यूपीएससी समसामयिकी (3 अक्टूबर, 2026): वारली समुदाय का तारपा नृत्य | अथर्व एक्जामवाइज दैनिक सामान्य ज्ञान अपडेट
भारतीय उपमहाद्वीप में जनजातीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ पारिस्थितिकीय चेतना, सामूहिक संसाधन प्रबंधन और पावन दार्शनिक चिंतन के परिष्कृत संग्रह का प्रतिनिधित्व करती हैं। पश्चिमी भारत की स्वदेशी कला परंपराओं में, वारली समुदाय द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला तारपा नृत्य एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह नृत्य केवल उत्सवपरक मनोरंजन न होकर उत्तरी सह्याद्रि के प्राकृतिक परिदृश्य में रचे-बसे देशज जीवन की कृषि ऋतुओं, सामूहिक श्रम प्रणालियों और आध्यात्मिक लोकाचार को मूर्त रूप प्रदान करता है।
सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए समसामयिक घटनाओं के विश्लेषण के संदर्भ में, वारली जनजाति की यह सांस्कृतिक विरासत नृजाति-संगीतशास्त्र (Ethnomusicology), उपाश्रयी (सबाल्टर्न) इतिहास तथा सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-1 के अंतर्गत भारतीय विरासत एवं संस्कृति के बीच महत्वपूर्ण वैचारिक सेतु स्थापित करती है। यह विस्तृत विश्लेषणात्मक आलेख वारली समुदाय के सामाजिक-भौगोलिक परिवेश, तारपा वाद्य की संरचनात्मक विशेषताओं, इसके सर्पिलाकार वृत्ताकार नृत्य विन्यास के लाक्षणिक अर्थों, लोककला में इसके दृश्य रूपांकन तथा उनकी सामाजिक अस्मिता की रक्षा करने वाले ऐतिहासिक प्रतिरोध का सर्वांगीण अध्ययन प्रस्तुत करता है।
वारली समुदाय का सामाजिक-भौगोलिक परिदृश्य
वारली (या वरली) एक स्वदेशी आदिवासी समुदाय है, जिनकी पैतृक भूमि उस दुर्गम भूभाग में विस्तृत है जहाँ उत्तरी सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला अरब सागर के तटीय क्षेत्र से मिलती है। इनका मुख्य जनसांख्यिकीय संकेंद्रण महाराष्ट्र के पालघर और ठाणे जिलों में है, जिसका विस्तार निकटवर्ती नासिक और धुले जिलों तक है। अंतर-राज्यीय सीमा के पार यह आबादी दक्षिणी गुजरात (वलसाड, नवसारी, सूरत और डांग जिलों) तथा केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में फैली हुई है।
व्युत्पत्ति की दृष्टि से, 'वारली' शब्द क्षेत्रीय शब्द 'वारला' (warla) से निकला है, जिसका अर्थ जोता हुआ भूखंड या कृषि भूमि का टुकड़ा होता है। यह भाषाई मूल समुदाय के ऐतिहासिक अर्ध-खानाबदोश वन-निर्भर जीवन से स्थायी एवं स्थानांतरित कृषि की ओर हुए संरचनात्मक संक्रमण को दर्शाता है, जो मुख्य रूप से वर्षा आधारित धान, मोटे अनाज और दलहन की खेती पर केंद्रित है। यह समुदाय 'वारली' बोली बोलता है, जो भारोपीय भाषा परिवार की दक्षिणी शाखा से संबंधित एक अलिखित भाषा है और जिसमें मराठी तथा कोंकणी के स्पष्ट ध्वन्यात्मक व रूप-वैज्ञानिक प्रभाव दिखाई देते हैं।
वारली समुदाय की आस्था पर्यावरण-केंद्रित जीववाद (Animism) पर आधारित है, जहाँ देवत्व का अनुभव किसी पदानुक्रमित देवसमूह के माध्यम से नहीं, बल्कि कृषि जीवन को संचालित करने वाली प्रत्यक्ष पारिस्थितिकीय शक्तियों के माध्यम से किया जाता है। इनकी आध्यात्मिक व्यवस्था तीन आधारभूत तत्वों पर टिकी है:
धरतरी (धरती माता): पावन पृथ्वी, जिसे उर्वरता, पुनर्जनन और जीवन के उद्गम का गर्भ माना जाता है।
कंसारी (अन्न की देवी): फसलों और अनाजों की संरक्षिका देवी, जिनका आह्वान कटाई के समय मौसमी समृद्धि सुनिश्चित करने हेतु किया जाता है।
