UPSC करेंट अफेयर्स 1 अक्टूबर, 2026: V-2 बैलिस्टिक रॉकेट का इतिहास, मिसाइल प्रौद्योगिकी और रक्षा प्रणालियां | अथर्व एक्जामवाइज दैनिक जीके अपडेट
आधुनिक एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, गाइडेड रॉकेट्री और वैश्विक रणनीतिक रक्षा संरचनाओं का ऐतिहासिक विकास एग्रीगेट 4 (A-4) रॉकेट के निर्माण से शुरू होता है, जिसे ऐतिहासिक रूप से वेरगेल्टुंग्सवाफे 2 (V-2) नाम दिया गया था। नाजी जर्मनी में जनरल वाल्टर डॉर्नबर्गर के सैन्य पर्यवेक्षण और एयरोस्पेस इंजीनियर वर्नर वॉन ब्रौन के तकनीकी निर्देशन में विकसित V-2 दुनिया की पहली परिचालन योग्य लंबी दूरी की गाइडेड बैलिस्टिक मिसाइल थी।
3 अक्टूबर, 1942 को इस प्लेटफॉर्म ने बाल्टिक तट पर स्थित पीनेमुंडे आर्मी रिसर्च सेंटर से अपनी पहली पूरी तरह से सफल परीक्षण उड़ान पूरी की। यह एक ऐसी घटना थी जिसने बैलिस्टिक मिसाइल युग और सब-ऑर्बिटल (उप-कक्षीय) अंतरिक्ष उड़ान की नींव रखी। हालांकि शुरुआती रॉकेट्री के पैमानों को अक्सर शीत युद्ध के बाद के घटनाक्रमों के साथ जोड़कर देखा जाता है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज पुष्टि करते हैं कि 1942 में पीनेमुंडे में प्रमाणित उड़ान गतिकी (flight dynamics) और थर्मोडायनामिक सिद्धांतों ने ही बीसवीं सदी के मिसाइल प्रसार और अंतरिक्ष अन्वेषण का आधार तैयार किया। सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए इस मील के पत्थर का विश्लेषण प्रणोदन थर्मोडायनामिक्स (propulsion thermodynamics), सब-ऑर्बिटल प्रक्षेपवक्र (suborbital trajectories) और युद्ध के बाद के सैन्य सिद्धांतों के भू-राजनीतिक विकास पर आवश्यक वैचारिक स्पष्टता प्रदान करता है, जिसे अथर्व एक्जामवाइज करेंट अफेयर्स के माध्यम से विस्तार से समझा जा सकता है।
V-2 प्लेटफॉर्म की ऐतिहासिक उत्पत्ति और तकनीकी संरचना
पीनेमुंडे में हासिल की गई तकनीकी सफलताओं से पहले, सैन्य रॉकेट्री काफी हद तक उन्नीसवीं सदी के कांग्रेव (Congreve) सिद्धांतों पर आधारित कम दूरी के ठोस-प्रणोदक बैराज प्रोजेक्टाइल तक ही सीमित थी। इनकी विशेषता अनगाइडेड प्रक्षेपवक्र और निम्न वायुगतिकीय दक्षता थी। जर्मन सेना एक ऐसे असममित (asymmetrical) हथियार की तलाश में थी जो मानवयुक्त विमानों को जोखिम में डाले बिना या हवाई अवरोधन का सामना किए बिना अंतर-थिएटर दूरियों पर रणनीतिक ठिकानों पर प्रहार कर सके। इसी आवश्यकता के कारण 1937 में पीनेमुंडे में जर्मन रॉकेट्री विशेषज्ञों को एकजुट किया गया, जहाँ उन्नत तरल-ईंधन प्रणोदन, स्वचालित वायुगतिकीय नियंत्रण और सुपरसोनिक एयरफ्रेम स्थिरता का व्यवस्थित रूप से संश्लेषण किया गया।
