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UPSC समसामयिकी (Current Affairs) अक्टूबर 2026: ₹2,563 करोड़ के GSAT-7C उपग्रह सौदे के साथ भारतीय वायु सेना ने मजबूत किया अपना वायु रक्षा कवच | अथर्व एग्जामवाइज करेंट न्यूज एंड डेली जीके अपडेट UPSC समसामयिकी (Current Affairs) अक्टूबर 2026: ₹2,563 करोड़ के GSAT-7C उपग्रह सौदे के साथ भारतीय वायु सेना ने मजबूत किया अपना वायु रक्षा कवच | अथर्व एग्जामवाइज करेंट न्यूज एंड डेली जीके अपडेट

19 Oct 2026 19 Oct 2026

UPSC समसामयिकी (Current Affairs) अक्टूबर 2026: ₹2,563 करोड़ के GSAT-7C उपग्रह सौदे के साथ भारतीय वायु सेना ने मजबूत किया अपना वायु रक्षा कवच | अथर्व एग्जामवाइज करेंट न्यूज एंड डेली जीके अपडेट
Defense Technology Hindi 19 Oct 2026

UPSC समसामयिकी (Current Affairs) अक्टूबर 2026: ₹2,563 करोड़ के GSAT-7C उपग्रह सौदे के साथ भारतीय वायु सेना ने मजबूत किया अपना वायु रक्षा कवच | अथर्व एग्जामवाइज करेंट न्यूज एंड डेली जीके अपडेट

परिचय: भारत की विस्तार लेती सैन्य अंतरिक्ष संरचना

रक्षा मंत्रालय (MoD) ने नई दिल्ली में लगभग ₹4,106 करोड़ के संयुक्त पूंजीगत मूल्यांकन वाले दो प्रमुख घरेलू खरीद समझौतों को अंतिम रूप दिया। इस खरीद पैकेज का मुख्य हिस्सा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL)—जो अंतरिक्ष विभाग के तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की वाणिज्यिक और परिचालन शाखा है—के साथ हस्ताक्षरित ₹2,563 करोड़ का एक समर्पित अनुबंध है। यह अनुबंध भारतीय वायु सेना (IAF) के लिए स्वदेशी रूप से निर्मित GSAT-7C सैन्य संचार उपग्रह के डिजाइन, विकास और आपूर्ति के लिए किया गया है। इसके साथ ही, मंत्रालय ने भारतीय नौसेना को स्वदेशी रूप से विकसित वरुणास्त्र भारी वजन वाले पनडुब्बी रोधी टॉरपीडो (anti-submarine torpedoes) की आपूर्ति के लिए भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) के साथ ₹1,543 करोड़ के एक अनुबंध को भी निष्पादित किया।

GSAT-7C की तैनाती एक महत्वपूर्ण संचार आवश्यकता को पूरा करती है: इसके माध्यम से हवाई मंचों, निगरानी नोड्स और जमीन पर स्थित परिचालन मुख्यालयों के बीच उच्च-बैंडविड्थ, लचीले और गैर-दृष्टि-रेखा (non-line-of-sight) इलेक्ट्रॉनिक संपर्कों को बनाए रखा जा सकेगा। उच्च-तीव्रता वाले युद्ध परिदृश्यों में, भौगोलिक विषमताएं और दुश्मन की जैमिंग पारंपरिक सामरिक रेडियो संचार को बाधित कर सकती हैं। एक समर्पित भूस्थिर संचार केंद्र (geostationary communications hub) हासिल करके, भारतीय वायु सेना वास्तविक समय में सेंसर-टू-शूटर डेटा प्रसार के लिए एक जैम-रोधी आधार तैयार कर रही है। संबंधित रक्षा खरीदों के निरंतर विश्लेषण के लिए अभ्यर्थी अथर्व एग्जामवाइज डिफेंस करेंट अफेयर्स पोर्टल पर अपडेट देख सकते हैं और पत्र सूचना कार्यालय (PIB) द्वारा जारी प्राथमिक अधिसूचनाओं का अध्ययन कर सकते हैं।

