Gemini said समसामयिकी अप्रैल 2026: भारत का परमाणु पुनर्जागरण और कलपक्कम PFBR की क्रिटिकलिटी — एक व्यापक UPSC दैनिक GK अपडेट

featured project

भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के परिदृश्य में 6 अप्रैल, 2026 की शाम को एक संरचनात्मक परिवर्तन देखा गया, जिसने राष्ट्र की रणनीतिक स्वायत्तता और ऊर्जा सुरक्षा की खोज में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर स्थापित किया। ठीक रात 08:25 बजे, तमिलनाडु के कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने अपनी पहली 'क्रिटिकलिटी' (Criticality) प्राप्त की—जो एक स्वतः-स्फूर्त परमाणु विखंडन श्रृंखला (self-sustaining nuclear fission chain reaction) की शुरुआत है। यह विकास केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है; यह भारत के बहुप्रतीक्षित त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण (Stage II) का कार्यात्मक सक्रियण है। UPSC उम्मीदवारों के लिए, यह घटना स्वदेशीकरण, शांति (SHANTI) अधिनियम 2025 के माध्यम से विधायी सुधार और "विकसित भारत 2047" दृष्टिकोण की ओर एक निर्णायक कदम का प्रतिनिधित्व करती है।

कलपक्कम में क्रिटिकलिटी का भौतिक विज्ञान और महत्व

परमाणु इंजीनियरिंग की दुनिया में, 'क्रिटिकलिटी' वह बिंदु है जिस पर एक परमाणु रिएक्टर ऊर्जा का एक स्वतंत्र इंजन बन जाता है। यह तब होता है जब विखंडन द्वारा उत्पादित न्यूट्रॉन की संख्या अवशोषण या रिसाव के माध्यम से खो जाने वाले न्यूट्रॉन के ठीक बराबर होती है, जिससे एक स्थिर वातावरण बनता है जहां ऊर्जा उत्पादन अनिश्चित काल तक जारी रह सकता है। 500 मेगावाट क्षमता वाले इस PFBR को इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) द्वारा डिजाइन किया गया है और भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) द्वारा निर्मित किया गया है। मार्च 2024 में कोर लोडिंग के सफल समापन के बाद रिएक्टर ने यह स्थिति प्राप्त की है।

PFBR एक "पूल-टाइप" रिएक्टर है जो शीतलक (coolant) के रूप में तरल सोडियम का उपयोग करता है। यह विकल्प इसके अद्वितीय ईंधन चक्र के लिए आवश्यक उच्च-ऊर्जा "फास्ट" (तेज) न्यूट्रॉन के कारण चुना गया है। पारंपरिक रिएक्टरों के विपरीत, जो मंदक (moderator) का उपयोग करके न्यूट्रॉन को धीमा करते हैं, PFBR उर्वर सामग्री (fertile material) को विखंडनीय ईंधन (fissile fuel) में बदलने की सुविधा के लिए उच्च न्यूट्रॉन गति बनाए रखता है। इस प्रक्रिया को "ब्रीडिंग" (प्रजनन) के रूप में जाना जाता है, जो रिएक्टर को खपत किए गए विखंडनीय पदार्थ की तुलना में अधिक विखंडनीय सामग्री का उत्पादन करने की अनुमति देता है, जिससे प्रभावी रूप से भविष्य की पीढ़ियों के लिए अपना ईंधन स्वयं बनता है।

कलपक्कम PFBR के तकनीकी पैरामीटर

रिएक्टर का कोर यूरेनियम-प्लूटोनियम मिश्रित ऑक्साइड (MOX) मिश्रण से संचालित होता है, जो भारत के मौजूदा प्रथम चरण के रिएक्टरों के पुनर्संसाधित उपयोग किए गए ईंधन (spent fuel) से प्राप्त होता है। इस कोर के चारों ओर यूरेनियम-238 का एक "ब्लैंकेट" (आवरण) होता है, जो अतिरिक्त न्यूट्रॉन को अवशोषित करके प्लूटोनियम-239 में बदल जाता है।

विशेषताविशिष्टता और महत्व
स्थापित क्षमता500 MWe (लगभग 4-5 लाख भारतीय घरों को बिजली दे सकता है)
तापीय क्षमता1,253 MWt
शीतलक प्रकारतरल सोडियम (लगभग 1,750 टन)
ईंधन प्रकार$Pu^{239}$ और $U^{238}$ का मिश्रित ऑक्साइड (MOX)
रिएक्टर प्रकारफास्ट न्यूट्रॉन, पूल-टाइप ब्रीडर
स्वदेशी सामग्रीमुख्य रूप से 200+ भारतीय उद्योगों द्वारा डिजाइन और निर्मित