3 अक्टूबर, 1942 को ऐतिहासिक परीक्षण प्रक्षेपण के दौरान, A-4 ने लगभग $84.5\text{ किमी}$ ($52.5\text{ मील}$) का अपभू (apogee - उच्चतम बिंदु) हासिल किया और लगभग $190\text{ किमी}$ ($118\text{ मील}$) की डाउनरेंज जमीनी दूरी तय की। ऊपरी समताप मंडल (stratosphere) और मध्यमंडल (mesosphere) को पार करके, यह वाहन अंतरिक्ष की सीमा के करीब पहुँचने वाला पहला मानव निर्मित प्लेटफॉर्म बन गया—जिसे बाद में $100\text{ किमी}$ पर कार्मन रेखा (Kármán line) के रूप में मानकीकृत किया गया। V-2 की इंजीनियरिंग संरचना में कई युगांतरकारी तकनीकी प्रणालियाँ शामिल थीं:
तरल-प्रणोदक प्रणोदन (Liquid-Propellant Propulsion): इसका इंजन उच्च दहन कक्ष दबाव (chamber pressure) के तहत 75% एथिल अल्कोहल और पानी के मिश्रण को क्रायोजेनिक तरल ऑक्सीजन (LOX) के साथ दहन करता था। इसमें पानी की मात्रा दहन तापमान को नियंत्रित करने और दहन कक्ष को पिघलने या नष्ट होने से बचाने के लिए उपयोग की जाती थी।
उच्च क्षमता वाले टर्बोपंप असेंबलियां (High-Capacity Turbopump Assemblies): प्रणोदक वितरण एक सहायक भाप टरबाइन द्वारा संचालित होता था, जो सोडियम परमैंगनेट के साथ मिश्रित उच्च-सांद्रता वाले हाइड्रोजन पेरोक्साइड के उत्प्रेरक अपघटन (catalytic decomposition) पर चलती थी। यह प्रणाली $125\text{ किलोग्राम}$ प्रति सेकंड से अधिक की दर से दहन कक्ष में प्रणोदक पहुंचाती थी।
जड़त्वीय स्वायत्त मार्गदर्शन (Inertial Autonomous Guidance): उड़ान की स्थिरता दोहरे जाइरोस्कोप द्वारा नियंत्रित एक आंतरिक एनालॉग कंप्यूटर द्वारा बनाए रखी जाती थी। यह कोणीय विचलन (angular deviation) का पता लगाता था और इंजन निकास में डूबे हुए चल ग्रेफाइट वेन्स (graphite vanes) के साथ-साथ पूंछ के वायुगतिकीय पतवारों (tail rudders) को सुधारात्मक निर्देश भेजता था।
सुपरसोनिक पुन:प्रवेश वायुगतिकी (Supersonic Re-entry Aerodynamics): एयरफ्रेम लगभग $5{,}600\text{ किमी/घंटा}$ ($\approx \text{Mach } 4.5\text{ से } 5$) के अधिकतम टर्मिनल वेग तक त्वरित होता था, जो एक तीव्र परवलयिक वक्र (parabolic curve) के साथ अपने लक्ष्य की ओर गिरता था। क्योंकि यह ध्वनि की गति से भी तेज गति से आता था, इसलिए रडार चेतावनी नगण्य थी और द्वितीय विश्व युद्ध की तकनीकों के साथ इसका रक्षात्मक अवरोधन (interception) भौतिक रूप से असंभव था।
| इंजीनियरिंग पैरामीटर | तकनीकी विनिर्देश / मीट्रिक |
|---|---|
| प्रणाली का नाम | एग्रीगेट 4 (A-4) / वेरगेल्टुंग्सवाफे 2 (V-2) |
| उत्पत्ति प्राधिकरण | पीनेमुंडे आर्मी रिसर्च सेंटर / नाजी जर्मनी |
| प्रमुख तकनीकी डिजाइनर | वर्नर वॉन ब्रौन (Wernher von Braun) |
| प्रथम सफल उड़ान | 3 अक्टूबर, 1942 |
| संरचनात्मक लंबाई (ऊंचाई) | लगभग $14\text{ मीटर}$ ($46\text{ फीट}$) |
| सकल प्रक्षेपण द्रव्यमान (Launch Mass) | $\approx 12{,}500\text{ से } 13{,}000\text{ किग्रा}$ (पूरी तरह ईंधन भरने पर) |
| उच्च-विस्फोटक पेलोड | $\approx 730\text{ से } 1{,}000\text{ किग्रा}$ अमातोल (Amatol) वारहेड |
| अधिकतम वेग | $\approx 5{,}600\text{ किमी/घंटा}$ ($\approx \text{Mach } 4.5\text{--}5$) |
