भारत का सेमीकंडक्टर मिशन 2.0: Current Affairs April 2 2026 Daily GK Update Atharva Examwise Current News Competitive Exam News Today

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भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम की पृष्ठभूमि और रणनीतिक महत्व

भारत सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के दूसरे चरण (ISM 2.0) के लिए ₹1.20 लाख करोड़ के विशाल बजटीय परिव्यय को मंजूरी देना देश के विनिर्माण और तकनीकी परिदृश्य में एक युगांतकारी परिवर्तन का संकेत देता है । वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में अर्धचालक यानी सेमीकंडक्टर किसी भी देश की संप्रभुता और आर्थिक सुरक्षा के लिए अपरिहार्य बन गए हैं । आधुनिक युग में स्मार्टफोन से लेकर उन्नत लड़ाकू विमानों, इलेक्ट्रिक वाहनों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के डेटा केंद्रों तक, प्रत्येक क्षेत्र में इन छोटे सिलिकॉन चिप्स की केंद्रीय भूमिका होती है । वर्तमान में भारत अपनी सेमीकंडक्टर आवश्यकताओं का लगभग 85% से 90% हिस्सा आयात करता है, जो देश को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के व्यवधानों और भू-राजनीतिक तनावों के प्रति संवेदनशील बनाता है ।   

भारत में सेमीकंडक्टर की मांग जो वर्तमान में लगभग $30 से $35 बिलियन है, उसके वर्ष 2030 तक बढ़कर $100 से $110 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है । इस भारी मांग और आयात पर अत्यधिक निर्भरता को देखते हुए, केंद्र सरकार ने भारत को सेमीकंडक्टर विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार की है । केंद्रीय कैबिनेट के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजे जाने से पहले यह प्रस्ताव आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के दृष्टिकोण को गति देने में मील का पत्थर साबित होगा ।   

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 1.0 बनाम 2.0: एक क्रमिक और रणनीतिक विकास

इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के पहले चरण (ISM 1.0) की शुरुआत दिसंबर 2021 में ₹76,000 करोड़ के कुल वित्तीय परिव्यय के साथ की गई थी । प्रथम चरण का प्राथमिक उद्देश्य भारत में विनिर्माण की बुनियादी नींव रखना और वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करना था । इस मिशन के अंतर्गत सरकार परियोजना लागत का 50% तक वित्तीय सहायता प्रदान कर रही थी, जिसके परिणामस्वरूप लगभग ₹1.60 लाख करोड़ के संचयी निवेश प्रस्तावों वाली 10 बड़ी परियोजनाओं को स्वीकृति मिली ।   

पहले चरण में देश ने सेमीकंडक्टर असेंबली, परीक्षण और पैकेजिंग (OSAT) तथा कुछ बुनियादी स्तर के फैब्रिकेशन यूनिट्स की स्थापना पर ध्यान केंद्रित किया था । हालांकि, ISM 2.0 का आगमन देश के दृष्टिकोण में एक बड़े रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है । द्वितीय चरण का पूरा ध्यान मात्र कारखाने लगाने पर न होकर अनुसंधान एवं विकास (R&D), स्वदेशी चिप डिजाइनिंग, बौद्धिक संपदा (IP) निर्माण और नवाचार पर केंद्रित होगा । यह बदलाव दर्शाता है कि भारत अब केवल असेंबली हब बनने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि मूल्य श्रृंखला के शीर्ष स्तर पर अपनी जगह बनाना चाहता है ।   

ISM 1.0 और ISM 2.0 की मुख्य विशेषताओं और रणनीतिक उद्देश्यों की तुलना नीचे दी गई तालिका में की गई है:

विशेषताइंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 1.0इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0
वित्तीय आवंटन₹76,000 करोड़₹1.20 लाख करोड़
रणनीतिक फोकसविनिर्माण प्रोत्साहन, आधारभूत ढांचा और असेंबलीआरएंडडी (R&D), चिप डिजाइन और उन्नत तकनीकी नवाचार
तकनीकी लक्ष्यपरिपक्व नोड्स और परीक्षण इकाइयां (OSAT)3 नैनोमीटर और 2 नैनोमीटर जैसी उन्नत चिप प्रौद्योगिकियां
पारिस्थितिकी तंत्र का दायराविनिर्माण सुविधाओं को आकर्षित करनापूरी मूल्य श्रृंखला (Value Chain) का विकास
डिजाइन समर्थनसीमित डिजाइन-लिंक्ड प्रोत्साहनकम से कम 50 फैबलेस कंपनियों का समर्थन

  