गवतरी (पशुधन एवं पशु शक्ति): जुताई, खाद और ग्रामीण आजीविका के लिए अनिवार्य पालतू पशुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने वाली शक्ति।
प्रमुख जनसांख्यिकीय एवं सांस्कृतिक तथ्य
भौगोलिक वितरण: महाराष्ट्र के पालघर, ठाणे, नासिक और धुले जिलों में सघन विस्तार; दक्षिणी गुजरात तथा दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव में संलग्न बस्तियाँ।
भाषाई वर्गीकरण: वारली भाषा, जो भारोपीय भाषा परिवार के अंतर्गत आती है और कोंकणी व मराठी से प्रभावित है।
आर्थिक आधार: पारंपरिक धान उत्पादक, गौण वनोपज (जैसे महुआ के फूल और सूखी लकड़ियाँ) संग्राहक तथा कृषि श्रमिक।
आध्यात्मिक मान्यताएँ: प्रकृति-केंद्रित जीववाद, जिसमें मातृ शक्तियों की प्रधानता है—धरती माता (धरतरी), अन्न देवी (कंसारी) और प्रजनन एवं सृजन की देवी (पालघाट)।
वाद्य-संरचना विज्ञान: तारपा वाद्य की संरचना एवं ध्वनिक यांत्रिकी
इस नृत्य का नाम 'तारपा' नामक लोक सुषिर वाद्य (Aerophone) के नाम पर रखा गया है, जो प्रदर्शन स्थल के केंद्र और संपूर्ण ध्वनि-परिवेश दोनों में केंद्रीय स्थान रखता है। तारपा एक एकल-रीड (Single-reed) वाला पारंपरिक वायु वाद्य है, जिसकी ध्वनि-उत्पादन प्रणाली हॉर्नपाइप और लोक एकल-रीड पाइपों के समान होती है।
दो से छह फीट लंबे इस वाद्य यंत्र का निर्माण बिना किसी यांत्रिक उपकरण के, स्थानीय वन संसाधनों द्वारा पूर्णतः हस्तनिर्मित रूप से किया जाता है। इसके तीन मुख्य ध्वनिक अंग होते हैं:
वायु भंडार / मुखपत्र (Air Reservoir): सूखी और खोखली की गई लौकी (Lagenaria siceraria) से निर्मित यह कक्ष वायु-कोष का कार्य करता है। वादक द्वारा फूंकी गई हवा का निरंतर दबाव इसमें बना रहता है, जिससे अखंडित स्वर का प्रवाह संभव होता है।
दोहरी बांस नलिकाएं (Dual Bamboo Shafts): प्राकृतिक मधुमक्खी मोम के सहारे लौकी के आधार में जोड़ी गई दो समानांतर बांस की नलिकाएं। इनमें बांस की बारीक खपच्चियों से बनी एकल रीड्स लगी होती हैं। एक नलिका निरंतर एकसमान ड्रोन (आधार स्वर) देती है, जबकि दूसरी नलिका पर बने तीन से छह छिद्र राग और सूक्ष्म स्वर-परिवर्तनों (Microtonal variations) को नियंत्रित करते हैं।
ध्वनि-विस्तारक भोंपू (Flared Resonator Horn): बांस की नलिकाओं के निचले सिरे पर ताड़ (ताड़/खजूर) अथवा नारियल के सूखे पत्तों को सर्पिलाकार लपेटकर बनाया गया चौड़ा मुख। यह प्राकृतिक लाउडस्पीकर की तरह कार्य करता है और खुले खेतों में ध्वनि का विस्तार करता है।
वाद्य के सभी जोड़ों को वायुरोधी बनाने के लिए मधुमक्खी के मोम और प्राकृतिक रेशों की रस्सियों का उपयोग किया जाता है। इसकी गूंजती हुई गंभीर और तीक्ष्ण ध्वनि खुले ग्रामीण वातावरण में दूर तक फैलती है, जिससे एक साथ दर्जनों नर्तकों की थिरकन को नियंत्रित किया जाता है।
| वाद्य का भाग | कच्चा प्राकृतिक घटक | संरचनात्मक एवं ध्वनिक कार्य |
|---|---|---|
| वायु भंडार (Wind Chest) | सूखी खोखली लौकी (तूंबा) | सतत वायु दबाव बनाए रखने हेतु वायु-कोष और ध्वनिक युग्मक का कार्य करता है। |
| स्वर नलिकाएं (Melodic Pipes) | खोखले बांस के पोरों में दो स्प्लिट रीड्स | मूल स्वर तरंगें उत्पन्न करना; छिद्रों के माध्यम से धुन और राग का नियमन करना। |