| परीक्षण उड़ान ऊंचाई / रेंज | $84.5\text{ किमी}$ अपभू / $190\text{ किमी}$ डाउनरेंज (परिचालन रेंज: $320\text{ किमी}$ तक) |
| प्रणोदक रसायन विज्ञान | $75\%$ इथेनॉल / जल मिश्रण के साथ तरल ऑक्सीजन (LOX) |
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान परिचालन तैनाती और रणनीतिक प्रभाव
V-2 की परिचालन तैनाती सितंबर 1944 में शुरू हुई, जब जर्मन सेना ने मुक्त कराए गए मित्र देशों के शहरों—मुख्य रूप से लंदन, एंटवर्प और पेरिस पर मिसाइल हमले शुरू किए। यूरोप में युद्ध समाप्त होने से पहले 3,000 से अधिक V-2 रॉकेट दागे गए थे। सबसोनिक V-1 पल्सजेट क्रूज मिसाइल के विपरीत (जिसे नग्न आंखों से ट्रैक किया जा सकता था, लड़ाकू विमानों द्वारा इंटरसेप्ट किया जा सकता था, या रडार-निर्देशित एंटी-एयरक्राफ्ट तोपों द्वारा नष्ट किया जा सकता था), V-2 विस्फोट से पहले कोई संवेदी चेतावनी नहीं देता था, जिससे बड़े पैमाने पर नागरिक हताहत हुए और गंभीर मनोवैज्ञानिक आघात पहुँचा।
हालांकि, एक व्यापक रणनीतिक और सैन्य-आर्थिक दृष्टिकोण से, V-2 कार्यक्रम नाजी जर्मनी के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। इस प्लेटफॉर्म का सर्कुलर एरर प्रोबेबल (CEP - संभावित गोलाकार त्रुटि) बहुत अधिक था, जो अक्सर कई किलोमीटर तक फैला होता था। इस कारण यह नौसैनिक बंदरगाहों, कमांड सेंटरों या औद्योगिक संयंत्रों जैसे विशिष्ट सामरिक ठिकानों को नष्ट करने में असमर्थ था।
इसके अलावा, V-2 के विकास और बड़े पैमाने पर उत्पादन में खर्च हुई वित्तीय, धातुकर्म और श्रम पूंजी मित्र देशों की क्षमताओं को पहुँचाए गए भौतिक नुकसान की तुलना में बहुत अधिक थी—विशेषकर यह देखते हुए कि इसका निर्माण मिटेलबाउ-डोरा जैसे भूमिगत एकाग्रता शिविरों में क्रूर बंधुआ मजदूरी पर आधारित था। आधुनिक इतिहास लेखन पुष्टि करता है कि V-2 के लिए संसाधनों के आवंटन ने रक्षात्मक लड़ाकू विमानों और पारंपरिक बख्तरबंद वाहनों के उत्पादन से महत्वपूर्ण संसाधनों को भटका दिया, जिससे युद्ध के रणनीतिक परिणाम पर कोई असर नहीं पड़ा। स्मिथसोनियन नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम में संरक्षित अवशेष और तकनीकी दस्तावेज तकनीकी नवाचार और युद्धकालीन तबाही की इस दोहरी विरासत को रेखांकित करते हैं।
युद्ध के बाद प्रसार: शीत युद्ध की अंतरिक्ष होड़ का उत्प्रेरक
1945 में थर्ड रीच के पतन के बाद, मित्र राष्ट्रों ने यह मान लिया कि V-2 में समाहित तकनीकी संरचना सैन्य प्रतिरोध और रणनीतिक पहुंच का भविष्य थी। पीनेमुंडे से जुड़े हार्डवेयर, परीक्षण सुविधाएं और इंजीनियरिंग कर्मी अमेरिकी और सोवियत खुफिया अभियानों के प्राथमिक लक्ष्य बन गए।