तरल सोडियम का उपयोग जल-शीतलित रिएक्टरों की तुलना में उच्च तापीय दक्षता प्रदान करता है, लेकिन हवा और नमी के साथ सोडियम की उच्च प्रतिक्रियाशीलता के कारण यह इंजीनियरिंग चुनौतियां पेश करता है। इस तकनीक में महारत हासिल करना भारत को रूस और चीन के साथ उन चुनिंदा देशों के समूह में खड़ा करता है जो वाणिज्यिक स्तर के फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करते हैं।

त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का विकास

कलपक्कम के रणनीतिक महत्व को समझने के लिए, 1950 के दशक में डॉ. होमी जे. भाभा द्वारा स्थापित वास्तुशिल्प ढांचे का संदर्भ लेना आवश्यक है। इस कार्यक्रम को भारत की यूरेनियम की भारी कमी को दूर करने और केरल, तमिलनाडु और ओडिशा की मोनाज़ाइट रेत में पाए जाने वाले थोरियम के विशाल भंडार का लाभ उठाने के लिए डिज़ाइन किया गया था।

चरण I: PHWRs की नींव

पहला चरण प्राकृतिक यूरेनियम द्वारा संचालित दबावयुक्त भारी जल रिएक्टरों (PHWRs) पर निर्भर करता है। ये रिएक्टर बिजली पैदा करते हैं और उप-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम-239 का उत्पादन करते हैं। भारत ने इस तकनीक में महारत हासिल कर ली है, वर्तमान में 8,180 मेगावाट की कुल क्षमता वाले लगभग 18 से 24 PHWRs का संचालन कर रहा है। 700 मेगावाट का स्वदेशी PHWR मॉडल दुनिया में सबसे अधिक लागत प्रभावी माना जाता है।

चरण II: गुणक (कलपक्कम PFBR)

PFBR द्वारा शुरू किया गया दूसरा चरण, अधिक ईंधन बनाने के लिए चरण I के प्लूटोनियम का उपयोग करता है। प्रतिक्रिया इस प्रकार होती है:

$$\text{n} + \text{U}^{238} \rightarrow \text{U}^{239} \xrightarrow{\beta^-} \text{Np}^{239} \xrightarrow{\beta^-} \text{Pu}^{239}$$

यह चरण तीसरे चरण के लिए आवश्यक सेतु है, क्योंकि यह अंततः यूरेनियम-233 का उत्पादन करने के लिए ब्लैंकेट में थोरियम-232 को शामिल करेगा।

चरण III: टिकाऊ लक्ष्य

अंतिम चरण में थोरियम-232 और यूरेनियम-233 द्वारा संचालित उन्नत भारी जल रिएक्टरों (AHWRs) की तैनाती की परिकल्पना की गई है। थोरियम का रूपांतरण निम्नानुसार होता है:

$$\text{n} + \text{Th}^{232} \rightarrow \text{Th}^{233} \xrightarrow{\beta^-} \text{Pa}^{233} \xrightarrow{\beta^-} \text{U}^{233}$$

एक बार स्थापित होने के बाद, यह चक्र सैकड़ों वर्षों तक भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है, जिससे राष्ट्र परमाणु ईंधन में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा।

विधायी उत्प्रेरक: शांति (SHANTI) अधिनियम 2025

कलपक्कम की तकनीकी उपलब्धि दशकों की मेहनत का परिणाम है, लेकिन राष्ट्रीय ग्रिड में इसके एकीकरण को दिसंबर 2025 में पारित शांति (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India) अधिनियम द्वारा गति मिली। इस कानून ने 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम द्वारा स्थापित परमाणु ऊर्जा उत्पादन पर 63 साल पुराने राज्य के एकाधिकार को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया।

संरचनात्मक सुधार और निजी भागीदारी

शांति अधिनियम भारतीय इतिहास में पहली बार निजी कंपनियों को परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने, स्वामित्व रखने और संचालित करने की अनुमति देता है। जबकि राज्य "रणनीतिक" ईंधन चक्र (संवर्धन और उपयोग किए गए ईंधन प्रबंधन सहित) पर नियंत्रण रखता है, निजी संस्थाएं अब 49% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के साथ संयुक्त उद्यमों में प्रवेश कर सकती हैं।

