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भारत ने घेपन झील पर पहली हिमनदी बाढ़ चेतावनी प्रणाली स्थापित की: यूपीएससी करेंट अफेयर्स 24 अक्टूबर 2026, दैनिक जीके अपडेट | अथर्व एग्जाम वाइज करेंट न्यूज भारत ने घेपन झील पर पहली हिमनदी बाढ़ चेतावनी प्रणाली स्थापित की: यूपीएससी करेंट अफेयर्स 24 अक्टूबर 2026, दैनिक जीके अपडेट | अथर्व एग्जाम वाइज करेंट न्यूज

24 Oct 2026 24 Oct 2026

भारत ने घेपन झील पर पहली हिमनदी बाढ़ चेतावनी प्रणाली स्थापित की: यूपीएससी करेंट अफेयर्स 24 अक्टूबर 2026, दैनिक जीके अपडेट | अथर्व एग्जाम वाइज करेंट न्यूज
Science & Technology Hindi 24 Oct 2026

भारत ने घेपन झील पर पहली हिमनदी बाढ़ चेतावनी प्रणाली स्थापित की: यूपीएससी करेंट अफेयर्स 24 अक्टूबर 2026, दैनिक जीके अपडेट | अथर्व एग्जाम वाइज करेंट न्यूज

उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) की दिशा में एक अग्रणी कदम उठाते हुए, भारत ने हिमाचल प्रदेश की घेपन घाट हिमनदी झील (Ghepan Ghat glacial lake) पर अपनी पहली स्वचालित हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ (Glacial Lake Outburst Flood - GLOF) प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) को पूर्णतः चालू कर दिया है। पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील लाहौल और स्पीति जिले में समुद्र तल से लगभग 4,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह प्रणाली लगातार विस्तार ले रही एक ऐसी अग्र-हिमनदीय (proglacial) जल संरचना पर निरंतर संवेदी निगरानी स्थापित करती है, जो निचले इलाकों के लिए गंभीर बाढ़ का खतरा पैदा करती है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) द्वारा वित्तपोषित एक पायलट परियोजना के हिस्से के रूप में सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) द्वारा विकसित इस प्रणाली में वास्तविक समय के पर्यावरणीय सेंसरों को उच्च-प्रदर्शन कम्प्यूटेशनल मॉडलिंग के साथ एकीकृत किया गया है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यह पहल निष्क्रिय उपग्रह निगरानी (passive satellite surveillance) से सक्रिय, स्वस्थाने (in-situ) प्रारंभिक चेतावनी टेलीमेट्री की ओर भारत के बढ़ते रणनीतिक कदम को दर्शाती है। अथर्व एग्जाम वाइज करेंट अफेयर्स के इस विश्लेषण के अनुसार, घेपन घाट पर की गई यह स्थापना व्यापक हिमालयी नदी घाटियों में क्रायोस्फेरिक (हिमावरण) जोखिमों को कम करने के लिए एक मजबूत प्रोटोटाइप प्रस्तुत करती है।

घेपन घाट झील की भौगोलिक और जलवैज्ञानिक रूपरेखा

घेपन घाट हिमनदी झील हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में, पीर पंजाल और वृहद हिमालयी श्रेणियों के उच्च-तुंगता वाले पर्वतीय भूभाग में स्थित है। यह झील पार्श्विक (lateral) और अंतस्थ (terminal) हिमोढ़ों (moraines) द्वारा घिरी हुई है और माउंट गिपन गो (Mount Gipan Go) पर्वत पुंज से पिघलने वाले तीन अलग-अलग लटकते हिमनदों (hanging glaciers) से जल प्राप्त करती है। बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण हिमनदों के तेजी से पीछे खिसकने (glacial retreat) से झील के बेसिन का लगातार विस्तार हुआ है, जिसमें अब अनुमानित रूप से 35.08 मिलियन घन मीटर पिघला हुआ जल संचित है।