V-2 / A-4 इंजीनियरिंग प्रोटोटाइप (पीनेमुंडे, 1942) │ ┌──────────────────────────┴──────────────────────────┐ ▼ ▼ संयुक्त राज्य अमेरिका सोवियत संघ (ऑपरेशन पेपरक्लिप) (ऑपरेशन ओसोअविआखिम) │ │ व्हाइट सैंड्स में V-2 अनुसंधान R-1 प्रतिकृति मिसाइल │ │ PGM-11 रेडस्टोन मिसाइल R-7 सेमोर्का ICBM │ │ जूनो I / एक्सप्लोरर 1 (1958) स्पुतनिक 1 (1957) │ │ सैटर्न V / अपोलो कार्यक्रम वोस्तोक 1 (1961)
ऑपरेशन पेपरक्लिप (Operation Paperclip) के तहत, अमेरिकी सेना ने वर्नर वॉन ब्रौन और 1,500 से अधिक जर्मन विशेषज्ञों के साथ-साथ भारी मात्रा में जब्त किए गए रॉकेट घटकों को संयुक्त राज्य अमेरिका पहुंचाया। व्हाइट सैंड्स प्रोविंग ग्राउंड में, ऊपरी-वायुमंडलीय अनुसंधान करने के लिए जब्त V-2 रॉकेटों को व्यवस्थित रूप से असेंबल किया गया, जिससे पहले उच्च-ऊंचाई वाले कॉस्मिक किरण माप प्राप्त हुए और अंतरिक्ष से पृथ्वी की पहली तस्वीरें ली गईं। रेडस्टोन शस्त्रागार में अमेरिकी सेना बैलिस्टिक मिसाइल एजेंसी के साथ वॉन ब्रौन के बाद के काम ने सीधे तौर पर PGM-11 रेडस्टोन मिसाइल का निर्माण किया, जिसने आगे चलकर अमेरिका के पहले उपग्रह 'एक्सप्लोरर 1' को लॉन्च किया और एलन शेपर्ड को सब-ऑर्बिटल उड़ान में भेजा। इस प्रणोदन वंशावली का चरम बहु-चरणीय सैटर्न V (Saturn V) प्रक्षेपण यान के रूप में सामने आया जिसने अपोलो चंद्र लैंडिंग को संभव बनाया, जिसे नासा इतिहास प्रभाग द्वारा बड़े पैमाने पर प्रलेखित किया गया है।
इसी समय, सोवियत संघ ने ऑपरेशन ओसोअविआखिम (Operation Osoaviakhim) को अंजाम दिया, जिसके तहत पीनेमुंडे के शेष प्रतिष्ठानों पर कब्जा कर लिया गया और जर्मन तकनीकी कर्मियों को V-2 की प्रतिकृति के रूप में सोवियत R-1 मिसाइल बनाने के लिए तैनात किया गया। सोवियत मुख्य डिजाइनर सर्गेई कोरोलेव के नेतृत्व में, V-2 से प्राप्त थर्मोडायनामिक और संरचनात्मक अनुभवों ने भारी मल्टी-इंजन क्लस्टरिंग की नींव रखी। यह प्रयास सीधे तौर पर R-7 सेमोर्का (R-7 Semyorka) के रूप में फलीभूत हुआ, जो दुनिया की पहली अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) थी। इसी मिसाइल ने अक्टूबर 1957 में स्पुतनिक 1 को निचली पृथ्वी की कक्षा में प्रक्षेपित किया और शीत युद्ध की अंतरिक्ष होड़ (Space Race) की शुरुआत की। शीत युद्ध के भू-राजनीतिक बदलावों का विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण अथर्व एक्जामवाइज अध्ययन सामग्री में उपलब्ध है।
तकनीकी वर्गीकरण: बैलिस्टिक मिसाइल बनाम क्रूज मिसाइल
प्रतियोगी परीक्षाओं में एक मौलिक विषय—जिसे सिविल सेवा प्रश्नपत्रों में बार-बार रेखांकित किया जाता है—बैलिस्टिक मिसाइलों और क्रूज मिसाइलों के बीच तकनीकी और वायुगतिकीय अंतर है। V-2 बैलिस्टिक मिसाइल श्रेणी के लिए एक आदर्श आधार के रूप में कार्य करता है।
बैलिस्टिक उड़ान की गतिकी (Dynamics of Ballistic Flight)
