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यूपीएससी समसामयिकी 10 अक्टूबर, 2026: नवी पिल्लई ने जीता नोबेल शांति पुरस्कार | अथर्व एग्ज़ामवाइज़ समसामयिक समाचार, दैनिक जीके अपडेट और आज की प्रतियोगी परीक्षा समाचार यूपीएससी समसामयिकी 10 अक्टूबर, 2026: नवी पिल्लई ने जीता नोबेल शांति पुरस्कार | अथर्व एग्ज़ामवाइज़ समसामयिक समाचार, दैनिक जीके अपडेट और आज की प्रतियोगी परीक्षा समाचार

10 Oct 2026 10 Oct 2026

यूपीएससी समसामयिकी 10 अक्टूबर, 2026: नवी पिल्लई ने जीता नोबेल शांति पुरस्कार | अथर्व एग्ज़ामवाइज़ समसामयिक समाचार, दैनिक जीके अपडेट और आज की प्रतियोगी परीक्षा समाचार
Nobel Prize Hindi 10 Oct 2026

यूपीएससी समसामयिकी 10 अक्टूबर, 2026: नवी पिल्लई ने जीता नोबेल शांति पुरस्कार | अथर्व एग्ज़ामवाइज़ समसामयिक समाचार, दैनिक जीके अपडेट और आज की प्रतियोगी परीक्षा समाचार

नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने भारतीय तमिल मूल की दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद नवनेथम "नवी" पिल्लई को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की है। "शांति और अंतर्राष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों" के लिए दिया गया यह सम्मान नोबेल पुरस्कार की स्थापना की 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रदान किया गया है। नॉर्वेजियन नोबेल समिति के अध्यक्ष जोर्गन वातने फ्रिडनेस द्वारा घोषित इस प्रशस्ति पत्र में इस बात पर बल दिया गया है कि विधि का शासन—घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर—उस वैश्विक व्यवस्था का आधार है जो शांति सुनिश्चित करने और विवादों को अहिंसक रूप से सुलझाने के लिए बनाई गई है। यह पुष्टि करता है कि स्थायी शांति के लिए न्याय मौलिक रूप से अनिवार्य है।

यह निर्णय गहन भू-राजनीतिक तनावों के बीच आया है, जो बहुपक्षीय निरीक्षण के सामने बढ़ती चुनौतियों, राज्यों के एकतरफा आचरण और अंतर्राष्ट्रीय कानूनी संस्थानों पर राजनयिक बहसों से चिह्नित है। पिल्लई को यह समाचार जर्मनी के नूर्नबर्ग में एक कानूनी संगोष्ठी में भाग लेने के दौरान मिला—जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के उन मुकदमों का ऐतिहासिक केंद्र रहा है जिन्होंने आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक कानून की नींव रखी थी। वहां उन्होंने आगाह किया कि अंतर्राष्ट्रीय जवाबदेही को कमजोर करने के राजनीतिक प्रयास दशकों की कानूनी प्रगति को नष्ट करने का जोखिम पैदा करते हैं, जिससे वैश्विक मामले ऐसे माहौल में लौट सकते हैं जहां मानवाधिकारों के संरक्षण का निर्धारण कानून के बजाय शक्ति द्वारा किया जाता है।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए प्रमुख तथ्य

पुरस्कार विजेता प्रोफ़ाइल: नवनेथम "नवी" पिल्लई, जन्म 23 सितंबर, 1941, डरबन, दक्षिण अफ्रीका में भारतीय तमिल माता-पिता के घर।

पुरस्कार का अधिदेश: "शांति और अंतर्राष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों के लिए" ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर सम्मानित किया गया जब अंतर्राष्ट्रीय कानूनी निकाय गंभीर राजनीतिक और परिचालन संबंधी दबावों का सामना कर रहे हैं।

वर्षगांठ का संदर्भ: नोबेल शांति पुरस्कार की 125वीं वर्षगांठ पर प्रदत्त, जो राष्ट्रों के बीच बंधुत्व को बढ़ावा देने और अंतर्राष्ट्रीय कानूनी न्यायाधिकरणों को आगे बढ़ाने के अल्फ्रेड नोबेल के विज़न के सर्वथा अनुरूप है।