रणनीतिक संदर्भ और अधिग्रहण संरचना

GSAT-7C का यह अधिग्रहण उस रक्षा खरीद चक्र का परिणाम है, जिसकी औपचारिक शुरुआत तब हुई थी जब रक्षा मंत्री की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने नवंबर 2021 में आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) प्रदान की थी। शुरुआत में 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत इसका अनुमानित वित्तीय प्रभाव ₹2,236 करोड़ आंका गया था। बाद में तकनीकी सुधारों, सॉफ्टवेयर अपडेट और इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर (ECCM) संवर्द्धनों के बाद इस परियोजना के हस्ताक्षरित अनुबंध का अंतिम मूल्य ₹2,563 करोड़ तय हुआ।

इस परियोजना की प्रशासनिक और औद्योगिक संरचना भारत के विकसित होते रक्षा-औद्योगिक आधार को दर्शाती है, जो रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSUs) और राज्य के स्वामित्व वाली वाणिज्यिक संस्थाओं को सशस्त्र बलों के साथ जोड़ती है। ये समझौते रक्षा अधिग्रहण विभाग की प्रत्यक्ष देखरेख में संपन्न किए गए, जो 'बाय (इंडियन-आईडीडीएम)' और 'आत्मनिर्भर भारत' सिद्धांतों के तहत निर्धारित लक्ष्यों को सशक्त बनाते हैं।

परिचालन पैरामीटरGSAT-7C उपग्रह खरीदवरुणास्त्र हेवी-वेट टॉरपीडो खरीद
क्रियान्वयनकारी वाणिज्यिक इकाईन्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL), बेंगलुरुभारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL), हैदराबाद
प्राथमिक अनुसंधान एजेंसीभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)नौसेना विज्ञान और तकनीकी प्रयोगशाला (DRDO-NSTL)
अंतिम-उपयोगकर्ता सेवाभारतीय वायु सेना (IAF)भारतीय नौसेना (IN)
कुल अनुबंध मूल्य₹2,563 करोड़₹1,543 करोड़
संयुक्त खरीद परिव्यय₹4,106 करोड़₹4,106 करोड़
परिचालन अधिदेश (Mandate)सुरक्षित BLOS एयरोस्पेस C4ISR रिलेपोत-प्रक्षेपित पनडुब्बी रोधी युद्ध (ASW)
लक्षित समावेशन समय-सीमा2030 तक परिचालन का लक्ष्यचरणबद्ध नौसैनिक बेड़े में आपूर्ति

GSAT-7C उपग्रह के प्रमुख तथ्य और तकनीकी आयाम

प्रतियोगी परीक्षाओं में वस्तुनिष्ठ पुनरीक्षण के उद्देश्य से, GSAT-7C उपग्रह प्लेटफॉर्म की आवश्यक तथ्यात्मक और तकनीकी विशेषताओं को नीचे रेखांकित किया गया है:

खरीद और कार्यान्वयन एजेंसी: रक्षा मंत्रालय द्वारा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL), बेंगलुरु के साथ औपचारिक रूप से निष्पादित।

समर्पित परिचालन आवंटन: अन्य सैन्य शाखाओं के साथ पेलोड साझा किए बिना, भारतीय वायु सेना के लिए एक विशिष्ट सैन्य संचार नोड के रूप में डिज़ाइन किया गया।

बियॉन्ड-विजुअल-लाइन-ऑफ-साइट (BVLOS) कनेक्टिविटी: विशाल रणनीतिक दूरियों में स्थलीय और हवाई दृष्टि-रेखा संचार की ज्यामितीय सीमाओं का समाधान करता है।

सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो (SDR) आर्किटेक्चर: हवाई लड़ाकू विमानों में अपनाए गए सामरिक SDR पारिस्थितिकी तंत्र के साथ सीधे एकीकृत होने के लिए इंजीनियर किया गया।

प्लेटफॉर्म अंतर-संचालनीयता (Interoperability): बहु-भूमिका वाले लड़ाकू बेड़े, एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) विमानों और मानवरहित हवाई वाहनों (UAVs) के बीच वॉयस, सामरिक स्थितिजन्य डेटा और एन्क्रिप्टेड टेलीमेट्री को जोड़ता है।

ग्राउंड हब इन्फ्रास्ट्रक्चर: इसमें भौगोलिक रूप से फैले कमान स्टेशनों पर वास्तविक समय के ग्राउंड ट्रैकिंग स्टेशनों और संचार इंटरफेस का निर्माण शामिल है।