स्वीकृत परियोजनाएं और क्षेत्रीय औद्योगिक विकास का मानचित्र

ISM 1.0 के अंतर्गत स्वीकृत की गई 10 परियोजनाओं ने देश भर के विभिन्न राज्यों में औद्योगिक संकुलों का मार्ग प्रशस्त किया है । इन परियोजनाओं के माध्यम से गुजरात, असम, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में उच्च-तकनीकी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का प्रसार हो रहा है । इन परियोजनाओं का वर्गीकरण मुख्य रूप से 'आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट' (OSAT) और फैब्रिकेशन यूनिट्स (Fabs) के रूप में किया गया है । OSAT इकाइयों को कम पूंजी की आवश्यकता होती है और ये लगभग 18 से 24 महीनों में चालू होकर राजस्व देना शुरू कर देती हैं, जबकि पूर्ण फैब्रिकेशन यूनिट्स के निर्माण में अधिक समय और पूंजी लगती है ।   

निम्नलिखित तालिका प्रथम चरण के अंतर्गत स्वीकृत की गई 10 प्रमुख परियोजनाओं की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करती है:

कंपनी / उद्यमस्थानपरियोजना का प्रकारनिवेश (₹ करोड़ में)अपेक्षित कमीशनिंग काल
माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron)सानंद, गुजरातOSAT₹22,5162025–2026
टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स–PSMCधोलेरा, गुजरातलॉजिक फैब (50k वेफर्स/माह)₹91,0002027–2029
CG पावर–रेनेसास–स्टार्स्ससानंद, गुजरातOSAT (15M चिप्स/दिन)₹7,600व्यावसायिक 2026
टाटा सेमीकंडक्टर (TSAT)मोरीगांव, असमOSAT (48M चिप्स/दिन)₹27,000चरण 1 अप्रैल 2026
कायन्स सेमीकंडक्टर (Kaynes)सानंद, गुजरातOSAT (6.33M चिप्स/दिन)₹3,307परिचालन गतिशीलता पर
HCL–फॉक्सकॉन संयुक्त उद्यमजेवर, उत्तर प्रदेशOSAT (20k वेफर्स/माह)₹3,7002026–2027
सिक्ससेम (SicSem)भुवनेश्वर, ओडिशासिलिकॉन कार्बाइड फैब₹2,0662027 के बाद
3D ग्लास सॉल्यूशंसभुवनेश्वर, ओडिशाउन्नत पैकेजिंग₹1,9432027 के बाद
कॉन्टिनेंटल डिवाइस (CDIL)मोहाली, पंजाबOSAT₹1172026–2027
ASIP टेक्नोलॉजीजआंध्र प्रदेशउन्नत पैकेजिंग₹4682026–2027

  

यह विशाल निवेश पाइपलाइन दर्शाती है कि भारत केवल कागजों पर योजनाएं नहीं बना रहा है बल्कि धरातल पर कंक्रीट की संरचनाओं का निर्माण भी शुरू हो चुका है । टाटा और पीएसएमसी ताइवान के मध्य हुआ समझौता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत को लॉजिक फैब क्षेत्र में स्थापित करने की दिशा में सबसे बड़ा एकल निजी निवेश है ।   

उन्नत चिप नोड्स की ओर छलांग: 3 नैनोमीटर और 2 नैनोमीटर प्रौद्योगिकियों का महत्व

ISM 2.0 का सबसे साहसिक और तकनीकी रूप से उन्नत पहलू भारत में 3-नैनोमीटर (3nm) और 2-नैनोमीटर (2nm) जैसी अग्रणी चिप निर्माण तकनीकों के विकास को प्रोत्साहित करना है । सेमीकंडक्टर के संदर्भ में, नोड का आकार जितना छोटा होता है, उस चिप की कार्यक्षमता उतनी ही अधिक होती है। नैनोमीटर स्केल में कमी का अर्थ है कि सिलिकॉन वेफर पर अरबों अतिरिक्त ट्रांजिस्टर समाहित किए जा सकते हैं, जिससे प्रसंस्करण शक्ति बढ़ती है और बिजली की खपत न्यूनतम हो जाती है।   

वर्तमान में 3nm और 2nm चिप्स का उपयोग अत्यंत उन्नत क्षेत्रों जैसे सुपरकंप्यूटिंग, जटिल AI मॉडल के प्रशिक्षण, अत्याधुनिक स्वायत्त वाहनों और अगली पीढ़ी के उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स में किया जाता है । इस क्षेत्र में प्रवेश करके भारत सीधे तौर पर ताइवान (TSMC) और दक्षिण कोरिया (Samsung) जैसी वैश्विक महाशक्तियों के एकाधिकार को चुनौती देने की आकांक्षा रखता है ।   