रंगभेद-युगीन मानवाधिकार रक्षा: 1967 में दक्षिण अफ्रीका के नटाल प्रांत में वकालत का कार्यालय खोलने वाली पहली महिला के रूप में अपनी कानूनी प्रैक्टिस शुरू की। उन्होंने राजनीतिक बंदियों को कानूनी सुरक्षा प्रदान की और 1973 में रॉबेन द्वीप के कैदियों के लिए कानूनी प्रतिनिधित्व का अधिकार सुरक्षित कराया।

घरेलू न्यायिक उपलब्धि: रंगभेद की समाप्ति के बाद 1995 में दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में पहली गैर-श्वेत महिला न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत हुईं।

आईसीटीआर (ICTR) में ऐतिहासिक न्यायशास्त्र: रवांडा के लिए अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (1995-2003) में न्यायाधीश और अध्यक्ष (1999-2003) के रूप में कार्य किया। उन्होंने ऐतिहासिक जीन-पॉल अकायेसु निर्णय (1998) का सह-लेखन किया, जिसने यौन हिंसा और बलात्कार को नरसंहार के कृत्यों के रूप में संहिताबद्ध किया। इसके साथ ही मीडिया द्वारा किए जाने वाले घृणा प्रचार को नरसंहार के लिए उकसाने के रूप में दंडित करने वाली नज़ीरें भी स्थापित कीं।

सुप्रानैशनल (अंतर्राष्ट्रीय) नेतृत्व: अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC, 2003–2008) की न्यायाधीश और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR, 2008–2014) नियुक्त की गईं।

समकालीन अधिदेश: कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र और इज़राइल पर संयुक्त राष्ट्र स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय जांच आयोग (2021-2025) की अध्यक्षता की और वर्तमान में म्यांमार से संबंधित नरसंहार की कार्यवाही में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में एक तदर्थ (Ad hoc) न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों और आयोगों पर परीक्षा-उपयोगी आंकड़े

प्रतियोगी परीक्षा के अभ्यर्थियों को अंतर्राष्ट्रीय विवाद समाधान के प्राथमिक निकायों के क्षेत्राधिकार, संस्थापक चार्टर और प्रवर्तन तंत्रों के बीच अंतर स्पष्ट रूप से समझना चाहिए।

संस्थान / विधिक साधनविधिक आधार एवं स्थापनाप्राथमिक क्षेत्राधिकारप्रमुख संरचनात्मक विशेषताएं
अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अध्याय XIV (1945); आईसीजे की संविधिसंप्रभु राज्यों के बीच विवादास्पद मामले; परामर्शी रायसंयुक्त राष्ट्र का प्रधान न्यायिक अंग; निर्णय बाध्यकारी होते हैं, जिनका प्रवर्तन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के माध्यम से होता है।
अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC)रोम संविधि (1998 में स्वीकृत, 2002 में प्रभावी)नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध, युद्ध अपराध और आक्रामकता के लिए व्यक्तिगत आपराधिक दायित्वस्वतंत्र संधि निकाय; राष्ट्रीय अदालतों का पूरक; स्वतंत्र प्रवर्तन पुलिस बल का अभाव।
रवांडा के लिए अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTR)संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 955 (1994, अध्याय VII)रवांडा में अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के गंभीर उल्लंघनों के लिए व्यक्तिगत अभियोजनतदर्थ न्यायनिर्णयन; इसने प्रणालीगत बलात्कार को नरसंहार के रूप में परिभाषित करने वाला प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय न्यायशास्त्र स्थापित किया।
संयुक्त राष्ट्र जांच आयोग (COI)संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के प्रस्तावअंतर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघनों का तथ्य-अन्वेषण, निगरानी और दस्तावेजीकरणअर्ध-न्यायिक खोजी तंत्र; अपने निष्कर्ष संयुक्त राष्ट्र महासभा और अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरणों को सौंपते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय संधियों और संयुक्त राष्ट्र के अंगों के विस्तृत विश्लेषणात्मक विवरण की समीक्षा अथर्व एग्ज़ामवाइज़ फाउंडेशन पोर्टल पर की जा सकती है और अथर्व एग्ज़ामवाइज़ करंट अफेयर्स के माध्यम से इसका अध्ययन किया जा सकता है।