तकनीकी आत्मनिर्भरता: पूरी तरह से भारत के भीतर डिज़ाइन, निर्मित और एकीकृत, जो संघर्ष के समय बाहरी आपूर्ति बाधाओं या विदेशी वाणिज्यिक उपग्रह बैंडविड्थ से इनकार के जोखिम को समाप्त करता है।

दृष्टि-रेखा की कमजोरियों पर नियंत्रण: BVLOS और सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो

स्थलीय सैन्य संचार मुख्यतः वेरी हाई फ्रीक्वेंसी (VHF) और अल्ट्रा हाई फ्रीक्वेंसी (UHF) रेडियो चैनलों पर निर्भर करता है। यद्यपि ये संपर्क स्थानीय सामरिक वातावरण में पर्याप्त बैंडविड्थ प्रदान करते हैं, लेकिन अत्यधिक तनावपूर्ण हवाई क्षेत्रों में तीन संरचनात्मक कारणों से इनका प्रदर्शन कमजोर हो जाता है:

पृथ्वी की वक्रता (Earth's Curvature): कम ऊंचाई पर उड़ान भरने वाले या अपने परिचालन दायरे का विस्तार करने वाले उच्च गति के लड़ाकू विमान ग्राउंड-आधारित रडार और मिशन कमान केंद्रों के क्षितिज से तेजी से नीचे चले जाते हैं।

भूभाग अवरोध (Terrain Masking): उत्तरी और पश्चिमी पर्वतीय परिचालन क्षेत्रों में भौगोलिक संरचनाएं प्रत्यक्ष दृष्टि-रेखा प्रसार को अवरुद्ध कर देती हैं, जिससे लगातार सामरिक ब्लाइंड जोन बनते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग: विरोधी ताकतों के जमीनी या हवाई स्टैंड-ऑफ इलेक्ट्रॉनिक हमले रेडियो फ्रीक्वेंसी स्पेक्ट्रम को बाधित कर सकते हैं, जिससे सेंसर और लक्ष्यीकरण डेटा प्रवाह टूट सकता है।

GSAT-7C एक कक्षीय रिले प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करता है जो अंतरिक्ष के माध्यम से लंबवत दिशा में एन्क्रिप्टेड वॉयस और टेलीमेट्री संचारित करके स्थलीय बाधाओं को दरकिनार करता है। यह संरचना शत्रुतापूर्ण हवाई क्षेत्र या समुद्री क्षेत्रों में परिचालन कर रहे लड़ाकू विमानों को ऊंचाई की बाध्यताओं के बिना अपने कमान तत्वों के साथ जुड़े रहने की सुविधा देती है।

इसका एक महत्वपूर्ण परिचालन घटक उपग्रह का सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो (SDR) के साथ जुड़ाव है। एनालॉग रेडियो—जहां मॉड्यूलेशन, ऑपरेटिंग फ्रीक्वेंसी और सुरक्षा मानक स्थिर हार्डवेयर सर्किट्री में बंद होते हैं—के विपरीत, SDR वेवफॉर्म और एन्क्रिप्शन को प्रबंधित करने के लिए पुनर्गठन-योग्य सॉफ्टवेयर परतों का उपयोग करते हैं। इन गतिशील SDR डेटा धाराओं को GSAT-7C के उच्च-क्षमता वाले ट्रांसपोंडरों के माध्यम से प्रसारित करके भारतीय वायु सेना अपनी एंटी-जैमिंग क्षमताओं, फ्रीक्वेंसी परिवर्तनशीलता और सुरक्षित एन्क्रिप्टेड बैंडविड्थ आवंटन को मजबूत करती है।