हालांकि, इस लक्ष्य को प्राप्त करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण है । 2nm और 3nm चिप्स के निर्माण के लिए अत्यधिक पूंजी-गहन 'एक्सट्रीम अल्ट्रावॉयलेट' (EUV) लिथोग्राफी मशीनों की आवश्यकता होती है, जो वैश्विक स्तर पर केवल एक ही कंपनी (ASML) द्वारा निर्मित की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, इन कारखानों को चलाने के लिए अत्यंत शुद्ध रसायनों और विशेष गैसों की निर्बाध आपूर्ति की आवश्यकता होती है । इसलिए, ISM 2.0 के तहत न केवल कारखाने के निर्माण पर बल्कि इन सहायक रसायनों की घरेलू मूल्य श्रृंखला और आपूर्ति प्रणालियों को सुदृढ़ करने पर भी विशेष बल दिया गया है ।   

वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बजटीय आवंटन और उप-योजनाएं

केंद्र सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए केंद्रीय बजट 2026-27 में इस पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए ठोस वित्तीय प्रावधान किए हैं । भारत सरकार द्वारा सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए जारी किए गए बजटीय आवंटन की संरचना इस प्रकार है:   

योजना / कार्यक्रमवित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बजटीय प्रावधान
इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 (प्रारंभिक प्रावधान)₹1,000 करोड़
संशोधित सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले फैब पारिस्थितिकी तंत्र कार्यक्रम₹8,000 करोड़
सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी (SCL) मोहाली का आधुनिकीकरण₹900 करोड़
इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स विनिर्माण योजना (ECMS)₹1,500 करोड़

  

यह ध्यान देने योग्य है कि मोहाली स्थित सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी (SCL) के आधुनिकीकरण के लिए सरकार ने अगले तीन वर्षों में कुल ₹4,500 करोड़ का निवेश करने का निर्णय लिया है, जिसमें से ₹900 करोड़ का प्रावधान चालू वित्तीय वर्ष के लिए किया गया है । SCL मोहाली देश की एकमात्र ऐसी एकीकृत सुविधा है जो रक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान और एयरोस्पेस क्षेत्र के लिए अत्यंत विशिष्ट 'एप्लीकेशन-स्पेसिफिक इंटीग्रेटेड सर्किट्स' (ASIC) का उत्पादन करती है । इसका आधुनिकीकरण भारत को रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक स्वायत्तता प्रदान करने में अत्यधिक सहायता करेगा ।   

इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स विनिर्माण योजना (ECMS) के तहत सरकार का बजट पूर्व के ₹22,919 करोड़ से बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ किया जा चुका है । इस योजना ने वैश्विक और घरेलू निवेशकों के बीच भारी उत्साह पैदा किया है, जिससे छह वर्षों में ₹10.34 लाख करोड़ मूल्य के उत्पादन की उम्मीदें बंधी हैं ।   

फैबलेस डिजाइन इकोसिस्टम और प्रतिभा संवर्धन

अर्धचालक उद्योग की वास्तविक मूल्य श्रृंखला में फैब्रिकेशन यूनिट्स की तुलना में चिप डिजाइनिंग में अधिक मूल्य संवर्धन और लाभप्रदता होती है। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए, ISM 2.0 डिजाइन लिंक्ड प्रोत्साहन (DLI) योजना के विस्तार पर जोर देता है । सरकार का लक्ष्य कम से कम 50 ऐसी स्वदेशी 'फैबलेस' कंपनियों का पोषण करना है जो चिप्स के डिजाइन और बौद्धिक संपदा का स्वामित्व तो रखेंगी, लेकिन उनके निर्माण का कार्य वैश्विक फाउंड्रीज को आउटसोर्स करेंगी ।   

इस योजना के सकारात्मक परिणाम पहले ही दिखने लगे हैं, क्योंकि देश के 24 स्टार्टअप्स को इस योजना के तहत वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान की गई है । शैक्षणिक स्तर पर सुधार लाने के लिए देश के 350 विश्वविद्यालयों को उन्नत इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल्स तक पहुंच प्रदान की गई है । इससे लगभग 65,000 युवा छात्र इंजीनियरों को आधुनिक औद्योगिक मानकों पर चिप्स डिजाइन करने का व्यवहारिक अनुभव प्राप्त हो रहा है । यह प्रतिभा निर्माण भारत को भविष्य में एक वैश्विक डिजाइन केंद्र के रूप में स्थापित करने की आधारशिला बनेगा ।   