जीवनी संबंधी विकास और कानूनी मील के पत्थर

व्यवस्थागत रंगभेद के दौर में डरबन में पली-बढ़ीं पिल्लई ने संस्थागत बहिष्कार का सामना करते हुए नटाल विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूल से 1982 में मास्टर ऑफ लॉज़ (LLM) और 1988 में डॉक्टर ऑफ ज्यूरिडिकल साइंस (SJD) की उपाधि प्राप्त की। उनकी घरेलू वकालत रंगभेद विरोधी नेताओं, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं और राजनीतिक बंदियों के बचाव पर केंद्रित थी। 1992 में, उन्होंने विश्व स्तर पर महिलाओं और लड़कियों के कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन 'इक्वलिटी नाउ' (Equality Now) की सह-स्थापना की। दक्षिण अफ्रीका में लोकतांत्रिक बदलाव के बाद, उन्होंने महिला राष्ट्रीय गठबंधन में योगदान दिया और रंगभेद के बाद के संविधान में नस्ल, लिंग, धर्म और यौन अभिविन्यास को शामिल करते हुए समानता की गारंटी का पुरजोर समर्थन किया।

कालक्रमपद / मंचऐतिहासिक योगदान और नज़ीर
1967–1995अधिवक्ता, दक्षिण अफ्रीका का सर्वोच्च न्यायालयरंगभेद विरोधी कार्यकर्ताओं का बचाव किया; 1973 में रॉबेन द्वीप के बंदियों को वकीलों और बुनियादी अधिकारों तक पहुंच दिलाई।
1992सह-संस्थापक, इक्वलिटी नाउलैंगिक-भेदभावपूर्ण कानूनों में सुधार और कानूनी लड़ाई के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थागत मंच तैयार किया।
1995–2003न्यायाधीश एवं अध्यक्ष, ICTRअकायेसु मामले (नरसंहार के रूप में बलात्कार) और नाहिमाना मामले (नरसंहार के उकसावे के रूप में मीडिया प्रचार) में निर्णयों का सह-निर्माण किया।
2003–2008न्यायाधीश, अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालयनव-परिचालित रोम संविधि के लिए प्रारंभिक प्रक्रियात्मक और अपीलीय न्यायशास्त्र स्थापित किया।
2008–2014संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्तक्षेत्रीय उपस्थिति का विस्तार किया, व्हिसलब्लोअर सुरक्षा को प्राथमिकता दी और लैंगिक पहचान से जुड़े संरक्षणों को एकीकृत किया।
2021–2025अध्यक्ष, कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र और इज़राइल पर संयुक्त राष्ट्र जांच आयोगसशस्त्र संघर्षों की जांच की; गाजा में नरसंहार के कृत्यों और 7 अक्टूबर, 2023 को किए गए युद्ध अपराधों के साक्ष्य पाए।
वर्तमानतदर्थ न्यायाधीश, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय'द गाम्बिया बनाम म्यांमार' मामले में 1948 के नरसंहार सम्मेलन के तहत राज्य के दायित्व का न्यायनिर्णयन कर रही हैं।

न्यायिक न्यायशास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक कानून

पिल्लई के न्यायिक करियर ने अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून के भीतर ऐतिहासिक मिसालें कायम की हैं, विशेष रूप से संवेदनशील आबादी के लिए कानूनी संरक्षण का विस्तार करने और सामूहिक अत्याचारों के लिए जवाबदेही तय करने में।

आईसीटीआर (ICTR) और लैंगिक-आधारित नरसंहार का संहिताबद्धीकरण

आईसीटीआर के 1998 के जीन-पॉल अकायेसु फैसले से पहले, युद्ध के दौरान होने वाले यौन हमलों को अक्सर अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक संहिताओं के तहत दंडनीय अत्याचार के बजाय सशस्त्र संघर्ष का एक प्रासंगिक परिणाम मान लिया जाता था। पिल्लई और उनके साथी न्यायाधीशों ने निर्णय सुनाया कि 1948 के नरसंहार सम्मेलन के अनुच्छेद II के तहत यौन हिंसा नरसंहार का एक रूप है, जब यह किसी संरक्षित राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूर्ण या आंशिक रूप से नष्ट करने के इरादे से की जाती है।