यह कनेक्टिविटी नेटवर्क-केंद्रित युद्ध (network-centric warfare) का मूल आधार है। प्रत्येक लड़ाकू विमान को केवल अपने ऑनबोर्ड फायर-कंट्रोल रडार के माध्यम से लक्ष्यों को ट्रैक करने की आवश्यकता नहीं होती; अग्रिम पंक्ति में तैनात मानवरहित हवाई वाहनों (UAVs) या AEW&C विमानों द्वारा जुटाया गया ट्रैकिंग डेटा सीधे GSAT-7C नेटवर्क के माध्यम से हथियारों के स्टेशनों तक पहुंचाया जा सकता है। यह सैन्य प्रक्रिया के 'ऑब्जर्व-ओरिएंट-डिसाइड-एक्ट' (OODA) लूप को छोटा करता है, जो आधुनिक बहु-डोमेन हवाई अभियानों के परिणामों को निर्धारित करने में निर्णायक होता है। बाहरी अंतरिक्ष और एयरोस्पेस रक्षा संपर्कों के विस्तृत विश्लेषण का अध्ययन अथर्व एग्जामवाइज स्पेस टेक्नोलॉजी मॉड्यूल के माध्यम से किया जा सकता है।

GSAT-7 तारामंडल: समर्पित त्रि-सेवा कक्षीय क्षमताएं

GSAT-7C का अधिग्रहण साझा ट्रांसपोंडर क्षमता के बजाय सशस्त्र बलों की प्रत्येक शाखा के लिए विशेष रूप से तैयार समर्पित कक्षीय बुनियादी ढांचे की दिशा में एक बदलाव का प्रतीक है। GSAT-7 श्रृंखला, जिसे 'रुक्मिणी/एंग्री बर्ड' श्रृंखला के रूप में भी जाना जाता है, प्रत्येक सेवा शाखा को सुरक्षित और संरक्षित उपग्रह लिंक प्रदान करने के संस्थागत प्रयास को दर्शाती है।

ऐतिहासिक रूप से भारतीय वायु सेना मुख्य रूप से GSAT-7A के माध्यम से संचालन करती थी, जिसे दिसंबर 2018 में आठ वर्ष के परिचालन जीवनकाल के साथ भूस्थिर कक्षा में स्थापित किया गया था। हालांकि, GSAT-7A की बैंडविड्थ विभाजित थी, जिसमें से लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा भारतीय सेना को उसके विमानन विंग और ग्राउंड-टू-एयर रिले के लिए आवंटित किया गया था। चूंकि GSAT-7A अपने अनुमानित परिचालन जीवनकाल के अंत के करीब पहुंच रहा है, GSAT-7C की तैनाती इसके उत्तराधिकारी क्षमताओं को सुरक्षित करती है और केवल भारतीय वायु सेना को समर्पित एक विशेष अंतरिक्ष संचार केंद्र प्रदान करती है।

उपग्रह प्रणालीसमर्पित सेवा शाखामहत्वपूर्ण तिथियां / मील के पत्थरनिवेश परिव्ययपरिचालन भूमिका और तकनीकी फोकसस्थिति
GSAT-7 (रुक्मिणी)भारतीय नौसेनाप्रक्षेपण: सितंबर 2013₹470 करोड़वास्तविक समय बहु-बैंड समुद्री डोमेन जागरूकता और गहरे समुद्र में नौसैनिक नेटवर्किंगपरिचालन में; पुराना भार GSAT-7R पर स्थानांतरित
GSAT-7Aभारतीय वायु सेना (70%) और भारतीय सेना (30%)प्रक्षेपण: दिसंबर 2018₹620 करोड़रडार नेटवर्क, एयरबेस, AEW&C प्लेटफॉर्म और लड़ाकू विमानों के कॉकपिट को आपस में जोड़नापरिचालन में; 8 साल के डिज़ाइन जीवन के अंत के करीब
GSAT-7Bभारतीय सेनाअनुबंध: मार्च 2023₹3,000 करोड़मशीनीकृत डिवीजनों, सीमा पर तैनाती और अग्रिम पंक्ति के यूएवी के लिए सामरिक संचारनिर्माण प्रक्रिया में; 2028 तक समावेशन अपेक्षित
GSAT-7R (CMS-03)भारतीय नौसेनाप्रक्षेपण: नवंबर 2025₹1,589 करोड़GSAT-7 का उन्नत बहु-बैंड प्रतिस्थापन; व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र को कवर करता हैकक्षा में परिचालन में
GSAT-7Cभारतीय वायु सेनाअनुबंध: अक्टूबर 2026₹2,563 करोड़केवल भारतीय वायु सेना के लिए कक्षीय मंच; BVLOS डेटा वितरण और एंटी-जैम SDR लिंक प्रदान करता हैविकास के अधीन; 2030 तक परिचालन का लक्ष्य

रणनीतिक बदलाव: स्पेस-बेस्ड सर्विलांस फेज-III (SBS-3) और DSA

संचार उपग्रहों की यह खरीद भारत की अंतरिक्ष-आधारित खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) क्षमताओं के समानांतर विस्तार का हिस्सा है। 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे आधुनिक सीमा पार आकस्मिक अभियानों से मिले परिचालन अनुभवों ने त्वरित प्रतिक्रिया बनाए रखते हुए पड़ोसी क्षेत्रों की निरंतर निगरानी की रणनीतिक आवश्यकता को रेखांकित किया।

इन आवश्यकताओं को संस्थागत रूप देने के लिए, सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (CCS) ने स्पेस-बेस्ड सर्विलांस फेज-III (SBS-3) कार्यक्रम को मंजूरी दी, जो ₹26,968 करोड़ के अधिकृत बजट वाली एक राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजना है।

SBS-3 कार्यक्रम भारत के रक्षा अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए तीन प्रमुख विकास प्रस्तुत करता है:

तारामंडल का पैमाना और वितरण: इस योजना के तहत कक्षा में 52 सैन्य टोही उपग्रहों को प्रक्षेपित किया जाना है, जिनकी तैनाती 2026 से शुरू होकर 2029 तक पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।

सार्वजनिक-निजी विनिर्माण मॉडल: उस पारंपरिक मॉडल से हटकर जहां इसरो ही सभी निर्माण कार्य करता था, सरकार ने 21 उपग्रह इसरो को आवंटित किए हैं, जबकि शेष 31 उपग्रह घरेलू निजी एयरोस्पेस कंपनियों को सौंपे हैं। इस दृष्टिकोण का उद्देश्य निजी अंतरिक्ष विनिर्माण को बढ़ावा देना और देश भर में उपग्रह उत्पादन क्षमता का विस्तार करना है।

प्रोलिफरेटेड लो-अर्थ-ऑर्बिट (pLEO) आर्किटेक्चर: कुछ विशाल और संवेदनशील भूस्थिर उपग्रहों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय, SBS-3 छोटे और त्वरित प्रतिक्रियाशील निम्न-पृथ्वी-कक्षा उपग्रहों के एक वितरित नेटवर्क का उपयोग करता है। यह संरचना उत्तरी सीमावर्ती क्षेत्रों और हिंद महासागर के ऊपर पुनरावलोकन समय (revisit times) को कम करती है, जिससे उच्च-रिज़ॉल्यूशन अपडेट सुनिश्चित होते हैं और एंटी-सैटेलाइट (ASAT) हथियारों तथा स्थानीय कक्षीय अवरोधों के विरुद्ध प्रणाली की उत्तरजीविता मजबूत होती है।

इन विस्तारित कक्षीय संपत्तियों के परिचालन समन्वय का दायित्व डिफेंस स्पेस एजेंसी (DSA) के पास है। इंटीग्रेटेड स्पेस सेल के परिचालन विस्तार के रूप में 2019 में इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (IDS) के तहत स्थापित यह त्रि-सेवा एजेंसी भारत की अंतरिक्ष युद्ध नीतियों का संचालन करती है, अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता का समन्वय करती है और यह सुनिश्चित करती है कि कक्षीय ISR डेटा सीधे जमीन, हवा और समुद्र में मौजूद सामरिक कमांडरों तक पहुंचे। रक्षा प्रबंधन से जुड़े व्यापक मुद्दों के अध्ययन के लिए उम्मीदवार अथर्व एग्जामवाइज इंटरनल सिक्योरिटी एनालिसिस देख सकते हैं।

आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

UPSC सिविल सेवा परीक्षा और अन्य राज्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यह विषय सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 और 3 के कई खंडों से जुड़ता है।

विस्तृत पाठ्यक्रम जुड़ाव

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी):

प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण: विदेशी हार्डवेयर पर निर्भरता समाप्त कर NSIL, ISRO और DRDO-NSTL द्वारा संप्रभु डिज़ाइन की ओर बढ़ना घरेलू इंजीनियरिंग की प्रगति को दर्शाता है।

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग: विस्तृत क्षेत्र संचार के लिए GSAT-7C जैसे उच्च-ऊंचाई वाले भूस्थिर कक्षा (GEO) उपग्रहों और त्वरित पुनरावलोकन इमेजिंग के लिए SBS-3 जैसे निम्न-ऊंचाई वाले प्रोलिफरेटेड लो-अर्थ ऑर्बिट (pLEO) तारामंडल के परिचालन उपयोगों का तुलनात्मक अध्ययन।

सूचना प्रौद्योगिकी और संचार: सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो (SDR), जैम-रोधी वेवफॉर्मिंग और एंटी-एक्सेस/एरिया-डिनायल (A2/AD) इलेक्ट्रॉनिक काउंटर-काउंटरमेजर्स को नियंत्रित करने वाले तकनीकी तंत्र।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आंतरिक सुरक्षा और रक्षा आधुनिकीकरण):

सीमा सुरक्षा बुनियादी ढांचा: उच्च-कोण उपग्रह रिले के माध्यम से वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) और नियंत्रण रेखा (LOC) पर पर्वतीय भूभाग अवरोधों (terrain masking) की समस्या का समाधान।

संयुक्त सेवा युद्ध और C4ISR: अंतरिक्ष-आधारित सेंसर प्लेटफार्मों को वास्तविक समय के लक्ष्यीकरण चक्रों और स्वचालित युद्धक्षेत्र प्रबंधन प्रणालियों में शामिल करना।

अंतरिक्ष सुरक्षा: शत्रुतापूर्ण एंटी-सैटेलाइट (ASAT) या साइबर-इलेक्ट्रॉनिक खतरों से महत्वपूर्ण कक्षीय संपत्तियों की सुरक्षा के लिए डिफेंस स्पेस एजेंसी (DSA) के नेतृत्व वाले परिचालन सिद्धांतों का आकलन।

सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (सरकारी नीतियां और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम):

सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का संस्थागत विकास, जिसमें न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) को इसरो के नवाचारों के वाणिज्यिक वाहक के रूप में और SBS-3 जैसे बड़े पैमाने के रक्षा कार्यक्रमों में निजी उद्योग के साथ इसके समन्वय को रेखांकित करना।

त्वरित पुनरीक्षण के लिए मुख्य डेटा बिंदु

GSAT-7C: ₹2,563 करोड़ की खरीद, 2030 तक समर्पित BVLOS और SDR संचार प्रदान करने के लिए भारतीय वायु सेना हेतु NSIL के साथ हस्ताक्षरित।

वरुणास्त्र टॉरपीडो: ₹1,543 करोड़ की खरीद, नौसेना विज्ञान और तकनीकी प्रयोगशाला (DRDO-NSTL) द्वारा विकसित और भारतीय नौसेना के पनडुब्बी रोधी युद्ध अभियानों के लिए BDL द्वारा निर्मित।

त्रि-सेवा उपग्रह वितरण: GSAT-7 और GSAT-7R (नौसेना), GSAT-7A (वायु सेना/सेना संयुक्त), GSAT-7B (थल सेना), GSAT-7C (वायु सेना को समर्पित)।

SBS-3 कार्यक्रम: 52 निगरानी उपग्रहों के लिए ₹26,968 करोड़ की योजना (21 इसरो द्वारा और 31 निजी कंपनियों द्वारा निर्मित), जिसका प्रबंधन डिफेंस स्पेस एजेंसी द्वारा किया जाएगा।

अभ्यर्थियों के लिए अभ्यास प्रश्न

मॉडल बहुविकल्पीय प्रश्न (प्रारंभिक परीक्षा)

प्रश्न. भारत के सैन्य अंतरिक्ष कार्यक्रमों और संस्थागत संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

GSAT-7C स्वदेशी रूप से विकसित एक संचार उपग्रह है, जिसे विशेष रूप से भारतीय वायु सेना की परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बनाया गया है।

स्पेस-बेस्ड सर्विलांस फेज-III (SBS-3) पहल एक सार्वजनिक-निजी विनिर्माण मॉडल पर आधारित है, जिसके तहत उपग्रहों के निर्माण को इसरो और घरेलू निजी कंपनियों के बीच विभाजित किया गया है।