सुधार का क्षेत्रशांति अधिनियम 2025 का प्रभाव
निजी निवेशअदानी, टाटा पावर और नवीन जिंदल जैसे समूहों के लिए उत्पादन के रास्ते खोलता है।
आपूर्ति कर्ता देयता2010 के CLND अधिनियम की धारा 17(b) को हटाता है, जिससे अमेरिकी/यूरोपीय विक्रेताओं को आकर्षित करने के लिए वैश्विक मानकों के साथ तालमेल बैठता है।
नियामक स्थितिपरमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को वैधानिक अधिकार प्रदान करता है, जिससे स्वतंत्रता बढ़ती है।
देयता सीमापांच-स्तरीय ग्रेडेड कैप पेश करता है जो ₹3,000 करोड़ तक बढ़ता है, जिससे निजी परियोजनाओं के लिए बैंकयोग्यता सुनिश्चित होती है।

यह अधिनियम 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता के परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक पूर्व शर्त है, एक ऐसा लक्ष्य जिसके लिए $200 बिलियन से अधिक पूंजी की आवश्यकता है। क्षेत्र के उदारीकरण के माध्यम से, सरकार का लक्ष्य परमाणु ऊर्जा को सौर और पवन जैसी रुक-रुक कर चलने वाली अक्षय ऊर्जा के पूरक के रूप में एक स्थिर 'बेसेलोड' (baseload) के रूप में मानना ​​है।

लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) और भविष्य के नवाचार

"विकसित भारत के लिए परमाणु ऊर्जा मिशन" का एक महत्वपूर्ण घटक लघु मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) पर ध्यान केंद्रित करना है। बड़े 700 MWe या 1,000 MWe संयंत्रों के विपरीत, SMRs 30 MWe से 300 MWe की क्षमता प्रदान करते हैं और इन्हें "परमाणु पार्कों" या पुराने थर्मल प्लांट साइटों पर तैनात किया जा सकता है।

स्वदेशी SMR विकास

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन और दूरस्थ बिजली आपूर्ति के उद्देश्य से तीन अलग-अलग SMR मॉडल के विकास का नेतृत्व कर रहा है।

BSMR-200 (220 MWe, PWR-आधारित): स्टील, एल्यूमीनियम और सीमेंट उद्योगों के लिए कैप्टिव पावर।

SMR-5 (55 MWe, अत्यधिक मॉड्यूलर): खनन, द्वीप ग्रिड और दूरदराज के क्षेत्रों के लिए विकेंद्रीकृत बिजली।

HTGCR (5 MWth, गैस-कूल्ड): कार्बन-तटस्थ हाइड्रोजन उत्पादन के लिए उच्च तापमान वाली गर्मी।

केंद्रीय बजट 2025-26 ने इस मिशन के लिए ₹20,000 करोड़ आवंटित किए, जिसमें पहले पांच स्वदेशी SMR के 2033 तक चालू होने की उम्मीद है।

रणनीतिक महत्व: ऊर्जा सुरक्षा और नेट-जीरो 2070

भारत का ऊर्जा परिवर्तन बढ़ती मांग की वास्तविकता से प्रेरित है। 2032 तक बिजली की चरम मांग 900 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है। जबकि 2025 के अंत तक अक्षय ऊर्जा स्थापित क्षमता के 50% से अधिक तक पहुंच गई है, लेकिन रुक-रुक कर होने वाली आपूर्ति के कारण उत्पादन में इनका योगदान लगभग 22% बना हुआ है। परमाणु ऊर्जा, अपने उच्च क्षमता कारक और कम भूमि तीव्रता के साथ, कोयले का एकमात्र स्केलेबल कार्बन-मुक्त विकल्प है।

थोरियम की भूमिका और ऊर्जा स्वतंत्रता

थोरियम आधारित बिजली की ओर दीर्घकालिक संक्रमण भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के लिए महत्वपूर्ण है। कलपक्कम में FBR तकनीक में महारत हासिल करके, भारत अपने 1.19 करोड़ टन मोनाज़ाइट-व्युत्पन्न थोरियम का उपयोग करने के करीब पहुंच गया है।

वैज्ञानिक अनिल काकोदकर द्वारा प्रस्तावित नवाचारों से पता चलता है कि भारत को एक विशाल FBR बेड़े के लिए प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। मौजूदा PHWRs में "ड्राइवर ईंधन" के रूप में HALEU (High-Assay Low-Enriched Uranium) का उपयोग करके, थोरियम को बड़े पैमाने पर यूरेनियम-233 का उत्पादन करने के लिए इरेडिएट किया जा सकता है। यह "थोरियम-HALEU" ईंधन संस्करण (जिसे ANEEL ब्रांड नाम दिया गया है) यूरेनियम आयात निर्भरता को कम करके भारत के ऊर्जा अर्थशास्त्र को फिर से परिभाषित कर सकता है।