न्यायाधिकरण ने 2003 के 'मीडिया केस' (नाहिमाना व अन्य) में नृशंस अपराधों में जनसंचार माध्यमों की भूमिका पर भी फैसला सुनाया। पीठ ने पुष्टि की कि जिन नागरिक प्रसारण अधिकारियों और पत्रकारों ने तुत्सी आबादी के खात्मे का निर्देश देने वाले घृणास्पद भाषण प्रसारित किए, वे नरसंहार करने के लिए प्रत्यक्ष और सार्वजनिक उकसावे के लिए व्यक्तिगत रूप से आपराधिक रूप से उत्तरदायी थे। इसने अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत आधुनिक प्रचार और डिजिटल घृणास्पद भाषण के मूल्यांकन के लिए एक मुख्य मिसाल कायम की।

मध्य पूर्व में तथ्य-अन्वेषण और राजनयिक घर्षण

2021 में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने पिल्लई को पूर्वी यरुशलम और इज़राइल सहित कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र पर स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्षता का जिम्मा सौंपा। 2025 के अंत में, आयोग ने एक औपचारिक रिपोर्ट जारी की जिसमें निष्कर्ष निकाला गया कि गाजा में इज़राइली सैन्य कार्रवाई नरसंहार की श्रेणी में आती है। इसमें नागरिक और चिकित्सा बुनियादी ढांचे के व्यवस्थित विनाश, भुखमरी पैदा करने वाली घेराबंदी की स्थिति, और उच्च पदस्थ राजनीतिक व सैन्य हस्तियों द्वारा दिए गए इरादतन बयानों का हवाला दिया गया।

आयोग के अधिदेश ने हमास द्वारा 7 अक्टूबर, 2023 को किए गए हमलों की भी जांच की, जिसमें निष्कर्ष निकाला गया कि नागरिकों की हत्या और अपहरण युद्ध अपराध और अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून का गंभीर उल्लंघन था। आयोग के निष्कर्षों को तीखे राजनयिक विरोध का सामना करना पड़ा; संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल के राजनीतिक नेतृत्व ने आयोग के निष्कर्षों की निंदा की और बाद में अमेरिका ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरणों से जुड़े कर्मियों के खिलाफ प्रतिबंध लागू कर दिए।

अंतर्राष्ट्रीय संस्थागत जांच के विस्तृत सारांश नियमित रूप से अथर्व एग्ज़ामवाइज़ अध्ययन सामग्री पर संग्रहीत किए जाते हैं। आधिकारिक स्रोत पाठ और घोषणाओं की जांच आधिकारिक नोबेल पुरस्कार प्रेस विज्ञप्ति और संयुक्त राष्ट्र समाचार के माध्यम से की जा सकती है।

भू-राजनीतिक निहितार्थ और बहुपक्षवाद के समक्ष संरचनात्मक चुनौतियां

यह पुरस्कार राष्ट्रीय संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनी मानदंडों के प्रवर्तन के बीच संरचनात्मक तनावों को रेखांकित करता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था इस सिद्धांत पर स्थापित की गई थी कि राज्यों का आचरण अंतर्राष्ट्रीय कानूनी सीमाओं के भीतर रहना चाहिए। हालांकि, समकालीन भू-राजनीतिक परिस्थितियां इस ढांचे की व्यावहारिक कमजोरियों को उजागर करती हैं:

प्रवर्तन की कमी और संप्रभु गैर-अनुपालन: यद्यपि आईसीजे जैसे निकाय बाध्यकारी फैसले सुनाते हैं, वे राज्यों के स्वैच्छिक अनुपालन या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के माध्यम से प्रवर्तन पर निर्भर करते हैं, जहां स्थायी सदस्यों (P5) का वीटो पावर राज्यों और उनके सहयोगियों को प्रतिकूल फैसलों से बचा सकता है।