| ध्वनि विस्तारक (Resonant Bell) | सर्पिलाकार मुड़े ताड़ या नारियल के सूखे पत्ते | मूल ध्वनियों को प्रवर्धित करना तथा ध्वनि तरंगों को चारों ओर प्रसारित करना। |
| गोंद एवं सीलेंट | गर्म प्राकृतिक मोम और पादप राल | वायु मार्गों को पूरी तरह सील करना और घटकों को बिना कृत्रिम गोंद के जोड़ना। |
नृत्य-विन्यास प्रतिरूप, प्रतीकात्मकता और कृषि दर्शन
तारपा नृत्य सामूहिक सहभागिता पर आधारित है, जिसमें व्यक्तिगत प्रदर्शन की तुलना में सामाजिक एकजुटता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
नृत्य का विन्यास तारपा वादक (तारपाकार) के चारों ओर केंद्रित संकुचित और विस्तारित होते वृत्ताकार घेरे में विकसित होता है। नर्तक—जिनमें बिना किसी जातिगत भेद अथवा कठोर लैंगिक विभाजन के पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल होते हैं—एक-दूसरे का हाथ थामकर या कमर पकड़कर एक अटूट मानवीय श्रृंखला बनाते हैं। जैसे-जैसे गति तेज होती है, यह वृत्त एक जटिल, घुमावदार सर्पिलाकार रूप ले लेता है। मानवविज्ञानी इस गति को 'जीवन चक्र' (Circle of Life) का प्रतीक मानते हैं, जो जन्म, विकास, क्षय और पुनर्जन्म के चक्रीय प्राकृतिक नियमों को दर्शाता है। नर्तक कभी भी वादक की ओर अपनी पीठ नहीं करते, जिससे संगीत के स्रोत से उनका निरंतर संबंध बना रहता है।
तारपाकार केवल वादक ही नहीं, बल्कि नृत्य निर्देशक भी होता है। धुनों में उतार-चढ़ाव, स्वरों की तीव्रता और लयबद्ध विराम शारीरिक संचालन के संकेत होते हैं। इन संकेतों के साथ ही पूरी मानवीय श्रृंखला दिशा बदलती है, कदमों की लंबाई समायोजित करती है या तालबद्ध पद-चाप प्रस्तुत करती है। इस प्रकार नृत्य और संगीत एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।
पारंपरिक रूप से यह आयोजन वर्षा ऋतु के बाद फसल कटाई के उपरांत गोधूलि वेला से शुरू होकर भोर तक चलता है। यह अनुष्ठान अन्न संचय का उत्सव मनाने, कठिन कृषि श्रम से मुक्ति पाने और निकटवर्ती पाड़ों (ग्राम बस्तियों) के बीच सामाजिक सामंजस्य बढ़ाने के साथ-साथ युवाओं के बीच वैवाहिक चयन का मंच भी प्रदान करता है।
दृश्य सहजीविता: वारली चित्रकला परंपरा में तारपा रूपांकन
तारपा नृत्य की गत्यात्मकता वारली लोक चित्रकला का केंद्रीय विषय है, जो स्वदेशी संस्कृति में दृश्य और प्रदर्शन कलाओं के बीच एक अद्वितीय अंतर्संबंध को प्रदर्शित करती है।
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वारली चित्रकला में अनुष्ठानिक संदर्भ से लेकर भौतिक अभिव्यक्ति तक का संरचनात्मक प्रवाह।
पारंपरिक वारली भित्ति चित्र ऐतिहासिक रूप से विवाहित महिलाओं (सुवासिनियों) द्वारा विवाह और फसल कटाई के समय मिट्टी की झोपड़ियों पर बनाए जाते थे। यह कला मूलभूत ज्यामितीय आकारों के माध्यम से व्यक्त होती है:
वृत्त: सूर्य और चंद्रमा जैसे आकाशीय पिंडों तथा नर्तकों की सामूहिक चक्रीय रचना से प्रेरित।
त्रिभुज: नुकीले पर्वत शिखरों और पवित्र वृक्षों से प्रेरित। मानव आकृति के चित्रण में दो उल्टे त्रिभुज अपने शीर्ष बिंदुओं पर मिलते हैं; ऊपरी त्रिभुज धड़ का और निचला त्रिभुज श्रोणि (कमर के नीचे का भाग) का प्रतिनिधित्व करता है। यह ज्यामिति ब्रह्मांडीय संतुलन की द्योतक है।
चौकोर (चौक): पवित्र स्थान को परिभाषित करता है, जो 'देवचौक' भित्तिचित्रों में उर्वरता की देवी पालघाट को घेरे रहता है।