मानव संसाधन की चुनौतियां और कौशल अंतराल

यद्यपि भारत प्रतिवर्ष 15 लाख से अधिक इंजीनियरिंग स्नातक तैयार करता है, परंतु सेमीकंडक्टर जैसे अति-विशिष्ट क्षेत्र के लिए आवश्यक कौशल की भारी कमी है । उद्योग के अनुमानों के अनुसार, देश के सेमीकंडक्टर उद्योग को वर्तमान के 3,45,000 पेशेवरों से बढ़ाकर 2030 तक 4,60,000 पेशेवरों की आवश्यकता होगी ।   

यदि शिक्षा प्रणाली में त्वरित और लक्षित सुधार नहीं किए गए, तो वर्ष 2030 तक लगभग 67,000 तकनीकी पद केवल योग्य उम्मीदवारों की अनुपलब्धता के कारण खाली रह सकते हैं । इस कौशल अंतराल को पाटने के लिए सरकार ने आगामी 10 वर्षों में 85,000 सेमीकंडक्टर पेशेवरों को विशेष रूप से प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा है । भारतीय स्टार्टअप्स द्वारा वर्तमान में उन्नत चिप निर्माण के लिए ताइवान की टीएसएमसी (TSMC) और दक्षिण कोरिया की डीबी हाई-टेक (DB Hi-Tek) जैसी वैश्विक फाउंड्रीज का सहारा लिया जा रहा है । यदि भारत में ही इन कौशलों का विकास होता है, तो देश का पैसा देश में ही रहेगा और स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।   

भू-राजनीतिक संदर्भ और रणनीतिक स्वायत्तता

भारत द्वारा सेमीकंडक्टर क्षेत्र में उठाया गया यह ₹1.20 लाख करोड़ का कदम किसी शून्य में नहीं लिया गया है, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीतिक स्पर्धा का सीधा परिणाम है । कोविड-19 महामारी और उसके बाद उपजी भू-राजनीतिक अस्थिरता ने दुनिया को यह सिखा दिया है कि महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए किसी एक भौगोलिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता आत्मघाती हो सकती है।   

यही कारण है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने 'चिप्स एंड साइंस एक्ट' के माध्यम से सैकड़ों अरब डॉलर की सब्सिडी प्रदान की है और यूरोपीय संघ ने भी इसी प्रकार का अपना चिप्स कानून लागू किया है । भारत सरकार का मिशन इस वैश्विक होड़ में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने का एक प्रयास है, जो चीन से परे अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं का विविधीकरण करना चाहती हैं ।   

प्रमुख तथ्य और परीक्षा-उन्मुख डेटा

प्रतियोगी परीक्षाओं में सीधे पूछे जाने वाले तथ्यों को रेखांकित करने के लिए निम्नलिखित डेटा बिंदुओं का अवलोकन अत्यंत आवश्यक है:

ISM 2.0 का वित्तीय परिव्यय: केंद्र सरकार द्वारा इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के लिए ₹1.20 लाख करोड़ की कुल राशि मंजूर की गई है ।   

ISM 1.0 का बजट और उपलब्धियां: प्रथम चरण में ₹76,000 करोड़ का आवंटन था, जिसके तहत ₹1.60 लाख करोड़ के निवेश वाली 10 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई ।   

भारत की वर्तमान आयात निर्भरता: देश अपनी कुल सेमीकंडक्टर आवश्यकताओं का 85% से 90% हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है ।   

भविष्य का मांग अनुमान: भारत में चिप्स की मांग वर्तमान के $30-$35 बिलियन से बढ़कर वर्ष 2030 तक $100-$110 बिलियन तक पहुंच जाएगी ।   

उन्नत नोड्स का लक्ष्य: ISM 2.0 का मुख्य फोकस कारखानों के अलावा 3 नैनोमीटर और 2 नैनोमीटर के उन्नत चिप नोड्स का विकास करना है ।   

मानव संसाधन लक्ष्य: सरकार आगामी 10 वर्षों में 85,000 विशिष्ट सेमीकंडक्टर पेशेवरों का एक मजबूत कार्यबल तैयार करना चाहती है ।   

विश्वविद्यालयों का एकीकरण: चिप डिजाइनिंग को बढ़ावा देने के लिए 350 विश्वविद्यालयों को एडा (EDA) टूल्स प्रदान किए गए हैं, जिससे 65,000 इंजीनियर लाभान्वित हो रहे हैं ।   