घेपन घाट से जल का निकास दक्षिण-पश्चिम दिशा में सिस्सू नाले (Sissu Nullah) के माध्यम से होता है। यह तीव्र ढलान वाला नाला तेजी से नीचे उतरते हुए सिस्सू गांव के पास चंद्रा नदी में समाहित हो जाता है। सिस्सू से आगे downstream में, चंद्रा नदी तांडी (Tandi) में भागा नदी से मिलकर चंद्रभागा बनाती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चेनाब नदी के नाम से जाना जाता है—जो सिंधु नदी तंत्र की एक प्रमुख सीमापार सहायक नदी है।

चूंकि यह झील सिस्सू के ठीक ऊपरी प्रवाह (upstream) में स्थित है, इसलिए असंगठित हिमोढ़ बांध के अचानक टूटने से चंद्रा घाटी में प्रलयंकारी बाढ़ की लहरें आ सकती हैं। इस प्रकार का विस्फोट निचले इलाकों की ग्रामीण बस्तियों, नदी पर बने पुलों, राष्ट्रीय राजमार्ग 3 (NH-3) के रणनीतिक हिस्सों, अटल टनल से जुड़े पारगमन द्वारों, और हिमाचल प्रदेश व केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में स्थापित जलविद्युत परियोजनाओं के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न कर सकता है।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) द्वारा 2023 के अंत में जारी उपग्रह मूल्यांकनों में झील के आयतन और क्षेत्रफल में अत्यधिक विस्तार दर्ज किया गया था, जिसके चलते घेपन घाट को एक अत्यधिक संवेदनशील व खतरनाक जल निकाय के रूप में चिह्नित कर वहां स्वचालित, ऑन-साइट निगरानी प्रणाली लगाना अनिवार्य माना गया।

भौगोलिक / भौतिक संकेतकपैरामीटर विवरण
भौगोलिक निर्देशांक एवं जिलालाहौल और स्पीति जिला, हिमाचल प्रदेश
झील की ऊंचाईसमुद्र तल से लगभग 4,070 से 4,146 मीटर
अनुमानित जल भराव आयतनलगभग 35.08 मिलियन घन मीटर
ग्लेशियल फीडिंग सिस्टममाउंट गिपन गो से पीछे हटते लटकते हिमनद
तात्कालिक जल निकाससिस्सू नाला $\rightarrow$ चंद्रा नदी $\rightarrow$ चेनाब नदी बेसिन
खतरे के दायरे में प्रमुख अधोसंरचनासिस्सू बस्ती, राष्ट्रीय राजमार्ग 3, अटल टनल पहुंच मार्ग, चेनाब जलविद्युत परियोजनाएं

मुख्य तथ्य और परीक्षा-उपयोगी आंकड़े

प्रतियोगी परीक्षाओं और राज्य लोक सेवा आयोगों की तैयारी के दृष्टिकोण से घेपन घाट निगरानी परियोजना के मुख्य तथ्य निम्नलिखित हैं:

अग्रणी मील का पत्थर: यह भारत में किसी हिमनदी झील पर स्थापित पहली परिचालन इन-सिटू GLOF प्रारंभिक चेतावनी टेलीमेट्री प्रणाली है।

संस्थागत संरचना: इसे सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) द्वारा विकसित किया गया है तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की एक पायलट परियोजना के तहत प्रायोजित किया गया है।

प्राथमिक अलर्ट ट्रिगर्स: यह प्रणाली झील के जलस्तर में अचानक वृद्धि, हिमोढ़ विस्थापन तरंगों, अत्यधिक वर्षा और हिमनद टूटने से पहले होने वाले तापमान वृद्धि (थर्मल स्पाइक्स) को पकड़ने के लिए कॉन्फ़िगर की गई है।

ऊर्जा स्वायत्तता: अत्यधिक ठंड में भी कार्य करने वाले केमिकल बैटरी पैक और सौर पैनलों से सुसज्जित, जो घने बादलों या बर्फीले तूफान की स्थिति में भी 15 से 20 दिनों तक निर्बाध डेटा ट्रांसमिशन बनाए रखने में सक्षम हैं।