एक बैलिस्टिक मिसाइल अपने शुरुआती संचालित चरण के दौरान एक गाइडेड प्रोजेक्टाइल की तरह व्यवहार करती है, जिसे बूस्ट चरण (Boost Phase) कहा जाता है। यह सीमा के आधार पर आमतौर पर कुछ सेकंड से लेकर कुछ मिनटों तक रहता है। एक बार रॉकेट इंजन का ईंधन समाप्त (burnout) हो जाने के बाद, मिसाइल सक्रिय प्रणोदन बंद कर देती है और शास्त्रीय कक्षीय यांत्रिकी व गुरुत्वाकर्षण त्वरण द्वारा निर्धारित एक शक्तिहीन, उच्च-चाप वाले सब-ऑर्बिटल परवलयिक प्रक्षेपवक्र (parabolic trajectory) पर स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ती है।
मिडकोर्स चरण वाहन को घने वायुमंडल से बाहर अंतरिक्ष (exo-atmospheric space) में ले जाता है, जो अंतरमहाद्वीपीय प्रणालियों के लिए $1{,}000\text{ किमी}$ से अधिक की ऊंचाई तक पहुंचता है। इसके बाद यह $\text{Mach } 5$ से लेकर $\text{Mach } 20$ से अधिक के टर्मिनल वेग से वायुमंडल में फिर से प्रवेश (re-entry) करता है।
क्रूज उड़ान की गतिकी (Dynamics of Cruise Flight)
इसके विपरीत, एक क्रूज मिसाइल एक मानव रहित, निरंतर संचालित और स्व-नेविगेट करने वाले हवाई वाहन के रूप में कार्य करती है। यह अपने पूरे मिशन प्रोफाइल के दौरान पंखों द्वारा उत्पन्न वायुगतिकीय लिफ्ट (aerodynamic lift) और एयर-ब्रीदिंग जेट इंजनों (टर्बोफैन, टर्बोजेट या रैमजेट) द्वारा प्रदान किए जाने वाले निरंतर थ्रस्ट पर निर्भर करती है। क्रूज मिसाइलें पूरी तरह से पृथ्वी के वायुमंडल के भीतर रहती हैं और जमीनी रडार नेटवर्क तथा इंटरसेप्टर से बचने के लिए बेहद कम ऊंचाई वाले, इलाके का अनुसरण करने वाले (terrain-following) उड़ान पथों पर उड़ती हैं—अक्सर सतह से केवल कुछ मीटर ऊपर।
| परिचालन मीट्रिक | बैलिस्टिक मिसाइल (उदा. अग्नि श्रृंखला, पृथ्वी, V-2) | क्रूज मिसाइल (उदा. ब्रह्मोस, निर्भय, टॉमहॉक) |
|---|---|---|
| प्रणोदन प्रोफ़ाइल | रॉकेट मोटर (ठोस या तरल प्रणोदक); केवल प्रारंभिक बूस्ट चरण के दौरान सक्रिय। | एयर-ब्रीदिंग जेट इंजन (टर्बोफैन/रैमजेट/स्क्रैमजेट); पूरी उड़ान अवधि के दौरान सक्रिय। |
| उड़ान प्रक्षेपवक्र (Trajectory) | उच्च ऊंचाई वाला परवलयिक चाप; वायुमंडल से बाहर निकलता है और पुनः प्रवेश करता है। | समतल, कम ऊंचाई वाला, वायुमंडलीय पथ जो इलाके की बनावट के अनुसार चलता है। |
| टर्मिनल वेग | पुन:प्रवेश के दौरान सुपरसोनिक से हाइपरसोनिक ($\text{Mach } 5\text{ से } 20+$)। | सबसोनिक ($\approx \text{Mach } 0.8$), सुपरसोनिक ($\approx \text{Mach } 2.8\text{--}3$), या हाइपरसोनिक। |
| मार्ग गतिशीलता (Maneuverability) | पूर्व-निर्धारित कक्षीय चाप; विशेष पुन:प्रवेश वाहनों (Re-entry Vehicles) के बिना न्यूनतम गतिशीलता। | निरंतर सक्रिय नेविगेशन; इलाके की रूपरेखा और वायु रक्षा रडारों से बचकर निकलने में सक्षम। |
| लक्ष्यीकरण भूमिका | रणनीतिक प्रतिरोध, महाद्वीपों के पार भारी गतिज/परमाणु पेलोड पहुंचाना। | न्यूनतम संपार्श्विक क्षति (collateral damage) के साथ उच्च-मूल्य वाले सैन्य प्रतिष्ठानों पर अत्यधिक सटीक सर्जिकल स्ट्राइक। |
वैश्विक रॉकेट्री विकास का व्यापक विवरण इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के रॉकेट और मिसाइल सिस्टम विश्लेषण के माध्यम से समझा जा सकता है।
भारत के स्वदेशी मिसाइल तंत्र का रणनीतिक विकास
भारत की आधुनिक मिसाइल प्रणालियां अपने सैद्धांतिक विकास का श्रेय 20वीं सदी की रॉकेट तकनीक को देती हैं, जिसे 1983 में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के वैज्ञानिक नेतृत्व में शुरू किए गए एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के माध्यम से आधुनिक बनाया गया। भारत ने एक बहुस्तरीय रणनीतिक प्रतिरोध संरचना विकसित की है जो थल, जल और नभ में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखती है:
सामरिक बैलिस्टिक प्रणालियां (Tactical Ballistic Systems): पृथ्वी श्रृंखला ने कम दूरी की युद्धक्षेत्र आवश्यकताओं के लिए तरल और ठोस प्रणोदकों का उपयोग करके भारत की सतह से सतह पर मार करने वाली बैलिस्टिक स्ट्राइक क्षमता की नींव रखी।
रणनीतिक अंतरमहाद्वीपीय प्रतिरोध (Strategic Intercontinental Deterrence): ठोस ईंधन वाली बैलिस्टिक मिसाइलों का अग्नि परिवार भारत के परमाणु प्रतिरोध की जमीनी रीढ़ है। यह कम दूरी की अग्नि-I से लेकर सड़क पर चलने योग्य (road-mobile), कनस्तर-आधारित (canisterized) अग्नि-V तक फैला हुआ है, जिसकी मारक क्षमता $5{,}000\text{ किमी}$ से अधिक है।
मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल्स (MIRV): 'मिशन दिव्यास्त्र' के सफल परीक्षण के साथ, भारत ने अग्नि-V प्लेटफॉर्म पर स्वदेशी MIRV क्षमता का प्रदर्शन किया। यह तकनीक एक ही मिसाइल को स्वतंत्र बैलिस्टिक प्रक्षेपवक्र पर कई परमाणु हथियार दागने की अनुमति देती है, जिससे दुश्मन के एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा शील्ड को भेदा जा सके।
समुद्र-आधारित रणनीतिक त्रिकोण (Sea-Based Strategic Triad): आईएनएस अरिहंत श्रेणी की परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों पर K-15 (सागरिका) और K-4 सबमरीन-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलों (SLBMs) की तैनाती भारत की "नो फर्स्ट यूज" (No First Use) परमाणु नीति के तहत 'सेकंड-स्ट्राइक' (जवाबी हमले) की क्षमता को सुरक्षित करती है।
सुपरसोनिक क्रूज प्रभुत्व (Supersonic Cruise Dominance): रूसी संघ के साथ संयुक्त उद्यम के माध्यम से विकसित ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली, ठोस बूस्टर और तरल रैमजेट से युक्त दो-चरणीय प्रणोदन प्रणाली का उपयोग करती है, जो थल, जल और वायु प्रक्षेपण प्लेटफार्मों पर $\text{Mach } 2.8$ की निरंतर गति प्राप्त करती है।
सबसोनिक लंबी दूरी का प्रहार (Subsonic Long-Range Strike): निर्भय और लॉन्ग-रेंज लैंड अटैक क्रूज मिसाइल (LRLACM) प्रणालियों का स्वदेशी विकास सुपरसोनिक स्ट्राइक परिसंपत्तियों को कम ऊंचाई वाली, लंबे समय तक मंडराने (loitering) वाली क्रूज क्षमताओं के साथ पूरक बनाता है।
भारत की रक्षा मुद्रा और तकनीकी स्वदेशीकरण की विस्तृत जानकारी अथर्व एक्जामवाइज यूपीएससी फाउंडेशन के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।
आपकी परीक्षा की तैयारी के लिए यह क्यों महत्वपूर्ण है
UPSC सिविल सेवा परीक्षा और राज्य लोक सेवा आयोगों की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए बैलिस्टिक रॉकेट्री का तकनीकी और ऐतिहासिक विकास पाठ्यक्रम के कई प्रश्नपत्रों से जुड़ता है:
परीक्षा पाठ्यक्रम से संबंध (Examination Syllabus Linkages)
UPSC प्रारंभिक परीक्षा (सामान्य विज्ञान और रक्षा प्रौद्योगिकी): अभ्यर्थियों को बैलिस्टिक मिसाइल (परवलयिक पथ, रॉकेट प्रणोदन केवल बूस्ट चरण के दौरान सक्रिय) और क्रूज मिसाइल (जेट-चालित, कम ऊंचाई वाली वायुमंडलीय उड़ान) के बीच बुनियादी तकनीकी अंतरों पर महारत हासिल होनी चाहिए। UPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा 2023 में अग्नि-V और ब्रह्मोस के उड़ान यांत्रिकी की तुलना करके सीधे तौर पर यह अंतर पूछा गया था।
UPSC मुख्य परीक्षा GS पेपर 1 (विश्व इतिहास): V-2 की परिचालन तैनाती द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी में संपूर्ण युद्ध (total war), औद्योगिक सैन्यीकरण और उन्नत विज्ञान कार्यक्रमों के उद्भव को दर्शाती है। इसके अलावा, ऑपरेशन पेपरक्लिप और ऑपरेशन ओसोअविआखिम के माध्यम से जर्मन तकनीकी विशेषज्ञों का निष्कर्षण सीधे तौर पर शीत युद्ध की हथियारों की होड़ और संयुक्त राज्य अमेरिका व सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष प्रतिद्वंद्विता का उत्प्रेरक बना।
UPSC मुख्य परीक्षा GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी): प्रश्न अक्सर रक्षा प्रौद्योगिकियों के स्वदेशीकरण का मूल्यांकन करते हैं, जिसमें शुरुआती एकल-चरण तरल प्रणोदक से लेकर उन्नत ठोस-ईंधन कंपोजिट, क्रायोजेनिक ऊपरी चरण और रैमजेट/स्क्रैमजेट इंजन तक का संक्रमण शामिल है।
UPSC मुख्य परीक्षा GS पेपर 3 (आंतरिक सुरक्षा और रणनीतिक प्रतिरोध): सिंगल-वारहेड बैलिस्टिक मिसाइलों से कनस्तरीकृत रोड-मोबाइल प्लेटफॉर्म, सबमरीन-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) और मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल्स (MIRV) का विकास भारत के परमाणु परीक्षण और दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय रणनीतिक स्थिरता का मूल्यांकन करने के लिए मूलभूत है।
बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएं (Multilateral Export Control Regimes): बैलिस्टिक मिसाइल संरचनाओं द्वारा उत्पन्न प्रसार जोखिमों ने वैश्विक नियामक ढांचे को जन्म दिया, जिनका विश्लेषण अभ्यर्थियों को करना आवश्यक है; इनमें मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था (MTCR) और बैलिस्टिक मिसाइल प्रसार के खिलाफ हेग आचार संहिता (HCoC) शामिल हैं।