अहम परियोजना: गुजरात के धोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की पीएसएमसी मिलकर ₹91,000 करोड़ की लागत से भारत का सबसे बड़ा लॉजिक फैब स्थापित कर रही हैं ।   

रणनीतिक सरकारी इकाई: पंजाब के मोहाली में स्थित सेमीकंडक्टर लेबोरेटरी (SCL) को आधुनिक बनाने के लिए अगले तीन वर्षों में ₹4,500 करोड़ खर्च किए जाएंगे ।   

निष्कर्ष

संक्षेप में, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 के तहत ₹1.20 लाख करोड़ का निवेश भारत के इतिहास में तकनीकी आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए उठाया गया अब तक का सबसे बड़ा और साहसिक कदम है । यद्यपि ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे स्थापित दिग्गजों से प्रतिस्पर्धा करना और प्रतिभाओं की कमी को दूर करना एक बड़ी चुनौती है, परंतु सरकार की क्रमिक और सुविचारित नीतियां सही दिशा में अग्रसर हैं । यह मिशन केवल विनिर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के संपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ को मजबूत करने का कार्य करेगा ।   

(UPSC पाठ्यक्रम और अन्य सामग्री के लिए अभ्यार्थी अथर्व एग्जामवाइज करेंट अफेयर्स का संदर्भ ले सकते हैं। सरकारी घोषणाओं के विस्तृत ब्यौरे के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट का अवलोकन किया जा सकता है।)

Why this matters for your exam preparation

यह खंड विशेष रूप से संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य राज्य स्तरीय प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रहे गंभीर अभ्यर्थियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस पूरे विषय को परीक्षा की दृष्टि से निम्नलिखित आयामों में विभाजित किया जा सकता है:

UPSC सामान्य अध्ययन पेपर 3 (GS Paper III): भारतीय अर्थव्यवस्था और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

औद्योगिक नीति और विनिर्माण: मुख्य परीक्षा में अक्सर सरकार की औद्योगिक नीतियों और 'मेक इन इंडिया' की सफलता पर प्रश्न पूछे जाते हैं । अभ्यर्थी इस डेटा का उपयोग यह समझाने के लिए कर सकते हैं कि भारत कैसे कम मूल्य वाले विनिर्माण से उच्च मूल्य वाले नवाचार-आधारित विनिर्माण की ओर बढ़ रहा है ।   

आत्मनिर्भरता और आयात प्रतिस्थापन: भारत की ऊर्जा और इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा का विश्लेषण करते समय, सेमीकंडक्टर में 85-90% की वर्तमान आयात निर्भरता और उसे कम करने के सरकारी प्रयासों (जैसे ISM 2.0) का उल्लेख उत्तर को अधिक समृद्ध बनाएगा ।   

कौशल विकास: भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) से संबंधित प्रश्नों में 2030 तक सेमीकंडक्टर क्षेत्र में होने वाली 67,000 पेशेवरों की कमी का उदाहरण देकर शिक्षा और उद्योग के बीच मौजूद अंतराल को स्पष्ट किया जा सकता है ।   

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: नैनो टेक्नोलॉजी के अनुप्रयोगों पर पूछे जाने वाले प्रश्नों में 3nm और 2nm चिप्स के निर्माण की चुनौतियों और उनके महत्व का तकनीकी रूप से उल्लेख किया जाना चाहिए ।   

UPSC सामान्य अध्ययन पेपर 2 (GS Paper II): शासन व्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

भू-राजनीति और आपूर्ति श्रृंखला कूटनीति: वैश्विक स्तर पर चल रहे 'चिप युद्ध' (Chip War) और अमेरिका के चिप्स एक्ट के प्रत्युत्तर में भारत की रणनीति का विश्लेषण अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के दृष्टिकोण से अत्यंत प्रासंगिक है । भारत 'क्वाड' (QUAD) जैसे समूहों में सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला को लेकर हो रही चर्चाओं में एक प्रमुख हितधारक के रूप में उभर रहा है।   

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) के लिए संभावित प्रश्न: प्रारंभिक परीक्षा के दृष्टिकोण से ISM 2.0 का वित्तीय परिव्यय (₹1.20 लाख करोड़), डिजाइन-लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना, और सानंद या धोलेरा जैसे स्थानों पर स्थापित हो रही परियोजनाओं के प्रकार सीधे बहुविकल्पीय प्रश्नों का आधार बन सकते हैं । अभ्यर्थियों को सलाह दी जाती है कि वे इन आंकड़ों और सरकारी पहलों को अपनी अध्ययन सामग्री में अनिवार्य रूप से शामिल करें।