इसरो रिमोट सेंसिंग इनपुट: यह स्थापना इसरो के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) द्वारा नवंबर 2023 में जारी चेतावनी के आधार पर की गई है, जिसमें झील के तीव्र फैलाव के प्रमाण दिए गए थे।

राष्ट्रीय नीतिगत जुड़ाव: यह केंद्र सरकार के राष्ट्रीय GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम (National GLOF Risk Mitigation Programme) से एकीकृत है, जिसके तहत शुरुआत में 56 उच्च-जोखिम वाली हिमनदी झीलों का मूल्यांकन किया गया था और बाद में हिमालयी राज्यों की 195 प्राथमिकता प्राप्त झीलों तक इसका दायरा बढ़ाया गया।

प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की तकनीकी संरचना और कार्यप्रणाली

उच्च-तुंगता वाले पेरिग्लेशियल (हिमनद-समीपवर्ती) वातावरण में अत्यधिक चुनौतियां होती हैं, जैसे शून्य से नीचे का तापमान, प्रचंड हवाएं, हिमस्खलन, और निरंतर बादलों का जमावड़ा जो सौर ऊर्जा उत्पादन को सीमित कर देता है। C-DAC द्वारा तैयार किया गया यह प्रारंभिक चेतावनी ढांचा एक बहु-संवेदी (multi-sensor), दोष-सहिष्णु (fault-tolerant) अवसंरचना के माध्यम से इन विषम परिस्थितियों का मुकाबला करता है।

यह प्रणाली तीन प्रमुख स्टेशनों के माध्यम से विभिन्न पैमानों को ट्रैक करती है:

फ्लोटिंग लेकुस्ट्रिन मॉनिटरिंग स्टेशन (Floating Lacustrine Monitoring Station): हिमनदी झील के भीतर लंगर डालकर स्थिर किया गया एक मरीन-ग्रेड बॉय (buoy), जो जल स्तंभ की गहराई, हाइड्रोस्टैटिक दबाव, सतही दोलन और तापीय प्रवणता (thermal gradients) पर नजर रखता है। यह लटकती हुई बर्फ या चट्टानों के झील में गिरने से उत्पन्न होने वाली विस्थापन तरंगों (seiches) का तत्काल पता लगाता है।

तट-आधारित स्वचालित मौसम केंद्र (Automatic Weather Station - AWS): झील के स्थिर हिमोढ़ कटक (moraine crest) पर स्थापित यह मौसम केंद्र परिवेशी तापमान, वायुमंडलीय दबाव, सापेक्ष आर्द्रता, हवा की गति और वर्षा को रिकॉर्ड करता है। इससे मौसम विज्ञानी बादलों के फटने (क्लाउडबर्स्ट) या तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि की घटनाओं का विश्लेषण कर बर्फ पिघलने की दर का सटीक अनुमान लगा पाते हैं।

ग्लेशियर विजन मॉनिटरिंग यूनिट (Glacier Vision Monitoring Unit): एक वेदर-प्रूफ कैमरा मास्ट, जिसमें उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड इमेजिंग सेंसर लगे हैं। यह इकाई पार्श्व हिमोढ़ों, टर्मिनल बर्फ की चट्टानों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों की निरंतर विजुअल फीड कैप्चर करती है, जिससे ढलानों की गति, किनारों के धंसने या मलबे के बांध के टूटने की दृश्य पुष्टि तुरंत मिल जाती है।

