UPSC current affairs April 3, 2026: गरुड़ गर्वभंगम नृत्य और भारतीय संस्कृति - Atharva Examwise current news, daily GK update, competitive exam news today

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भारतीय संस्कृति और परंपराओं में विभिन्न पौराणिक कथाओं व धार्मिक प्रसंगों को नृत्य एवं नाट्य के माध्यम से प्रस्तुत करने की परंपरा प्राचीन काल से ही अत्यंत सुदृढ़ रही है। विभिन्न शास्त्रीय और लोक कलाओं ने न केवल आध्यात्मिक संदेशों का प्रसार किया है, बल्कि समाज को नैतिकता और सामाजिक समरसता की सीख भी दी है । इसी परंपरा की एक अद्वितीय अभिव्यक्ति 'गरुड़ गर्वभंगम' नामक नृत्य-नाट्य में देखने को मिलती है। यह प्रसंग न केवल दक्षिण भारतीय नृत्य-नाट्य परंपराओं का एक महत्वपूर्ण अंग है, बल्कि यह प्राचीन मूर्तिकला और आधुनिक सिनेमाई इतिहास के विकास की कड़ियों को भी जोड़ता है । इस आलेख में इस विशिष्ट कला रूप, इसके ऐतिहासिक उद्भव, विभिन्न शास्त्रीय शैलियों में इसके रूपांतरण, तथा मंदिर वास्तुकला में इसके साक्ष्यों का एक विस्तृत और परीक्षा-केंद्रित विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है जो संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-१ (कला एवं संस्कृति) के लिए अत्यंत प्रासंगिक है ।   

गरुड़ गर्वभंगम की पौराणिक पृष्ठभूमि और दार्शनिक महत्व

'गरुड़ गर्वभंगम' मूलतः तीन संस्कृत शब्दों के संयोजन से निर्मित हुआ है, जिसमें 'गरुड़' भगवान विष्णु के दिव्य वाहन को इंगित करता है, 'गर्व' का अर्थ अहंकार या अभिमान है, और 'भंगम' का तात्पर्य टूटने या समाप्त होने से है। इस प्रकार, इसका शाब्दिक और भावार्थ "भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के अहंकार की समाप्ति की कथा" को दर्शाता है।

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, गरुड़ को अपनी अद्वितीय गति, शक्ति और भगवान विष्णु का अनन्य वाहन होने के कारण अत्यधिक गौरव की अनुभूति होने लगती है । यह गौरव धीरे-धीरे गहरे अहंकार में परिवर्तित हो जाता है, जिससे वह स्वयं को देवताओं और अन्य भक्तों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं। सनातन दर्शन में अहंकार को मनुष्य और देवताओं, दोनों के विनाश का मूल कारण माना गया है। इसी कारणवश, भगवान विष्णु अपने इस प्रिय वाहन को विनम्रता का पाठ पढ़ाने के लिए एक लीला रचते हैं ।   

दक्षिण भारतीय लोक विधाओं और नाट्य परंपराओं में इस कथा को विस्तार देते हुए दिखाया गया है कि भगवान विष्णु गरुड़ को पवनपुत्र हनुमान को आमंत्रित करने के लिए भेजते हैं । हनुमान, जो त्रेतायुग के परम रामभक्त और अपनी असीमित शक्ति के लिए जाने जाते हैं, उस समय कदली वन में निवास कर रहे थे । गरुड़ जब वहां पहुंचते हैं, तो उनके स्वभाव में निहित अहंकार स्पष्ट झलकता है । हनुमान जी, जो गरुड़ के इस अहंकार को पहचान लेते हैं और भगवान विष्णु की इस लीला के उद्देश्य को समझते हैं, गरुड़ के साथ चलने से मना कर देते हैं । इसके परिणामस्वरूप दोनों दिव्य शक्तियों के मध्य एक द्वंद्व या युद्ध की स्थिति उत्पन्न होती है । अंततः, हनुमान की अगाध भक्ति और पराक्रम के सम्मुख गरुड़ पराजित होते हैं और उनका अभिमान चूर-चूर हो जाता है । अंततः गरुड़ अपने गर्व का त्याग कर विनम्रता और सच्ची भक्ति का मार्ग अपनाते हैं। यह कथा दर्शाती है कि शक्ति और सेवा का अधिकार तभी सार्थक होता है जब वह अहंकार से मुक्त होकर पूर्ण समर्पण में बदल जाए।   