न्यायिक अधिदेशों का राजनीतिकरण: जब अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण वैश्विक शक्तियों या उनके क्षेत्रीय साझेदारों से जुड़े मामलों की जांच करते हैं, तो उन संस्थानों को अक्सर राजनीतिक दबाव, बजट कटौती या द्विपक्षीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है, जैसा कि हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय अदालत के अधिकारियों के खिलाफ किए गए उपायों में देखा गया है।

विभाजित होती वैश्विक व्यवस्था में नूर्नबर्ग की विरासत: नूर्नबर्ग में पिल्लई की टिप्पणियों ने रेखांकित किया कि अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून को स्वैच्छिक या वैकल्पिक मानना दुनिया भर के नागरिकों के कानूनी संरक्षण को कमजोर करता है। नोबेल समिति की यह मान्यता भू-राजनीतिक प्रतिरोध के सामने न्यायिक स्वतंत्रता के समर्थन के रूप में कार्य करती है।

आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा (CSE) और राज्य लोक सेवा आयोगों की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए यह घटनाक्रम सामान्य अध्ययन के कई प्रश्नपत्रों के पाठ्यक्रमों को जोड़ता है।

यूपीएससी परीक्षा प्रासंगिकता मैट्रिक्स: 2026 नोबेल शांति पुरस्कार

यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा


 

• 125वीं नोबेल शांति पुरस्कार वर्षगांठ और ऐतिहासिक संदर्भ


 

• कानूनी अंतर: आईसीजे (UN अंग) बनाम आईसीसी (रोम संविधि)


 

• ऐतिहासिक आईसीटीआर नज़ीरें: अकायेसु (1998) और मीडिया ट्रायल

यूपीएससी मुख्य परीक्षा जीएस प्रश्नपत्र II (राजव्यवस्था, शासन, अंतर्राष्ट्रीय संबंध)


 

• द्विपक्षीय और बहुपक्षीय संस्थान और समझौते


 

• संप्रभु उन्मुक्ति (Sovereign Immunity) बनाम सार्वभौमिक क्षेत्राधिकार (Universal Jurisdiction)


 

• आईसीजे के फैसलों की संरचनात्मक प्रवर्तन सीमाएं और यूएनएससी वीटो

यूपीएससी मुख्य परीक्षा जीएस प्रश्नपत्र IV (नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि)


 

• न्यायिक स्वतंत्रता, नैतिक साहस और निष्पक्षता


 

• नूर्नबर्ग सिद्धांत और राज्य की सत्ता की नैतिक सीमाएं

प्रत्यक्ष पाठ्यक्रम लिंकेज

यूपीएससी सीएसई प्रारंभिक परीक्षा (राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व की सामयिक घटनाएं):

अभ्यर्थियों को वैधानिक संधि निकायों और चार्टर अंगों के बीच का अंतर समझना चाहिए। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में अक्सर आईसीजे, आईसीसी और आईसीटीआर जैसे तदर्थ न्यायाधिकरणों के स्थापना वर्ष, मुख्यालय और विषय-वस्तु क्षेत्राधिकार का परीक्षण किया जाता है। ऐतिहासिक मील के पत्थर—जैसे नोबेल शांति पुरस्कार की 125वीं वर्षगांठ और ऐतिहासिक मानवाधिकार संधियां—परीक्षा के सामान्य विषय हैं।

यूपीएससी सीएसई मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II (अंतर्राष्ट्रीय संबंध और वैश्विक शासन):

यह घटनाक्रम सीधे तौर पर "महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएं और मंच—उनकी संरचना, अधिदेश" से संबंधित विषयों से जुड़ता है। मुख्य परीक्षा के प्रश्न अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून प्रवर्तन की संरचनात्मक सीमाओं, अंतर्राष्ट्रीय कानूनी अधिदेशों और राज्य की संप्रभुता के बीच टकराव, तथा अंतर्राष्ट्रीय निर्णयों के अनुपालन को भू-राजनीतिक यथार्थवाद (Realpolitik) किस प्रकार प्रभावित करता है, इसका मूल्यांकन करते हैं।

यूपीएससी सीएसई मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV (नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि):