सेंसरों से प्राप्त टेलीमेट्री डेटा को उपग्रह चैनलों के माध्यम से C-DAC के उच्च-प्रदर्शन सुपरकंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तक भेजा जाता है। यह विश्लेषणात्मक प्लेटफॉर्म प्राप्त डेटा को हाइड्रोडायनामिक सिमुलेशन मॉडल के जरिए प्रोसेस करता है, जो जल निकास की मात्रा और बाढ़ की लहरों के पहुंचने के समय की गणना करता है। जैसे ही सेंसर इनपुट पूर्व-निर्धारित सुरक्षा सीमाओं को पार करते हैं, स्वचालित रेड अलर्ट सीधे हिमाचल प्रदेश राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र (SEOC) और केलांग स्थित जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) को प्रसारित हो जाते हैं। इससे निचले इलाकों के समुदायों और प्रशासनिक तंत्र को समय रहते सुरक्षित निकासी योजना लागू करने की आवश्यक मोहलत मिल जाती है।

टेलीमेट्री घटकहार्डवेयर विनिर्देशमुख्य आपदा जोखिम प्रबंधन कार्य
लेकुस्ट्रिन बॉय स्टेशनलंगर रेखाओं के साथ मरीन-ग्रेड फ्लोटिंग बॉयवास्तविक समय में जलस्तर में वृद्धि, हाइड्रोस्टैटिक दबाव और लहरों की निगरानी
स्वचालित मौसम केंद्र (AWS)बहु-पैरामीटर मौसम विज्ञान सेंसरों से युक्त मजबूत मास्टतापमान में अचानक उछाल, बादल फटने की घटना और वायुदाब विसंगतियों की रिकॉर्डिंग
ग्लेशियर विजन यूनिटडुअल ऑप्टिकल और थर्मल इन्फ्रारेड कैमरा असेंबलीहिमोढ़ बांध की स्थिरता, बर्फ टूटने (calving) और चैनल अवरोधों पर नजर
स्वायत्त ऊर्जा इकाईफोटोवोल्टिक पैनलों से जुड़ी क्रायोजेनिक बैटरी बैंकबिना धूप के भी 15-20 दिनों तक निर्बाध संचालन सुनिश्चित करना
कंप्यूटिंग कोरC-DAC उच्च-प्रदर्शन सुपरकंप्यूटिंग एनालिटिकल नोड्सवास्तविक समय में हाइड्रोडायनामिक सिमुलेशन चलाना और चेतावनी जारी करना

हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) के भू-आकृतिक कारक

हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) प्राकृतिक हिमोढ़ या बर्फ के बांध के अचानक टूटने से उत्पन्न होने वाला एक तीव्र और अत्यधिक विनाशकारी जल प्रवाह है। कंक्रीट या चिनाई से बने मानव-निर्मित बांधों के विपरीत, हिमोढ़ बांध असंगठित हिमनद मलबे (glacial till), खराब ढंग से छंटे हुए पत्थरों, रेत और बोल्डरों से बने होते हैं जो हिमनदों के किनारों पर जमा हो जाते हैं।

कई हिमालयी हिमोढ़ों के भीतर अवशिष्ट उप-सतही बर्फ के कोर (relict subterranean ice cores) दबे रहते हैं। निरंतर वायुमंडलीय तापमान बढ़ने के कारण जब ये दबी हुई बर्फ पिघलती है, तो बांध के भीतर खोखली संरचनाएं (voids) बन जाती हैं। इससे आंतरिक पाइपिंग क्षरण (piping erosion) होता है और हिमोढ़ बांध अंदर से धंसने लगता है।

GLOF के ट्रिगर होने की दो मुख्य प्रक्रियाएं होती हैं:

द्रव्यमान संचलन द्वारा उत्पन्न विस्थापन तरंगें: पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी बर्फ) के पिघलने से अस्थिर हुई सर्क की दीवारें (cirque walls) बड़े हिमस्खलन या चट्टानों के गिरने का कारण बनती हैं, जो सीधे झील में गिरती हैं। इसके तीव्र प्रभाव से विशाल विस्थापन तरंगें उत्पन्न होती हैं जो हिमोढ़ की चोटी को पार कर जाती हैं (overtopping)। इससे बांध में तेजी से गहरा कटाव बन जाता है और कुछ ही घंटों में पूरी झील खाली हो जाती है।