उत्सवों और गैर-अनुष्ठानिक चित्रों में केंद्रीय चौकोर की जगह तारपा नृत्य ले लेता है। सफेद रंग के मानव आकृतियों के संकेंद्रित छल्ले तारपाकार की केंद्रीय आकृति के चारों ओर घूमते दिखाई देते हैं। यह सफेद रंग पानी और प्राकृतिक गोंद में घुले पिसे हुए चावल के आटे से तैयार किया जाता है, जिसे गोबर, मिट्टी और लाल गेरू से लेपी गई दीवार पर लगाया जाता है। ब्रश के रूप में सिरे से चबाई गई ताजी बांस की टहनियों का उपयोग किया जाता है।
1970 के दशक में इस पारंपरिक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का श्रेय जिव्या सोमा मशे को जाता है। उन्होंने वारली चित्रकला को झोपड़ियों की दीवारों से निकालकर कागज़, कैनवास और कपड़ों पर उतारा, किंतु इसके पारंपरिक प्रतीकों को अक्षुण्ण रखा। उनकी विशिष्ट कला साधना के लिए उन्हें वर्ष 2011 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
परीक्षा-उपयोगी कला एवं संस्कृति तथ्य
धरातल की तैयारी: लाल गेरू, गाय के गोबर और जलोढ़ मिट्टी का लेप।
रंग घटक: कच्चे चावल के आटे का लेप, जिसमें पानी और प्राकृतिक गोंद मिलाया जाता है।
तूलिका (ब्रश): रेशेदार बनाने के लिए चबाई गई बांस की टहनी।
प्रमुख रूपांकन: तारपा नृत्य का सर्पिल, देवचौक (देवी पालघाट का मंदिर) और लग्नचौक (विवाह चौक)।
प्रमुख चित्रकार: जिव्या सोमा मशे (पद्म श्री, 2011), जिन्होंने इस कला को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
ऐतिहासिक आयाम: सामंती प्रतिरोध और 1945 का वारली आदिवासी विद्रोह
वारली संस्कृति का संपूर्ण समाजशास्त्रीय अध्ययन उन ऐतिहासिक वास्तविकताओं के बिना अधूरा है जिन्होंने उनके अस्तित्व को संकट में डाला। उनके नृत्यों और चित्रों में दिखने वाले सौहार्द के पीछे औपनिवेशिक शासन के दौरान उपजा गहरा कृषि संकट छिपा था। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में वनों की कटाई, स्थानीय साहूकारों (सावकारों) के ऋणजाल और औपनिवेशिक भू-राजस्व नीतियों ने स्वतंत्र वारली किसानों को उनकी ही भूमि पर बंधुआ मजदूर बना दिया था। समुदाय को वेठबिगार (बिना पारिश्रमिक के कराया जाने वाला बेगार श्रम) झेलना पड़ता था।
इस शोषण के विरुद्ध 1945 का वारली आदिवासी विद्रोह भड़का, जो उत्तरी महाराष्ट्र के तलसारी, डहाणू और उंबरगांव तालुकों में फैल गया। अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) के बैनर तले इस आंदोलन का नेतृत्व स्वतंत्रता सेनानी और कम्युनिस्ट नेत्री गोदावरी परुलेकर (जिन्हें समुदाय में 'गोदूताई' कहा जाता था) ने किया। वारली स्त्री-पुरुषों ने हड़तालें कीं, बेगार करने से मना कर दिया और मनमाने लगान व बंधुआ मजदूरी के खात्मे की मांग की।
यह 1945 का विद्रोह सबाल्टर्न (उपाश्रयी) कृषक इतिहास का एक प्रेरक उदाहरण है। इसने सिद्ध किया कि तारपा जैसे सामूहिक नृत्यों में दिखने वाली सामाजिक एकजुटता आर्थिक शोषण के विरुद्ध एक अनुशासित सामाजिक-राजनीतिक प्रतिरोध में परिवर्तित हो सकती है, जिसने स्वतंत्रता के बाद भी उनकी पहचान को सुरक्षित रखा।
प्रमुख भारतीय जनजातीय नृत्यों की तुलनात्मक तालिका
प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से क्षेत्रीय कलाओं को व्यापक राष्ट्रीय जनजातीय संदर्भ में समझना अनिवार्य है:
| नृत्य शैली | प्रमुख जनजातीय समुदाय | भौगोलिक विस्तार | वाद्य यंत्र / ध्वनिक विशेषताएं | सांस्कृतिक एवं कृषि-आधारित महत्व |
|---|---|---|---|---|