पिल्लई का न्यायिक करियर लोक सेवा के मूलभूत मूल्यों, पेशेवर सत्यनिष्ठा और नैतिक साहस पर चर्चा के लिए व्यावहारिक केस स्टडी सामग्री प्रस्तुत करता है। बाहरी राजनीतिक विरोध के बावजूद संवेदनशील जांचों को संभालने का उनका दृष्टिकोण न्यायिक निर्णय लेने में गैर-पक्षपातपूर्णता और वस्तुनिष्ठता के अनुप्रयोग को दर्शाता है।

अभ्यर्थियों के लिए अभ्यास कोना

प्रारंभिक परीक्षा हेतु मॉडल बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न. अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक संस्थानों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) संयुक्त राष्ट्र का एक प्रमुख अंग है जिसका विवादास्पद क्षेत्राधिकार विशेष रूप से केवल संप्रभु राज्यों के लिए खुला है।

अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की स्थापना राज्यों के बीच क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने के लिए सीधे 1945 के संयुक्त राष्ट्र चार्टर द्वारा की गई थी।

रवांडा के लिए अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTR) ने व्यवस्थित यौन हिंसा और बलात्कार को नरसंहार के कृत्यों के रूप में वर्गीकृत करके कानूनी नज़ीर स्थापित की।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

सही उत्तर: (c) केवल 1 और 3

व्याख्या: कथन 1 सही है; आईसीजे संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग है, जो संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय XIV के तहत स्थापित है, और इसका विवादास्पद क्षेत्राधिकार केवल संप्रभु राज्यों पर लागू होता है। कथन 2 गलत है; आईसीसी एक स्वतंत्र संधि-आधारित निकाय है जो 1998 की रोम संविधि (जो 2002 में लागू हुई) द्वारा शासित है और यह अंतर-राज्यीय क्षेत्रीय विवादों को सुलझाने के बजाय नृशंस अपराधों के लिए व्यक्तियों पर मुकदमा चलाता है। कथन 3 सही है; आईसीटीआर के ऐतिहासिक 1998 के जीन-पॉल अकायेसु फैसले ने निर्धारित किया कि यौन हिंसा अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत नरसंहार का एक कृत्य है।

मुख्य परीक्षा हेतु मॉडल विश्लेषणात्मक प्रश्न

प्रश्न. "अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून की सुप्रानैशनल वास्तुकला अक्सर खुद को भू-राजनीतिक हितों और संप्रभु यथार्थवाद (Realpolitik) के अधीन पाती है।" अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक निकायों के हालिया फैसलों और जांचों के आलोक में, अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत राज्य और गैर-राज्य अभिनेताओं (Actors) को जवाबदेह ठहराने के तंत्र और सीमाओं का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)

उत्तर लेखन रूपरेखा:

संदर्भ: नवी पिल्लई को 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने का परिचय दें, और भू-राजनीतिक विखंडन के दौर में अंतर्राष्ट्रीय विधि के शासन के पक्ष में नोबेल समिति के रुख को रेखांकित करें।

संस्थागत तंत्र: राज्यों की जवाबदेही (आईसीजे के विवादित मामले, जैसे द गाम्बिया बनाम म्यांमार) और व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व (आईसीसी, आईसीटीआर जैसे तदर्थ न्यायाधिकरण) की दोहरी व्यवस्था पर चर्चा करें। प्राथमिक साक्ष्य जुटाने में संयुक्त राष्ट्र के तथ्य-अन्वेषण आयोगों की भूमिका पर प्रकाश डालें।

संरचनात्मक सीमाएं: संस्थागत अड़चनों का विश्लेषण करें, जैसे स्वतंत्र प्रवर्तन तंत्र का अभाव, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के P5 वीटो पर आईसीजे अनुपालन की निर्भरता, रोम संविधि में प्रमुख शक्तियों की गैर-भागीदारी, और न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ द्विपक्षीय प्रतिबंधों का उपयोग।

आगे की राह: अंतर्राष्ट्रीय अदालतों की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संधियों के सार्वभौमिक अंगीकरण, बहुपक्षीय विवाद समाधान तंत्र में सुधार और निरंतर राजनयिक सहमति के निर्माण के महत्व के साथ निष्कर्ष निकालें।

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