पाइपिंग विफलता और हाइड्रोस्टैटिक अतिदाब: गर्मियों में बर्फ के तेजी से पिघलने और अत्यधिक बारिश (क्लाउडबर्स्ट) के संयोजन से झील का बेसिन बहुत तेजी से भर जाता है। इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न हाइड्रोस्टैटिक दबाव हिमोढ़ की दीवार के भीतर की संरचनात्मक दरारों और असंगठित तलछटों में रिसाव पैदा करता है। यह रिसाव अंदरूनी पाइपिंग विफलता को जन्म देता है, जिससे सतह पर लहरें आए बिना ही बांध अंदर से ढह जाता है और पानी बाहर निकल जाता है।

हिमालय का जटिल भू-आकारिकी (geomorphology) इन खतरों को कई गुना बढ़ा देता है। उच्च पर्वतीय एशिया (High Mountain Asia) में तापमान वैश्विक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है, जिससे हिमनद तेजी से सिकुड़ रहे हैं। इसरो द्वारा किए गए दीर्घकालिक उपग्रह विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में पहचानी गई 2,400 से अधिक हिमनदी झीलों में से 670 से अधिक झीलों का 1984 से 2023 के बीच उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, जिनमें से 600 से अधिक झीलों का आकार दोगुने से भी अधिक हो गया है।

इन क्रायोस्फेरिक खतरों को और जटिल बनाने वाली बात यह है कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र IV और V (Seismic Zones IV and V) में आता है। भूकंप के झटके हिमोढ़ बांधों को चीर सकते हैं, लटकते हिमनदों को गिरा सकते हैं और 2013 की केदारनाथ आपदा, 2021 की चमोली त्रासदी और 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनक झील विस्फोट जैसी विनाशकारी आपदाओं का कारण बन सकते हैं।

नीति और शासन: एनडीएमए रूपरेखा और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं

घेपन घाट पर यह स्थापना आपदा प्रबंधन के प्रति भारत के बदलते दृष्टिकोण को दर्शाती है, जो आपदा के बाद दी जाने वाली राहत (reactive relief) से हटकर तकनीक-आधारित, पूर्व-आपदा जोखिम न्यूनीकरण (proactive disaster risk reduction) पर केंद्रित है।

अक्टूबर 2020 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने 'हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ का प्रबंधन (GLOFs)' शीर्षक से वैधानिक दिशानिर्देश जारी किए थे। इसमें संवेदनशील झीलों की पहचान करने, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली लगाने और साइफनिंग (पाइप से पानी निकालना), पंपिंग तथा नियंत्रित स्पिलवे की खुदाई जैसे संरचनात्मक उपायों के लिए विस्तृत प्रोटोकॉल दिए गए थे।

सिक्किम में दक्षिण ल्होनक GLOF के दौरान तीस्ता नदी पर चुंगथांग बांध के ढहने के बाद, केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के कार्यान्वयन में तेजी लाई और इसके लिए लगभग 20 मिलियन डॉलर का प्रारंभिक वित्तीय आवंटन किया। इस कार्यक्रम ने पहले 56 हिमनदी झीलों को "अत्यधिक जोखिम" के रूप में वर्गीकृत किया, जिसे बाद में जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में 195 प्राथमिकता प्राप्त झीलों तक विस्तारित किया गया, जबकि हिमालयी बेसिन में कुल 2,485 हिमनदी झीलों की उपग्रह निगरानी जारी रखी गई।

अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर, यह स्वदेशी तकनीक वैश्विक आपदा प्रबंधन रूपरेखाओं के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं को सीधे तौर पर पूरा करती है:

आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030): यह लक्ष्य G (Target G) को पूरा करता है, जो हस्ताक्षरकर्ता देशों को 2030 तक बहु-आपदा प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और आपदा जोखिम आकलनों की उपलब्धता व पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि करने के लिए बाध्य करता है।