| तारपा नृत्य | वारली जनजाति | पालघर और ठाणे (महाराष्ट्र); दक्षिणी गुजरात | तारपा (लौकी, बांस और ताड़ के पत्तों से निर्मित सुषिर वाद्य) | फसल कटाई के बाद जीवन चक्र, प्राकृतिक उर्वरता और सामाजिक एकजुटता का उत्सव। |
| करमा नृत्य | गोंड, बैगा और उरांव जनजाति | मध्य भारत (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड) | मांदर (मिट्टी का ढोल), टिमकी और बांसुरी | शरद ऋतु में पवित्र करम वृक्ष की पूजा तथा पर्यावरण व कृषि समृद्धि की कामना। |
| कालबेलिया नृत्य | कालबेलिया (पारंपरिक सपेरा समुदाय) | थार मरुस्थल (राजस्थान) | पूँगी (दोहरी रीड वाला वाद्य), डफ और खंजरी | सर्प की लचकदार गति की नकल; यूनेस्को (UNESCO) की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल। |
| राउत नाचा | यादव / अहीर पशुपालक जातियाँ | छत्तीसगढ़ के मैदानी एवं वन क्षेत्र | ढोलक, मांदर और झांझ (कांस्य मंजीरे) | दीपावली के बाद पशुधन संरक्षण का प्रतीकात्मक मंचन तथा भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति। |
| बारडो छाम | शेरडुकपेन जनजाति | पश्चिम कामेंग जिला (अरुणाचल प्रदेश) | अनुष्ठानिक ढोल, नगाड़े और बड़े पीतल के झांझ | मुखौटा नृत्य, जो आसुरी शक्तियों पर दैवीय शक्तियों की विजय को दर्शाता है। |
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए इसका महत्व
संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) सिविल सेवा परीक्षा तथा राज्य लोक सेवा आयोगों (जैसे MPSC और MPPSC) के लिए देशज विरासतों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। लोक कलाओं, भौतिक संस्कृति और कृषक आंदोलनों से संबंधित प्रश्न प्रारंभिक और मुख्य दोनों परीक्षाओं में नियमित रूप से पूछे जाते हैं।
प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षा पाठ्यक्रम संयोजन
यूपीएससी प्रारंभिक परीक्षा:
भारतीय कला एवं संस्कृति: भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार वाद्य यंत्रों का वर्गीकरण। तारपा सुषिर वाद्य (वायु वाद्य) श्रेणी में आता है, जिसमें एकल-रीड प्रणाली होती है।
जनजातीय एवं मानव भूगोल: पश्चिमी घाट और सह्याद्रि श्रृंखला में अनुसूचित जनजातियों (STs) तथा विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों (PVTGs) का स्थानिक वितरण।
यूपीएससी मुख्य परीक्षा (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-1):
भारतीय संस्कृति (दृश्य एवं प्रदर्शन कलाएं): यह विश्लेषण करना कि वारली चित्रकला जैसे देशज रूप धार्मिक पदानुक्रम के बजाय अपने भौतिक परिवेश, प्राकृतिक पारिस्थितिकी और सामूहिक मूल्यों को कैसे दर्शाते हैं।
आधुनिक भारतीय इतिहास: बीसवीं सदी के कृषक और आदिवासी आंदोलन। गोदावरी परुलेकर के नेतृत्व में 1945 का वारली विद्रोह मुख्यधारा के उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों के समानांतर जनजातीय संघर्ष का उत्कृष्ट उदाहरण है।
यूपीएससी मुख्य परीक्षा (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 एवं सामाजिक न्याय):
कमजोर वर्ग और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय: संविधान की पांचवीं अनुसूची, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम (पेसा - PESA), 1996, तथा वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 का भूमि अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण में महत्व।
राज्य सिविल सेवा परीक्षा:
राज्य-विशिष्ट जनजातीय प्रोफाइल, नृवंशविज्ञान संबंधी डेटा और क्षेत्रीय कला इतिहास के लिए राज्य-विशिष्ट अध्ययन आवश्यक है।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अभ्यास प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत की सांस्कृतिक और संगीत विरासत के संदर्भ में, 'तारपा' परंपरा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
तारपा नृत्य पश्चिमी भारत के वारली समुदाय द्वारा मुख्य रूप से किया जाने वाला एक पारंपरिक सामूहिक प्रदर्शन है।
तारपा वाद्य को अवनद्ध वाद्य (चर्म वाद्य / Membranophone) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसे शोधित चमड़े से तैयार किया जाता है।
इसकी नृत्य संरचना सामान्यतः विस्तार लेते संकेंद्रित सर्पिलों में व्यवस्थित होती है, जो जीवन की चक्रीय गति का प्रतीक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1 और 3
(D) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (C) केवल 1 और 3
विश्लेषणात्मक व्याख्या: कथन 2 गलत है क्योंकि तारपा कोई अवनद्ध वाद्य (Membranophone) नहीं है; यह एक सुषिर वाद्य (Aerophone / Wind instrument) है, जिसे सूखी लौकी, बांस के पोरों और ताड़ के पत्तों से तैयार किया जाता है। कथन 1 और 3 इसके सामाजिक विस्तार और नृत्य के ज्यामितीय विन्यास का सही वर्णन करते हैं।
मुख्य परीक्षा विश्लेषणात्मक अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: "भारत भर में लोक और जनजातीय कलात्मक अभिव्यक्तियाँ केवल सजावटी नहीं हैं, बल्कि वे मानव समुदायों और उनके प्राकृतिक परिवेश के बीच एक कार्यात्मक, पारिस्थितिकी-केंद्रित संतुलन को दर्शाती हैं।" वारली जनजाति की भौतिक संस्कृति, प्रदर्शन गतिशीलता और दृश्य कला के विशेष संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
प्रस्तावित उत्तर रूपरेखा:
प्रस्तावना: वारली समुदाय को उत्तरी सह्याद्रि क्षेत्र (महाराष्ट्र-गुजरात सीमा) के देशज समुदाय के रूप में रेखांकित करें, जिनका दर्शन प्रकृति पूजा (धरतरी, कंसारी, गवतरी) पर केंद्रित है।
मुख्य भाग खंड 1 (ध्वनिक एवं प्रदर्शन आयाम): तारपा नृत्य का विश्लेषण करें। स्पष्ट करें कि कैसे यह वाद्य गैर-व्यावसायिक प्राकृतिक घटकों (लौकी, बांस, ताड़ के पत्ते) से बनता है और कैसे इसका सर्पिलाकार विन्यास प्रकृति के पुनर्योजी चक्रों तथा समतामूलक सामुदायिक संरचना का प्रतिनिधित्व करता है।
मुख्य भाग खंड 2 (दृश्य कला आयाम): वारली चित्रकला का परीक्षण करें। बताएं कि कैसे इसकी ज्यामितीय आकृतियाँ (सूर्य-चंद्रमा के प्रतीक वृत्त, मानव संतुलन के प्रतीक उल्टे त्रिभुज) और प्राकृतिक सामग्री (गोबर, गेरू, चावल का लेप) व्यक्तिगत स्वामित्व के बजाय सतत जीवनशैली और सामाजिक एकता को व्यक्त करती हैं।
मुख्य भाग खंड 3 (ऐतिहासिक आयाम): इस आंतरिक पारिस्थितिक संतुलन की तुलना बंधुआ मजदूरी के उन बाह्य दबावों से करें जिनके कारण 1945 का वारली विद्रोह हुआ। रेखांकित करें कि भौतिक संस्कृति की रक्षा के लिए जनजातीय सामाजिक-आर्थिक स्वायत्तता अनिवार्य है।
निष्कर्ष: देशज सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण को आधुनिक संवैधानिक उपायों तथा सांस्कृतिक संसाधन एवं प्रशिक्षण केंद्र (CCRT) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) जैसे संस्थानों के प्रयासों से जोड़ते हुए संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें।