय लेने की शक्ति अध्यक्ष/सभापति के पास है, जो एक 'ट्रिब्यूनल' के रूप में कार्य करते हैं ।   

पैराग्राफ 7 का विलोपन: अदालत ने दसवीं अनुसूची के उस हिस्से को हटा दिया जिसने अदालतों के हस्तक्षेप को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया था ।   

हालिया न्यायिक दिशा-निर्देश

कीशम मेघचंद्र सिंह केस (2020): सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि विधानसभा अध्यक्ष को दलबदल की याचिकाओं पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेना चाहिए ।   

नबाम रेबिया केस (2016): अध्यक्ष तब तक अयोग्यता की याचिका पर निर्णय नहीं ले सकते जब तक उनके खुद के निष्कासन का प्रस्ताव लंबित हो 。   

पीठासीन अधिकारी की शक्तियां और चुनौतियां

दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का निर्णय लेने की अंतिम शक्ति सदन के पीठासीन अधिकारी (Speaker/Chairman) के पास होती है । राज्यसभा के मामले में यह शक्ति उपराष्ट्रपति (सभापति) के पास है 。   

निष्पक्षता पर सवाल

अक्सर पीठासीन अधिकारी की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं क्योंकि वे मूल रूप से सत्ताधारी दल से जुड़े होते हैं । कई बार वे अयोग्यता की याचिकाओं को लंबे समय तक लंबित रखते हैं (Pocket Veto), जिससे दलबदल करने वाले सदस्यों को सरकार में बने रहने का मौका मिलता है ।   

समाधान की मांग

विभिन्न समितियों जैसे दिनेश गोस्वामी समिति और विधि आयोग ने सिफारिश की है कि अयोग्यता का निर्णय लेने की शक्ति निर्वाचन आयोग (Election Commission) या किसी स्वतंत्र न्यायाधिकरण को दी जानी चाहिए ।   

दलबदल विरोधी कानून के लाभ और हानियां

पक्षतर्क
लाभ (Merits)सरकारों को स्थिरता प्रदान करता है; भ्रष्टाचार और अवसरवाद को कम करता है; विधायी अनुशासन सुनिश्चित करता है ।
हानियां (Demerits)सांसदों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19) को सीमित करता है; पार्टी हाईकमान की शक्ति बढ़ाता है; केवल 'थोक दलबदल' को बढ़ावा देता है 。

   

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Why this matters for your exam preparation

दसवीं अनुसूची और दलबदल विरोधी कानून UPSC 'Polity' (GS Paper II) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है । 2026 की यह घटना निम्नलिखित कारणों से आपकी परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है:   

Conceptual Clarity: यह "विधायी दल" और "मूल राजनीतिक दल" के बीच के सूक्ष्म अंतर को समझने में मदद करती है, जो मुख्य परीक्षा (Mains) के लिए महत्वपूर्ण है ।   

Judicial Precedents: किहोतो होलोहन और हालिया सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों (जैसे 2023 का शिवसेना मामला) का उल्लेख उत्तर लेखन में मूल्यवर्धन (Value Addition) करता है ।   

Institutional Ethics: दलबदल कानून की प्रभावशीलता पर बहस 'Govenance' और 'Ethics' (GS Paper IV) के लिए भी प्रासंगिक है 。   

Numerical Facts: प्रीलिम्स के लिए 2/3 विलय की शर्त, 91वें संशोधन के प्रावधान और अयोग्यता के विशिष्ट आधार याद रखना आवश्यक है ।   

Role of Presiding Officer: अध्यक्ष की शक्तियों और उनकी सीमाओं पर बार-बार प्रश्न पूछे जाते हैं 。   

अथर्व एक्ज़ामवाइज़ की ओर से सभी अभ्यर्थियों को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं! अपनी तैयारी को निरंतर और विश्लेषणात्मक रखें। "निरंतरता + रिवीज़न + टेस्ट प्रैक्टिस = सफलता" ।