केरल की ओट्टन थुल्लल कला परंपरा और गरुड़ गर्वभंगम

गरुड़ के गर्वभंग की इस कथा को मंच पर जीवंत करने वाली सबसे सशक्त और लोकप्रिय कला विधाओं में से एक केरल की 'ओट्टन थुल्लल' (Ottan Thullal) है । ओट्टन थुल्लल केरल की एक लगभग ३०० वर्ष पुरानी पारंपरिक प्रदर्शनकारी कला विधा है, जिसे शास्त्रीयता और लोकतत्वों का एक बेहतरीन मिश्रण माना जाता है ।   

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस कला विधा का आविष्कार १८वीं शताब्दी में विख्यात कवि और मिझावु (Mizhavu) नामक वाद्य के वादक कुंचन नांबियार (Kunchan Nambiar) द्वारा किया गया था । ऐसा माना जाता है कि मंदिर में चाक्यार कूथु (Chakiyar Koothu) के प्रदर्शन के दौरान झपकी लेने के कारण चाक्यार कलाकार द्वारा अपमानित किए जाने के बाद, नांबियार ने इस नई और अधिक सुलभ कला विधा का विकास किया । चाक्यार कूथु जहां संस्कृत के श्लोकों और शास्त्रीय भाषा पर आधारित था, वहीं कुंचन नांबियार ने ओट्टन थुल्लल के लिए सरल और बोलचाल की मलयालम भाषा का प्रयोग किया । इस भाषाई सरलीकरण ने कला को आम जनता के अत्यंत निकट ला दिया और इसे अत्यधिक लोकप्रियता प्रदान की ।   

ओट्टन थुल्लल की सबसे बड़ी विशेषता इसका एकल अभिनय (Solo Performance) होना है । इस नृत्य-नाट्य में एक ही कलाकार कथा के सभी पात्रों—जैसे भगवान विष्णु, गरुड़, और हनुमान—की भूमिकाएं स्वयं ही निभाता है । कलाकार स्वयं ही गाता है, अभिनय करता है और तीव्र पदचापों के साथ नृत्य करता है । ओट्टन थुल्लल के ६४ स्थापित नाटकों के संग्रह में से 'गरुड़ गर्वभंगम' को कलात्मक दृष्टिकोण से अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है । इस नाटक में जब गरुड़ और हनुमान के बीच संवाद होता है, तो उसकी नाटकीय भाषा देखने और सुनने योग्य होती है । उदाहरण के लिए, गरुड़ जब हनुमान को अनादरपूर्वक संबोधित करते हैं और हनुमान जब उनके घमंड का उपहास उड़ाते हैं, तो वह संवाद आज भी ओट्टन थुल्लल के मंचन का सबसे बड़ा आकर्षण माना जाता है ।   

वेशभूषा और विशिष्ट रंगमंचीय श्रृंगार

ओट्टन थुल्लल में गरुड़ गर्वभंगम की प्रस्तुति के दौरान कलाकारों का श्रृंगार और वेशभूषा अत्यधिक विशिष्ट और आकर्षक होती है ।   

चेहरे का विशेष मेकअप: इस नृत्य को करने वाले कलाकार अपने चेहरे पर विशेष हरे रंग का मेकअप लगाते हैं । चेहरे का यह हरा रंग काफी हद तक कथकली के श्रृंगार से मिलता-जुलता है, जो सात्विकता और वीरता के भावों को प्रदर्शित करता है ।   

परिधान और आभूषण: कलाकार अत्यंत रंग-बिरंगे और घेरेदार परिधानों से सुसज्जित होते हैं । वे विशिष्ट प्रकार के सिर के आभूषण (हेडगियर) और सुंदर पारंपरिक आभूषण धारण करते हैं, जिससे उनके हाव-भाव और मुद्राएं दर्शकों को आकर्षित करती हैं ।   

वाद्ययंत्र और संगीत: ओट्टन थुल्लल के प्रदर्शन में मुख्य कलाकार के पीछे एक गायक समूह बैठता है जो मुख्य कलाकार द्वारा गाई गई पंक्तियों को दोहराता है । संगीत की संगति के लिए 'मृदंगम' (Mridangam) और 'इडक्का' (Edakka) जैसे पारंपरिक चर्म वाद्यों का प्रयोग किया जाता है, जो प्रदर्शन की लय और गति को नियंत्रित करते हैं ।   

अधिक जानकारी और कला रूपों के तुलनात्मक अध्ययन के लिए अथारवा एग्जामवाइज के पोर्टल पर उपलब्ध 'भारतीय लोक नृत्यों का वर्गीकरण' लेख को संदर्भित किया जा सकता है।

कथकली और भागवत मेला में कथा का शास्त्रीय रूपांतरण

यद्यपि ओट्टन थुल्लल में गरुड़ गर्वभंगम का मंचन अपनी व्यंग्यात्मक शैली और सरलता के लिए जाना जाता है, परंतु इस कथा को दक्षिण भारत की अधिक कठोर शास्त्रीय परंपराओं में भी रूपांतरित किया गया है ।   

कथकली में गरुड़ गर्वभंगम का प्रयोग

कथकली, जो कि केरल का अत्यंत प्रतिष्ठित और गंभीर शास्त्रीय नृत्य-नाट्य रूप है, में भी समय-समय पर नवीन प्रयोगों के अंतर्गत इस कथा को समाविष्ट किया गया है । उदाहरण के लिए, २०१६ में त्रिशूर में विनोद कुमार मुकुंदन द्वारा लिखित एक नए नाटक के रूप में कथकली शैली में 'गरुड़ गर्वभंगम' का सफलतापूर्वक मंचन किया गया था । कथकली के जटिल हस्तमुद्राओं (Mudras) और सूक्ष्म मुखाभिनय (Abhinaya) के माध्यम से जब गरुड़ के क्रोध, अहंकार और हनुमान के शांत व अपराजेय पराक्रम को दिखाया जाता है, तो वह दृश्य अत्यंत गंभीर और अलौकिक अनुभूति प्रदान करता है । कथकली में इसके मंचन के दौरान संवादों की तुलना में भावों की अभिव्यक्ति और शास्त्रीय रागों व तालों के सटीक संयोजन पर अधिक बल दिया जाता है ।   

तमिलनाडु का भागवत मेला परंपरा

इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु के तंजावुर क्षेत्र में प्रचलित 'भागवत मेला' (Bhagavata Mela) नामक प्राचीन नृत्य-नाटिका परंपरा में भी वैष्णव आख्यानों को प्रस्तुत करने का लंबा इतिहास रहा है । भागवत मेला मूलतः १६वीं शताब्दी में आंध्र प्रदेश से तमिलनाडु की ओर हुए कुचिपुड़ी कलाकारों के ऐतिहासिक प्रवासन से विकसित हुआ था, जब वे दक्कन क्षेत्र में इस्लामिक आक्रमणों के बाद विजयनगर साम्राज्य के पतन के उपरांत दक्षिण के तंजावुर नायक शासकों और मराठा राजाओं के संरक्षण में आ बसे थे । भागवत मेला में यद्यपि प्रह्लाद चरितम सबसे अधिक लोकप्रिय है, परंतु गरुड़ और हनुमान के वैष्णव संघर्षों पर आधारित छोटे प्रसंगों का मंचन भी इसके विस्तृत प्रदर्शनों में कभी-कभार देखने को मिलता है ।   

दक्षिण भारत की विभिन्न प्रदर्शनकारी कला विधाओं की विशिष्टताओं को समझने के लिए निम्नलिखित तुलनात्मक तालिका का विश्लेषण किया जा सकता है:

कला विधाउत्पत्ति एवं क्षेत्रमुख्य विशेषताप्रयोग किए जाने वाले वाद्यभाषा एवं प्रस्तुति शैली
ओट्टन थुल्लल१८वीं शताब्दी, केरलएकल अभिनय, व्यंग्य और हास्य का बाहुल्यमृदंगम और इडक्कासरल और बोलचाल की मलयालम
कथकली१७वीं शताब्दी, केरलसमूह नृत्य-नाट्य, जटिल हस्तमुद्राएंचेंडा और मद्दलमसंस्कृतनिष्ठ और प्रतीकात्मक अभिनय
भागवत मेला१६वीं शताब्दी, तमिलनाडुवार्षिक मंदिर उत्सव, शास्त्रीय अभिनयमृदंगम, बांसुरी और झांझकर्नाटक संगीत पर आधारित तेलुगु/तमिल

  

दक्कन क्षेत्र की मंदिर वास्तुकला में गरुड़-हनुमान द्वंद्व के साक्ष्य

नृत्य और नाटकों के अतिरिक्त, इतिहास के शोधकर्ताओं को दक्षिण भारत और विशेष रूप से दक्कन क्षेत्र के विभिन्न वैष्णव मंदिरों में गरुड़ और हनुमान के बीच के संघर्ष को दर्शाने वाली मध्यकालीन मूर्तिकला के भी प्रमाण मिले हैं । ये कलाकृतियां मुख्य रूप से रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य जैसे वैष्णव आचार्यों व आलवार संतों के भक्ति काल के दौरान निर्मित मानी जाती हैं ।   

इतिहासकारों के अनुसार, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के कई प्रमुख मंदिरों के दीवार-पैनलों (Wall Panels) पर गरुड़ और हनुमान को किसी अंडाकार वस्तु, फल या लिंगम जैसी संरचना को लेकर आपस में उलझते हुए दिखाया गया है । यद्यपि इन विशिष्ट मूर्तियों का कोई सीधा और स्पष्ट लिखित साक्ष्य मुख्य पुराणों में आसानी से नहीं मिलता, परंतु इन्हें लोक परंपराओं में प्रचलित 'गरुड़ गर्वभंगम' अथवा गरुड़ और हनुमान के अन्य किसी आनुषंगिक संघर्ष की कहानियों से जोड़कर देखा जाता है । अधिकांश मामलों में, ये मूर्तियां उन मंदिरों में पाई गई हैं जिनका निर्माण उस क्षेत्र के तत्कालीन शाही राजवंशों द्वारा प्रायोजित या संरक्षण प्राप्त था ।   

विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों पर प्राप्त इन मूर्तिशिल्पों का संक्षिप्त विवरण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत है:

मंदिर का नामस्थानराजवंश/कालमूर्तिकला की विशेषता
चेन्नाकेशव मंदिरबेलूर, कर्नाटकहोयसल राजवंशहनुमान और गरुड़ को एक अंडाकार वस्तु को लेकर लड़ते हुए दिखाया गया है
लक्ष्मी-नारायण मंदिरहरनहल्ली, कर्नाटकहोयसल राजा वीर सोमेश्वर (१२३५ ईस्वी)दो बंदर जैसी आकृतियों को फल पकड़े हुए दिखाया गया है
उग्र-नरसिंह मंदिरअहोबिलम, आंध्र प्रदेशकल्याणी के उत्तरकालीन चालुक्यदोनों ओर से आकृतियां लिंगम जैसी संरचना को पकड़े हुए हैं

  

यह पुरातात्विक साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि गरुड़ के अहंकार और हनुमान की श्रेष्ठता से जुड़े प्रसंग केवल मौखिक या नाट्य परंपरा तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि वे मध्यकालीन समाज में कलात्मक प्रेरणा के भी महत्वपूर्ण स्रोत रहे थे ।   

UPSC परीक्षा के दृष्टिकोण से दक्षिण भारत के मंदिर स्थापत्य को विस्तार से समझने के लिए हमारे लेख 'होयसल वास्तुकला की विशेषताएं' का अध्ययन अवश्य करें।

आधुनिक भारतीय सिनेमा में गरुड़ गर्वभंगम का स्थान

२०वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जब भारत में मूक फिल्मों से सवाक (बोलने वाली) फिल्मों का दौर प्रारंभ हुआ, तब पौराणिक कथाओं को चलचित्र के माध्यम से प्रस्तुत करने का एक नया माध्यम विकसित हुआ । 'गरुड़ गर्वभंगम' की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस विषय पर भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक काल में ही कई महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्माण हुआ था ।   

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस प्रसंग पर आधारित सबसे पहली मूक फिल्म का निर्माण १९२९ में ए. नारायणन द्वारा किया गया था । इसके पश्चात, १९३६ में तमिल भाषा में इसी नाम से एक सवाक फिल्म प्रदर्शित हुई जिसका निर्देशन आर. पद्मनाभन ने किया था । यह फिल्म तमिल सिनेमाई इतिहास में पौराणिक विषयों पर आधारित शुरुआती टॉकीज फिल्मों में से एक मानी जाती है । इसके बाद, १९४३ में प्रसिद्ध फिल्म निर्माता घंटसाल बालरामय्या ने तेलुगु भाषा में इसी शीर्षक से एक पुनर्रचना (Remake) फिल्म का निर्माण किया, जिसमें प्रसिद्ध अभिनेत्री पी. भानुमति और विख्यात कुचिपुड़ी नृत्यांगना वेदांतम राघवय्या ने अभिनय किया था ।   

सिनेमा के क्षेत्र में शास्त्रीय नृत्य गुरुओं जैसे वेदांतम राघवय्या का जुड़ना एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मोड़ था । राघवय्या स्वयं कुचिपुड़ी के एक महान प्रतिपादक थे और उन्होंने रंगमंच से फिल्मों में आकर नृत्य निर्देशन के माध्यम से शास्त्रीय तत्वों को जनमानस तक पहुंचाने में महती भूमिका निभाई । इस प्रकार, एक प्राचीन मंदिर परंपरा से आरंभ होकर यह प्रसंग आधुनिक युग की सबसे शक्तिशाली दृश्य-श्रव्य तकनीक यानी सिनेमा के पर्दे तक सफलतापूर्वक पहुंच गया ।   

मुख्य बिंदु एवं परीक्षा-उपयोगी तथ्य

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे गंभीर अभ्यर्थियों की त्वरित समीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्यों को नीचे बिंदुवार संकलित किया गया है:

गरुड़ गर्वभंगम का मूल अर्थ: भगवान विष्णु के दिव्य वाहन गरुड़ के अहंकार को नष्ट करने की पौराणिक कथा पर आधारित नृत्य-नाट्य।

कलाकारों की वेशभूषा: कलाकार विशेष हरे रंग के मेकअप, पंखों से सुसज्जित पोशाक, आभूषण और मुकुट धारण करते हैं ।   

ओट्टन थुल्लल का उद्भव: १८वीं शताब्दी में कवि और मिझावु वादक कुंचन नांबियार द्वारा चाक्यार कूथु के विकल्प के रूप में विकसित किया गया ।   

थुल्लल की विशेषता: यह एक एकल नृत्य शैली है जिसमें हास्य और सामाजिक व्यंग्य का प्रचुर पुट होता है ।   

कथकली से तुलना: कथकली एक जटिल हस्तमुद्राओं वाली शास्त्रीय विधा है, जबकि ओट्टन थुल्लल अधिक जीवंत, बोलचाल की भाषा वाली और मनोरंजक विधा है ।   

वास्तुकला में साक्ष्य: कर्नाटक के बेलूर में होयसल कालीन चेन्नाकेशव मंदिर तथा आंध्र प्रदेश के अहोबिलम में उग्र-नरसिंह मंदिर में गरुड़ और हनुमान के संघर्ष के शिल्प उत्कीर्ण हैं ।   

सिनेमाई इतिहास: गरुड़ गर्वभंगम पर आधारित प्रथम तमिल सवाक फिल्म १९३६ में और तेलुगु फिल्म १९४३ में बनी थी, जो प्रारंभिक भारतीय सिनेमा के विकास को दर्शाती है ।   

Why this matters for your exam preparation

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य राज्य स्तरीय प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यह विषय बहुआयामी महत्व रखता है।

१. सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-१ (कला एवं संस्कृति): यूपीएससी की मुख्य परीक्षा के पाठ्यक्रम में प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के कला रूपों, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलुओं को शामिल किया गया है 。'गरुड़ गर्वभंगम' जैसे विशिष्ट प्रसंग का अध्ययन कर अभ्यर्थी लोक कला (जैसे ओट्टन थुल्लल) और शास्त्रीय कला (जैसे कथकली और भागवत मेला) के बीच के सूक्ष्म अंतर और उनके आपसी संबंधों को गहराई से समझ सकते हैं । परीक्षा में लोक कलाओं के सामाजिक महत्व पर सीधे प्रश्न पूछे जाते रहे हैं, जहां कुंचन नांबियार द्वारा समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार करने के लिए इस कला के उपयोग का उदाहरण देकर एक उत्कृष्ट उत्तर प्रस्तुत किया जा सकता है 。   

२. प्रारंभिक परीक्षा (Prelims - Art & Culture): प्रारंभिक परीक्षा में अक्सर विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों से जुड़ी प्रदर्शनकारी कलाओं, उनकी उत्पत्ति, वाद्ययंत्रों और उनके रचनाकारों से संबंधित वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाते हैं 。जैसे कि कुंचन नांबियार और ओट्टन थुल्लल का संबंध, या फिर होयसल राजवंश के मंदिरों में प्रदर्शित विशिष्ट मूर्तिकला के रूपांकन 。यह रिपोर्ट अभ्यर्थियों को सटीक और प्रामाणिक डेटा प्रदान करती है ताकि वे ऐसे जटिल कूट आधारित प्रश्नों को आसानी से हल कर सकें।   

३. निबंध एवं साक्षात्कार: भारतीय विरासत का दार्शनिक मूल्य, जैसे कि अहंकार का पतन और सेवा भावना का उदय, निबंध के दार्शनिक विषयों में एक सशक्त उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकता है。साथ ही, साक्षात्कार के दौरान भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) पर चर्चा करते समय ऐसे क्षेत्रीय कला रूपों का ज्ञान अभ्यर्थी की सांस्कृतिक सजगता और विस्तृत अध्ययन को प्रदर्शित करता है 。   

अतः अभ्यर्थियों को सलाह दी जाती है कि वे कला और संस्कृति से संबंधित समसामयिक विषयों का अध्ययन करते समय उनके ऐतिहासिक विकासक्रम, क्षेत्रीय विविधताओं और पुरातात्विक साक्ष्यों के अंतर्संबंधों पर विशेष ध्यान दें ।