संयुक्त राष्ट्र की "सभी के लिए प्रारंभिक चेतावनी" (Early Warnings for All) पहल: यह संयुक्त राष्ट्र और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के उस वैश्विक अभियान का समर्थन करती है, जिसका उद्देश्य संवेदनशील आबादी को पूर्व चेतावनी सुरक्षा प्रदान करना और दूरदराज के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए लागत प्रभावी उपाय विकसित करना है।

रणनीतिक, ढांचागत और सीमापार निहितार्थ

उच्च-तुंगता वाले जल संग्रहण क्षेत्रों में संवेदी नेटवर्क स्थापित करने के कई रणनीतिक, ढांचागत और कूटनीतिक प्रभाव हैं:

रणनीतिक परिवहन गलियारों की सुरक्षा: सिस्सू गांव मनाली-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-3) पर अटल टनल के उत्तरी छोर (North Portal) के करीब स्थित है। यह गलियारा नागरिक आवागमन के साथ-साथ लद्दाख में तैनात भारतीय सशस्त्र बलों की रणनीतिक रसद आपूर्ति के लिए बेहद अहम है। सिस्सू नाले में GLOF का वेग पहुंच मार्गों को नष्ट कर सकता है और ऊपरी लाहौल घाटी का संपर्क काट सकता है। रियल-टाइम अलर्ट से अधिकारियों को टनल को बंद करने और संवेदनशील नदी किनारों पर यातायात रोकने का समय मिल जाता है।

निचले प्रवाह में जलविद्युत संपत्तियों की सुरक्षा: हिमाचल प्रदेश की पर्वतीय नदियां कई रन-ऑफ-द-रिवर (RoR) जलविद्युत परियोजनाओं को सहारा देती हैं। GLOF का पानी भारी तलछट, बोल्डर और गाद लेकर आता है, जिससे इनटेक संरचनाएं टूट सकती हैं और टर्बाइन ब्लेड नष्ट हो सकते हैं। सेंसरों से मिलने वाले समय से संयंत्र प्रबंधन जलाशयों के स्पिलवे गेट खोल सकता है और संयंत्रों को बंद कर करोड़ों डॉलर के नुकसान और उत्तरी भारत के पावर ग्रिड में व्यवधान को टाल सकता है।

सीमापार जल प्रबंधन: चूंकि चंद्रा नदी चेनाब नदी की मुख्य स्रोत नदी है, इसलिए इस क्षेत्र में आने वाली बाढ़ का प्रभाव जम्मू-कश्मीर से होते हुए अंतरराष्ट्रीय सीमा पार पाकिस्तान तक पहुंच सकता है। प्रारंभिक चेतावनी नेटवर्क का संचालन नदी सुरक्षा बनाए रखने, सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) के ढांचे के तहत दायित्वों का निर्वहन करने और वैज्ञानिक आपदा तैयारी को मजबूत करने में मदद करता है।

स्थानीय समुदायों की सुरक्षित निकासी: अग्रिम टेलीमेट्री तभी प्रभावी होती है जब चेतावनी समय पर स्थानीय लोगों तक पहुंचे। घेपन घाट परियोजना सेंसर अलर्ट को स्थानीय समुदाय की लामबंदी से जोड़ती है। NDMA की 'आपदा मित्र' योजना जैसी पहलों के माध्यम से प्रशिक्षित स्थानीय स्वयंसेवकों को सक्रिय किया जाता है, जिससे बाढ़ का पानी पहुंचने से पहले ही बस्तियों और कैंपिंग स्थलों से लोगों को सुरक्षित निकाला जा सके।

आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा और राज्य पीएससी की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यह घटनाक्रम प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा दोनों के कई हिस्सों को जोड़ता है।

यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा हेतु प्रमुख बिंदु

भौगोलिक विवरण: घेपन घाट हिमनदी झील हिमाचल प्रदेश की लाहौल घाटी में चंद्रा नदी बेसिन में लगभग 4,100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

नदी संगम: चंद्रा और भागा नदियां बारालाचा ला दर्रे के पास से निकलती हैं और तांडी में मिलकर चंद्रभागा (चेनाब) नदी बनाती हैं। घेपन घाट का पानी सिस्सू नाले से होकर चंद्रा नदी में गिरता है।

संस्थागत भूमिका: यह प्रणाली NDMA की एक पायलट पहल के तहत C-DAC द्वारा विकसित की गई है, जो इसरो के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के जोखिम आकलन पर आधारित है।

सेंसर क्षमताएं: इस नेटवर्क में हाइड्रोस्टैटिक सेंसर, फ्लोटिंग बायो, स्वचालित मौसम केंद्र (AWS) और डुअल-कैमरा ग्लेशियर विजन यूनिट शामिल हैं, जो उपग्रह के माध्यम से सुपरकंप्यूटिंग प्रणाली से जुड़े हैं।

नीतिगत ढांचा: राष्ट्रीय GLOF जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत NDMA ने हिमालयी क्षेत्र में पहचानी गई 2,485 झीलों में से 56 को "अत्यधिक जोखिम" वाली झीलों के रूप में प्राथमिकता दी थी।

अंतरराष्ट्रीय संधियां: यह स्थापना सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) के लक्ष्य G को पूरा करने में योगदान देती है।

यूपीएससी मुख्य परीक्षा की विश्लेषणात्मक प्रासंगिकता

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (भूगोल):

विश्व के भौतिक भूगोल की मुख्य विशेषताएं और महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं में परिवर्तन: हिमावरण (क्रायोस्फेयर) पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव, अल्पाइन ग्लेशियरों का पीछे हटना, हिमोढ़ बांधों की संवेदनशीलता और झीलों के टूटने की प्रक्रिया का मूल्यांकन।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आपदा प्रबंधन, पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी):

आपदा और आपदा प्रबंधन: आपदा के बाद राहत कार्य से हटकर तकनीक-सक्षम पूर्व-आपदा जोखिम न्यूनीकरण, प्रारंभिक चेतावनी तंत्र और अंतर-संस्थागत समन्वय की आवश्यकता का विश्लेषण।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग: पारिस्थितिक संरक्षण और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए स्वदेशी सुपरकंप्यूटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), क्रायोजेनिक सेंसर और रिमोट सेंसिंग के उपयोग पर प्रकाश डालना।

पर्यावरणीय प्रभाव और सतत अधोसंरचना विकास: रणनीतिक अधोसंरचना (राजमार्ग, सुरंगें, जलविद्युत संयंत्र) के निर्माण और संवेदनशील पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के बीच संतुलन का परीक्षण।

मॉडल अभ्यास प्रश्न

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) और भारत में प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

घेपन घाट हिमनदी झील स्पीति घाटी में स्थित है और इसका जल सीधे सतलुज नदी प्रणाली में गिरता है।

घेपन घाट पर प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को NDMA की एक पायलट पहल के तहत सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (C-DAC) द्वारा विकसित किया गया है।

आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क का लक्ष्य G वर्ष 2030 तक बहु-आपदा प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों तक पहुंच के विस्तार पर केंद्रित है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

व्याख्या: कथन 1 गलत है क्योंकि घेपन घाट झील लाहौल घाटी में स्थित है और इसका निकास सिस्सू नाले के माध्यम से चंद्रा नदी में होता है, जो चेनाब बेसिन का हिस्सा है (न कि सतलुज का)। कथन 2 और 3 सही हैं।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: "संपूर्ण हिमालय क्षेत्र में तेजी से पिघलते हिमनदों ने हिमनदी झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) की आवृत्ति और विनाशकारी प्रभाव को बढ़ा दिया है, जिससे रणनीतिक नागरिक अवसंरचना और तटीय आबादी पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। हिमोढ़ बांधों के टूटने के भू-आकृतिक कारणों का परीक्षण कीजिए तथा क्रायोस्फेरिक आपदाओं से निपटने के लिए भारत की नीतिगत और तकनीकी तैयारियों का मूल्यांकन कीजिए।" (250 शब्द, 15 अंक)

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