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मार्च 2025 की सामयिक घटनाओं में बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर प्रभाव का विश्लेषण करें – UPSC व अन्य परीक्षाओं के लिए उपयोगी।

बांग्लादेश का राजनीतिक संकट: दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों की स्थिति का प्रतिबिंब

अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद, बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर हुई हिंसक घटनाओं ने एक बार फिर दक्षिण एशिया में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता खड़ी कर दी है। यह विषय UPSC, SSC, बैंकिंग व अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से अंतरराष्ट्रीय संबंध, विभाजन की राजनीति और मार्च 2025 की सामयिक खबरों के संदर्भ में।

भारत विभाजन की विरासत और अल्पसंख्यकों का प्रश्न: अतीत और वर्तमान

विभाजन: एक अनसुलझी विरासत

1947 में भारत का विभाजन हिंदू-मुस्लिम विवाद का हल माना गया था।

परंतु, इसने साम्प्रदायिक तनाव, जबरन पलायन और स्थायी अस्थिरता को जन्म दिया।

विभाजन ने मोहाजिर (पाकिस्तान में) और बांग्लादेशी शरणार्थियों (भारत में) जैसी नई पहचानें बनाईं।

कश्मीर मुद्दा आज भी उसी विभाजन की विरासत है।

आज भी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय असुरक्षा के दौर से गुजर रहे हैं।

नेहरू-लियाकत अली समझौता: एक अधूरा प्रयास

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

विभाजन के बाद साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने हेतु 1950 में भारत और पाकिस्तान के बीच ‘नेहरू-लियाकत अली समझौता’ हुआ, जिसका उद्देश्य था:

दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की रक्षा सुनिश्चित करना

संभावित युद्ध को रोकना

सीमापार शरणार्थी संकट का समाधान

समझौते की असफलता

यह समझौता पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में बंगाली मुसलमानों की रक्षा नहीं कर सका।

अंततः 1971 में बांग्लादेश का निर्माण हुआ।

दो-राष्ट्र सिद्धांत के तहत तीन राष्ट्र अस्तित्व में आए।

बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति: बढ़ती चिंता

वर्तमान परिदृश्य (मार्च 2025)

शेख हसीना की सत्ता से विदाई के बाद, हिंदू समुदाय के विरुद्ध हिंसा में वृद्धि देखी गई है।

सवाल यह उठता है: क्या यह राजनीतिक हिंसा है या नवीन धार्मिक उत्पीड़न की शुरुआत?

भारत की बांग्लादेश नीति पर भी आलोचना हो रही है क्योंकि:

यह अत्यधिक रूप से एक परिवार/दल पर केंद्रित रही है।

अब ज़रूरत है कि भारत सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व से नहीं, बल्कि बांग्लादेश की जनता और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़ाव बनाए।

दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक अधिकार: साझा ज़िम्मेदारी

क्षेत्रीय दृष्टिकोण

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति आपस में जुड़ी हुई है

धार्मिक पक्षधरता – जैसे कि भारतीय हिंदू केवल बांग्लादेशी हिंदुओं की चिंता करें, या पाकिस्तानी मुसलमान सिर्फ भारतीय मुसलमानों की – अल्पसंख्यक अधिकारों के समग्र दृष्टिकोण को कमजोर करती है।

यह प्रवृत्ति:

बहुसंख्यकवादी राजनीति को बढ़ावा देती है

सीमापार तनाव को जन्म देती है

हिंसा और घृणा के वातावरण को वैधता प्रदान करती है

आगे की राह

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए नई राजनीतिक भाषा और संस्थाओं की आवश्यकता है

पूरे क्षेत्र में धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक संरचना को मज़बूत करना होगा

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को स्थायी और पारदर्शी पहलें करनी होंगी

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुख्य बिंदु

अगस्त 2024 में शेख हसीना को हटाया गया

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हिंसा की घटनाओं में इज़ाफा

नेहरू-लियाकत अली समझौता (1950) का उद्देश्य अल्पसंख्यक सुरक्षा था

विभाजन की विरासत आज भी दक्षिण एशिया की राजनीति को प्रभावित करती है

भारत-बांग्लादेश संबंधों में अब लोकतांत्रिक भागीदारी की आवश्यकता है

क्षेत्रीय स्थिरता के लिए समान और न्यायपूर्ण अल्पसंख्यक नीतियाँ ज़रूरी हैं

यह विषय परीक्षाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

UPSC, SSC, बैंकिंग व अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से यह विषय निम्नलिखित क्षेत्रों से संबंधित है:

मार्च 2025 की सामयिक घटनाएँ (Current Affairs)

भारत के पड़ोसी देशों से संबंध (Neighbourhood Policy)

विभाजन और उसके प्रभाव (Partition & Its Legacies)

अल्पसंख्यक अधिकार और धर्मनिरपेक्षता (Secularism & Minorities)

यह विषय निबंध, एथिक्स, GS पेपर 2 और 3, तथा साक्षात्कार चरण में उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

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