डिफेंस स्पेस एजेंसी (DSA) वाणिज्यिक प्रक्षेपण मूल्यों को प्रबंधित करने के लिए अंतरिक्ष विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत कार्य करती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 1 और 2

(c) केवल 2 और 3

(d) 1, 2 और 3

सही उत्तर: (b) केवल 1 और 2

विश्लेषणात्मक व्याख्या: कथन 1 और 2 सही हैं। GSAT-7C बियॉन्ड-विजुअल-लाइन-ऑफ-साइट नेटवर्क कनेक्टिविटी के लिए विशेष रूप से भारतीय वायु सेना को समर्पित है। SBS-3 के तहत उपग्रह निर्माण को इसरो (21 उपग्रह) और निजी उद्योग (31 उपग्रह) के बीच विभाजित किया गया है। कथन 3 गलत है क्योंकि डिफेंस स्पेस एजेंसी रक्षा मंत्रालय के तहत इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (IDS) के अधीन सैन्य अंतरिक्ष अभियानों के प्रबंधन के लिए कार्य करती है, जबकि वाणिज्यिक गतिविधियों का पर्यवेक्षण अंतरिक्ष विभाग के तहत न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) द्वारा किया जाता है।

मॉडल विश्लेषणात्मक प्रश्न (मुख्य परीक्षा)

प्रश्न. "आधुनिक युद्धक्षेत्र बहु-डोमेन अभियानों के अभिसरण से परिभाषित होता है, जहां कक्षीय बुनियादी ढांचा एक निष्क्रिय अवलोकन समर्थन परत के बजाय एक प्राथमिक परिचालन आधार के रूप में कार्य करता है।" इस टिप्पणी के आलोक में परीक्षण कीजिए कि समर्पित सैन्य उपग्रहों का समावेशन और स्पेस-बेस्ड सर्विलांस (SBS) ढांचे का विस्तार भारत की राष्ट्रीय रक्षा तैयारियों को किस प्रकार सुदृढ़ करता है। (उत्तर 250 शब्दों में दें - 15 अंक)

उत्तर संरचना के लिए मुख्य रूपरेखा:

प्रस्तावना: नेटवर्क-केंद्रित बहु-डोमेन युद्ध की दिशा में हो रहे बदलाव को रेखांकित करें; डिफेंस स्पेस एजेंसी (DSA) की संस्थागत देखरेख में अंतरिक्ष को चौथे युद्ध क्षेत्र के रूप में चिन्हित करें।

मुख्य भाग - संचार आयाम: दृष्टि-रेखा (line-of-sight) की बाधाओं, उत्तरी सीमाओं पर उच्च-ऊंचाई वाले भूभाग अवरोधों, और एन्क्रिप्टेड, जैम-रोधी तथा सेंसर-टू-शूटर कनेक्टिविटी स्थापित करने में GSAT-7C एवं सॉफ्टवेयर-डिफाइंड रेडियो (SDR) के महत्व की चर्चा करें।

मुख्य भाग - खुफिया जानकारी और डोमेन जागरूकता: SBS-3 तारामंडल (52 उपग्रह) की रणनीतिक भूमिका का विश्लेषण करें; बताएं कि कैसे वितरित निम्न-पृथ्वी कक्षाएं लक्ष्य पुनरावलोकन समय को कम करती हैं, समुद्री एवं सीमावर्ती डोमेन जागरूकता बढ़ाती हैं, और विरोधी के ASAT हथियारों के विरुद्ध प्रणाली की लचीलापन सुधारती हैं।

मुख्य भाग - औद्योगिक और संस्थागत सुधार: 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत NSIL और निजी रक्षा अनुबंधकर्ताओं के माध्यम से विदेशी निर्भरता से घरेलू उत्पादन की ओर बदलाव पर प्रकाश डालें, और स्पष्ट करें कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी दीर्घकालिक क्षमता निर्माण में कैसे सहायक है।

निष्कर्ष: इस बात पर बल दें कि भारत के रणनीतिक मोर्चों पर निवारक क्षमता (deterrence) और परिचालन तत्परता बनाए रखने के लिए लचीले कक्षीय प्लेटफॉर्म, जैम-प्रूफ सैन्य संचार और निर्बाध वास्तविक समय निगरानी अपरिहार्य हैं।

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