वैश्विक स्थिति और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

कलपक्कम PFBR की क्रिटिकलिटी एक वैश्विक परमाणु निवेश शक्ति केंद्र के रूप में भारत की स्थिति की पुष्टि करती है। जहां फ्रांस, अमेरिका और जापान जैसे पश्चिमी देशों ने सुरक्षा चिंताओं और उच्च पूंजी लागत के कारण अपने फास्ट ब्रीडर कार्यक्रमों को छोड़ दिया, वहीं भारत की दृढ़ता ने एक "संप्रभु ऊर्जा संपत्ति" तैयार की है।

शांति अधिनियम ने देयता के संबंध में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ एक दशक पुराने घर्षण बिंदु को भी सुलझा लिया है, जिससे कोव्वाडा और जैतापुर की परियोजनाओं के रास्ते खुल सकते हैं। कुडनकुलम में भारत-रूस सहयोग के माध्यम से द्विपक्षीय संबंध और मजबूत हुए हैं, जहां इकाई 3 और 4 के 2026-27 तक पूरा होने की उम्मीद है।

100 गीगावाट की राह में चुनौतियां

100 गीगावाट परमाणु बेड़े की ओर संक्रमण चुनौतियों से मुक्त नहीं है:

वित्तीय बाधाएं: क्षमता विस्तार के लिए ₹18 लाख करोड़ ($200 बिलियन) से अधिक के निवेश की आवश्यकता होगी।

कौशल की कमी: 100 गीगावाट के बेड़े को संचालित करने के लिए 38,000 अत्यधिक कुशल परमाणु पेशेवरों की आवश्यकता होगी, जबकि वर्तमान में भारत प्रति वर्ष लगभग 300 ऐसे पेशेवर तैयार करता है।

जलवायु जोखिम: 2025 में अनिश्चित मानसून और बढ़ते तापमान के कारण "थर्मल थ्रॉटलिंग" हुई, जहाँ संयंत्रों को उत्पादन कम करना पड़ा क्योंकि स्रोत का पानी ठंडा करने के लिए बहुत गर्म था।

नियामक परिपक्वता: निजी खिलाड़ियों के लिए SMR लाइसेंसिंग और नीतिगत सुरक्षा के नियम अभी भी प्रारंभिक अवस्था में हैं।

आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है?

कलपक्कम PFBR क्रिटिकलिटी और शांति अधिनियम 2025 UPSC उम्मीदवारों के लिए निम्नलिखित दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण हैं:

विज्ञान और प्रौद्योगिकी (GS पेपर III): परमाणु विखंडन बनाम संलयन, फास्ट बनाम थर्मल रिएक्टर, मंदक ($D_2O$) और शीतलक (तरल सोडियम) की भूमिका। "बंद ईंधन चक्र" (closed fuel cycle) को समझें।

बुनियादी ढांचा और ऊर्जा (GS पेपर III): नेट-जीरो 2070 के संदर्भ में परमाणु ऊर्जा के लिए "बेसेलोड" तर्क। लक्ष्य: 2032 तक 22.5 GW और 2047 तक 100 GW।

शासन और नीति (GS पेपर II): शांति अधिनियम 2025 "प्रौद्योगिकी के स्वदेशीकरण" और राज्य के एकाधिकार से विनियमित बाजार की ओर बदलाव का एक उदाहरण है। AERB की वैधानिक स्थिति का विश्लेषण करें।

भूगोल (GS पेपर I): परमाणु ऊर्जा संयंत्रों (तारापुर, काकरापार, कलपक्कम, कुडनकुलम, नरोरा, रावतभाटा, कैगा) और केरल, ओडिशा तथा आंध्र प्रदेश में मोनाज़ाइट रेत के निक्षेपों के स्थानों का मानचित्रण करें।

अथर्व एग्जामवाइज एक्सपर्ट टिप: व्यक्तित्व परीक्षण (इंटरव्यू) के लिए, परमाणु क्षेत्र में निजी खिलाड़ियों को शामिल करने के पक्ष में तर्क देने के लिए तैयार रहें। इस बात पर प्रकाश डालें कि "सुरक्षा प्रवेश के लिए एक पूर्व शर्त है," लेकिन भारत की "विकसित भारत" ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए निजी पूंजी अनिवार्य है।

दैनिक UPSC अपडेट के लिए www.atharvaexamwise.com पर जाएं।